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एक महीने में 15.6 प्रतिशत महंगी हुई चीनी, सरकार ने जमाखोरी पर कसा शिकंजा

India’s sugar sector has evolved into a diversified industry that supports farmers, mills, energy production, and global trade. Recent price pressures reflect lower production, seasonal demand, global supply conditions, and market practices. However, these pressures remain temporary against the sector’s broader growth and diversification. The government’s priority remains balancing consumer interests, timely farmer payments, and industry stability.

 

उषा रावत –

 देश में पिछले एक महीने के दौरान चीनी के खुदरा दामों में करीब 15.6 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज की गई है। 20 जुलाई को चीनी का औसत मूल्य 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम था, जो 20 अगस्त को बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया। सरकार ने इस तेजी के लिए कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी मांग, प्रतिकूल मौसम, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के साथ कुछ कारोबारियों की सट्टेबाजी और जमाखोरी को प्रमुख कारण बताया है।

सरकार का कहना है कि कीमतों में हालिया तेजी के बावजूद देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है और नया पेराई सत्र शुरू होने तक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने व्यापारियों पर भंडारण सीमा लगाने के साथ 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने का निर्णय लिया है।

मौजूदा चीनी सत्र में उत्पादन पहले लगाए गए 343 लाख मीट्रिक टन के अनुमान के मुकाबले करीब 306 लाख मीट्रिक टन रहने की संभावना है। उत्पादन घटने के पीछे गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर रोग के साथ अत्यधिक बारिश से हुए जलभराव को प्रमुख कारण माना गया है। इसी बीच त्योहारी मौसम से पहले मांग बढ़ने से बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार भी भारतीय कीमतों को प्रभावित कर रहा है। वर्ष 2026-27 में विश्व स्तर पर करीब 33 लाख मीट्रिक टन चीनी की कमी का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत 30 जून को 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन हो गई। इस तरह दो महीने से भी कम समय में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 16 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है।

सरकार ने इस धारणा को खारिज किया है कि पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनॉल उत्पादन की वजह से घरेलू बाजार में चीनी की कमी हुई है। आंकड़ों के अनुसार एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग नौ प्रतिशत रह गई है। देश में उत्पादित करीब तीन-चौथाई एथेनॉल अब अनाज, विशेषकर मक्का से तैयार किया जा रहा है।

भारत में सामान्यतः सालाना 300 से 340 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280 से 290 लाख मीट्रिक टन है। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में लगाने से मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरी और किसानों को गन्ने का भुगतान करने में मदद मिली है। 20 अगस्त तक मौजूदा चीनी सत्र के गन्ना मूल्य बकाये का 97 प्रतिशत किसानों को दिया जा चुका था।

कीमतों पर नियंत्रण के लिए एक अगस्त से 30 नवंबर तक देशभर के चीनी व्यापारियों के लिए 400 टन की भंडारण सीमा निर्धारित की गई है। एक सितंबर से बड़े उपभोक्ता अपनी 15 दिन की जरूरत से अधिक चीनी का भंडारण नहीं कर सकेंगे। केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त टीमें मिलों में उपलब्ध चीनी भंडार का भौतिक सत्यापन भी कर रही हैं।

इसके अलावा घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का फैसला किया गया है। राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। सरकार का अनुमान है कि इससे अक्टूबर में सामान्य तीन से चार लाख मीट्रिक टन के मुकाबले 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक चीनी का उत्पादन हो सकता है और त्योहारी मौसम में आपूर्ति बेहतर होगी।

देश का गन्ना उत्पादन भी पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 2025-26 में उत्पादन 500 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया है, जबकि 2015-16 में यह 348.44 मिलियन मीट्रिक टन था। यानी दस वर्षों में करीब 43.5 प्रतिशत वृद्धि हुई है। गन्ने का क्षेत्रफल भी 49.27 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 58.87 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं।

चीनी उद्योग देश के करीब पांच करोड़ गन्ना किसानों की आजीविका से जुड़ा है, जबकि चीनी मिलों और संबंधित उद्योगों में लगभग पांच लाख लोगों को रोजगार मिलता है। सरकार ने चीनी सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य 365 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।

सरकार का आकलन है कि चीनी की मौजूदा महंगाई दीर्घकालिक संकट के बजाय कम उत्पादन, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार और जमाखोरी जैसे तात्कालिक कारणों का परिणाम है। अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच चीनी के खुदरा मूल्य में सालाना औसत वृद्धि करीब तीन प्रतिशत ही रही थी। ऐसे में अब सरकार की चुनौती त्योहारी मौसम में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कर कीमतों को नियंत्रित रखने के साथ किसानों को समय पर गन्ना मूल्य दिलाने की है।

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