बेंगलुरु बचाता है, चंडीगढ़ खर्च करता है; भारत की दिलचस्प पैसे की आदतें
A PRICE–Tata Sons study of India’s top 100 cities reveals sharp differences in urban finances. Bengaluru leads in average household income (₹28.3 lakh) and savings, while Chandigarh tops per-family consumption (₹19 lakh). Delhi-NCR forms the largest overall market ($126 billion) due to its huge population. Chennai shows the highest spending-to-income ratio and debt levels. The urban middle class has grown from 29% to 53% in a decade and is projected to exceed 60% by 2030. These cities house under 20% of India’s people yet control over one-third of national income.
-उषा रावत / जयसिंह रावत के साथ-
भारत के तेजी से फैलते शहरी परिदृश्य में समृद्धि, उपभोग और बचत के मायने हर शहर के साथ बदल रहे हैं। आर्थिक शोध संस्था ‘पीपुल रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी’ (PRICE) और टाटा संस द्वारा देश के शीर्ष 100 शहरों पर किए गए व्यापक अध्ययन—‘द मैनी अर्बन इंडियाज’—ने शहरी भारत के वित्तीय मिजाज की एक दिलचस्प और परतदार तस्वीर पेश की है। यह अध्ययन साफ करता है कि देश में सबसे ज्यादा कमाने वाले शहर जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा खर्च या कर्ज लेने वाले भी हों। जहां सूचना प्रौद्योगिकी का गढ़ बेंगलुरु औसत पारिवारिक आय और बचत में देश का सिरमौर बनकर उभरा है, वहीं सुनियोजित जीवनशैली वाला चंडीगढ़ प्रति परिवार उपभोग खर्च में देश के सभी महानगरों को पीछे छोड़ते हुए पहले पायदान पर पहुंच गया है। दूसरी ओर, विशाल आबादी और पारिवारिक घनत्व के चलते दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा समग्र उपभोक्ता बाजार बना हुआ है, जबकि चेन्नई अपनी आय के अनुपात में सबसे ज्यादा खर्च करने और कर्ज लेने वाले महानगर के रूप में सामने आया है।

कमाई का शिखर और मध्य वर्ग का विस्तार
देश के शीर्ष 100 शहरों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि औसत वार्षिक घरेलू आय के मामले में बेंगलुरु लगभग 28.3 लाख रुपये के साथ देश में सबसे आगे है। इसके बाद चंडीगढ़ लगभग 26 लाख रुपये की औसत घरेलू आय के साथ दूसरे स्थान पर खड़ा है, जो इसे गैर-मेट्रो शहरों में सबसे समृद्ध आर्थिक केंद्र बनाता है। देश के छह बड़े महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद—की तुलना करें तो बेंगलुरु के एक परिवार की औसत कमाई कोलकाता के मुकाबले करीब 1.7 गुना अधिक दर्ज की गई है। हालांकि, केवल औसत आय से पूरे समाज की समृद्धि की थाह नहीं मिलती। मुंबई और दिल्ली-एनसीआर में भले ही औसत आय बेंगलुरु से कम दिखती हो, लेकिन 36 लाख रुपये से अधिक वार्षिक कमाने वाले उच्च-आय वर्ग के परिवारों की कुल तादाद इन्हीं दो महानगरों में सबसे अधिक है। वहीं, 6 लाख से 36 लाख रुपये की आय वाले मजबूत मध्य वर्ग की हिस्सेदारी के मामले में हैदराबाद देश में सबसे आगे है। पिछले एक दशक में शहरी भारत के भीतर मध्य वर्ग का हिस्सा 29 प्रतिशत से बढ़कर 53 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और वर्ष 2030 तक इसके 60 प्रतिशत को पार कर जाने का अनुमान है।
खर्च की होड़ में छोटे शहर महानगरों से आगे
प्रति परिवार उपभोग व्यय के मामले में पारंपरिक महानगरों का दबदबा टूटता नजर आ रहा है। चंडीगढ़ प्रति परिवार सालाना लगभग 19 लाख रुपये के औसत खर्च के साथ देश में शीर्ष पर काबिज है। चंडीगढ़ के बाद तिरुवनंतपुरम और वडोदरा जैसे शहर प्रति परिवार खर्च के मामले में मुंबई और दिल्ली जैसे स्थापित महानगरों को पीछे छोड़ रहे हैं। चंडीगढ़ में उच्च जीवन स्तर, सीमित परिवार आकार, वाहनों की प्रचुरता और खान-पान व पर्यटन पर खुलकर खर्च करने की संस्कृति ने इसे सबसे अधिक उपभोग करने वाले शहर का दर्जा दिलाया है। इसके विपरीत, बेंगलुरु में सर्वाधिक कमाई होने के बावजूद खर्च करने की प्रवृत्ति महानगरों में सबसे कम यानी लगभग 54 प्रतिशत के आसपास दर्ज की गई है, जिसके चलते वहां प्रति परिवार वार्षिक बचत का स्तर करीब 13 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
कर्ज, प्राथमिकताओं का बदलाव और चेन्नई का वित्तीय स्वभाव
महानगरों में वित्तीय प्राथमिकताओं का अंतर चेन्नई के व्यवहार में सबसे स्पष्ट दिखाई देता है। चेन्नई में परिवार अपनी कुल कमाई का लगभग दो-तिहाई हिस्सा (करीब 12.7 लाख रुपये सालाना) उपभोग पर खर्च करते हैं, जो छह बड़े महानगरों में आय के अनुपात के लिहाज से सर्वाधिक है। इसी के साथ, चेन्नई में ‘ऋण-से-आय’ (डेट-टू-इनकम) अनुपात 27.7 प्रतिशत आंका गया है, जो देश के बड़े महानगरों में सबसे अधिक है। इस कर्ज का एक बड़ा हिस्सा मकान और निजी वाहनों की खरीद जैसी दीर्घकालिक परिसंपत्तियों के निर्माण में जा रहा है। इसके विपरीत, हैदराबाद और बेंगलुरु में कर्ज का यह अनुपात 15 प्रतिशत के आसपास सीमित है। शहरों के खर्च के रुझान भी अब बुनियादी जरूरतों—रोटी, कपड़ा और मकान—से आगे बढ़कर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुविधा और जीवनशैली से जुड़े अनुभवों की ओर मुड़ रहे हैं। उत्तर भारतीय शहरों में आवास और शिक्षा पर आवंटन अधिक दिखता है, तो दक्षिण भारतीय परिवारों के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का हिस्सा अपेक्षाकृत बड़ा है।
दिल्ली-एनसीआर का असीम बाजार और क्षेत्रीय असंतुलन की चुनौती
प्रति परिवार खर्च में भले ही चंडीगढ़ आगे हो, लेकिन समग्र बाजार आकार के मामले में दिल्ली-एनसीआर का कोई सानी नहीं है। लगभग 75 लाख परिवारों के विशाल आधार के साथ दिल्ली-एनसीआर का कुल वार्षिक उपभोग बाजार 126 अरब डॉलर का बैठता है, जो मुंबई और बेंगलुरु के संयुक्त बाजार के लगभग बराबर है। अकेले दिल्ली-एनसीआर में परिवहन पर होने वाला वार्षिक खर्च (लगभग 33 अरब डॉलर) पुणे के कुल समग्र बाजार से भी बड़ा है। यह अध्ययन एक गंभीर संरचनात्मक हकीकत को भी रेखांकित करता है। भारत के शीर्ष 100 शहर देश की कुल आबादी का 20 प्रतिशत से भी कम हिस्सा समेटे हुए हैं, लेकिन राष्ट्रीय आय के एक-तिहाई से अधिक और देश के कुल उपभोग के 31 प्रतिशत हिस्से पर इन्हीं का नियंत्रण है। यह तथ्य जहां भारतीय अर्थव्यवस्था में उभरते शहरी केंद्रों की क्रय शक्ति को उजागर करता है, वहीं नगर नियोजन, बुनियादी ढांचे के विस्तार और संतुलित क्षेत्रीय विकास की तात्कालिक आवश्यकता पर भी नए सिरे से बहस की मांग करता है।
