दो दशक से अधूरी सड़क और डोली में मरीज: उत्तराखंड में सड़क संपर्क के आंकड़ों के बीच पहाड़ की दूसरी तस्वीर
बागेश्वर की 20 किमी सड़क से पांच हजार लोग प्रभावित, चमोली में महिलाओं को चार किमी डोली में ले जाना पड़ा बीमार बुजुर्ग; ऐरठा में पांच किमी डंडी-कंडी और उत्तरकाशी में दस किमी स्ट्रेचर पर मरीज ढोने की नौबत
–उषा रावत द्वारा-
देहरादून, 27 सितंबर। उत्तराखंड में गांवों तक सड़कों का जाल तेजी से फैलने और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत हजारों किलोमीटर सड़कें बनने के सरकारी आंकड़ों के बीच पहाड़ के कई हिस्सों की जमीनी तस्वीर अब भी चिंता पैदा करती है। कहीं सड़क स्वीकृत होने के वर्षों बाद भी निर्माण शुरू नहीं हुआ, कहीं बनी सड़क बरसात में यातायात लायक नहीं रह गई और कहीं मरम्मत का प्रस्ताव मंजूर नहीं होने से हजारों लोगों की आवाजाही प्रभावित है। इसका सबसे गंभीर असर तब दिखाई देता है, जब किसी बीमार, घायल या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डोली, डंडी-कंडी या स्ट्रेचर का सहारा लेना पड़ता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट ने बागेश्वर और पिथौरागढ़ की सीमा से जुड़े क्षेत्र की ऐसी ही तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार धर्मघर-चुचेर-मजखेत-लाठी की करीब 20 किलोमीटर लंबी सड़क का काम शुरू हुए लगभग दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन पांच हजार से अधिक लोगों के लिए यह मार्ग आज भी भरोसेमंद सड़क संपर्क नहीं बन पाया है। बरसात में इसके कई हिस्से कीचड़ भरे रास्ते में बदल जाते हैं। दोपहिया वाहन फंसते हैं और कुछ स्थानों पर ग्रामीणों को वाहनों को पानी की धाराओं से पार कराने तक की नौबत आती है।
रिपोर्ट में कराला के ग्राम प्रधान मनोज पाठक के हवाले से कहा गया है कि 2025 की अतिवृष्टि के बाद सड़क कई स्थानों पर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई और इस वर्ष की बारिश ने स्थिति और बिगाड़ दी। कुछ हिस्से इतने संकरे हो गए हैं कि एक वाहन का गुजरना भी कठिन है। एलपीजी आपूर्ति के वाहन और स्कूल बसें भी कुछ गांवों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। हालात का एक सामाजिक परिणाम यह भी सामने आया कि कुछ परिवारों को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए धरमघर में किराये पर मकान लेना पड़ा।
इस मामले में विभागीय पक्ष भी महत्वपूर्ण है। पीएमजीएसवाई के अधिशासी अभियंता के अनुसार सड़क 2012 में लोक निर्माण विभाग से पीएमजीएसवाई को हस्तांतरित हुई थी। लगभग 19 किलोमीटर हिस्सा पीएमजीएसवाई और करीब एक किलोमीटर लोक निर्माण विभाग के पास है। 2025 में आपदा राहत मद से करीब 1.86 करोड़ रुपये का मरम्मत प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे उच्च स्तर पर मंजूरी नहीं मिली। अब नया प्रस्ताव भेजने की बात कही गई है। लाठी में 36 मीटर लंबे पुल पर भी काम प्रस्तावित है।
यह अकेला मामला नहीं है।
इसी सप्ताह चमोली जिले के गैरसैंण विकासखंड के कुनीगाड़ क्षेत्र से सामने आई घटना ने सड़क और स्वास्थ्य सुविधा के संबंध को कहीं अधिक गंभीर रूप में सामने रखा। गोगनाणी गांव के 61 वर्षीय बलवंत सिंह की तबीयत बिगड़ने पर गांव में पर्याप्त पुरुष नहीं होने के कारण एक दर्जन से अधिक महिलाओं ने उन्हें डोली पर करीब चार किलोमीटर दूर कोठा बैंड तक पहुंचाया। वहां से उन्हें पहले चौखुटिया और बाद में बेस अस्पताल अल्मोड़ा ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। स्थानीय लोगों का कहना है कि गोगनाणी, दमदड़ और तिमिलपानी के करीब 400 लोगों के लिए सड़क के प्रस्ताव हैं, लेकिन प्रक्रिया वन स्वीकृति में अटकी हुई है।
चमोली के ऐरठा में पांच किलोमीटर डंडी-कंडी
मार्च 2026 में चमोली के ही देवाल विकासखंड के ऐरठा गांव से लगभग ऐसी ही तस्वीर सामने आई थी। हिमंती देवी की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों ने उन्हें डंडी-कंडी में रखकर करीब पांच किलोमीटर पैदल चलकर सड़क और स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया। खास बात यह है कि पदमला-कजेरू-ऐरठा के लिए आठ किलोमीटर मोटर मार्ग को 2021 में स्वीकृति मिलने की बात स्थानीय ग्राम प्रधान ने कही थी, लेकिन मार्च 2026 तक निर्माण शुरू नहीं हो पाया था।
बागेश्वर के सुमगढ़ गांव में भी अगस्त 2026 में बीमार कोमल देवी को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को करीब चार किलोमीटर डोली में ले जाना पड़ा। यानी समस्या केवल उन सड़कों की नहीं है जो बरसात में टूट जाती हैं; ऐसे गांव भी हैं जहां सड़क की प्रतीक्षा ही ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन गई है।
बागेश्वर में अगस्त में ही सात गांवों के लोग सड़क की मांग को लेकर जिला मुख्यालय पहुंचे थे। फुलवाड़ी, फुलाचौंरा, थलीधार, खाईधार, सापुली, गुठण, ठांगधार और आसपास के क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना था कि वे 2006 से सड़क की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने बीमार और प्रसव के मामलों में मरीजों को चार-पांच किलोमीटर पैदल डोली से ले जाने और सड़क के अभाव को पलायन से भी जोड़ा।
उत्तरकाशी में दस किलोमीटर स्ट्रेचर पर मरीज
उत्तरकाशी की अस्सी गंगा घाटी में जुलाई 2025 में बारिश से सड़क टूटने के बाद नौगांव, अगोड़ा, वासदा-डंडालका और भंकोली क्षेत्र का संपर्क प्रभावित हुआ था। उस समय एक बीमार बुजुर्ग को डंडालका से निकटतम मोटर मार्ग तक लगभग दस किलोमीटर स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ा था।
बाद में सेकू गांव में भी मानसून के दो महीने बाद तक सड़क बंद रहने और मरीजों को पालकी से ले जाने की स्थिति दर्ज की गई।
उत्तरकाशी के मोरी क्षेत्र के सेवा गांव की कहानी समस्या का दूसरा पहलू दिखाती है। वहां करीब 11 किलोमीटर सड़क अधूरी रहने के कारण गांव के लोगों की स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी बुनियादी सेवाओं तक पहुंच प्रभावित होने की खबर सामने आई। हिमाचल प्रदेश की सीमा के निकट स्थित इस गांव के लोगों को कई आवश्यकताओं के लिए पड़ोसी राज्य पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस मानसून में समस्या और व्यापक हुई। सितंबर में अल्मोड़ा के सोमेश्वर क्षेत्र में बसौली-नैढोल मार्ग का मोटर पुल बहने से एक दर्जन से अधिक ग्रामीण बस्तियों का संपर्क प्रभावित हुआ। बागेश्वर के लोहाखेत क्षेत्र में ग्रामीणों ने बताया कि मुख्य सड़कें करीब दो महीने से बंद रहने के कारण बीमार लोगों को चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाने में मुश्किल हो रही थी।
एक तरफ 21,915 किमी सड़क, दूसरी तरफ 1,490 गांवों की जरूरत
इस तस्वीर को केवल इस निष्कर्ष तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा कि राज्य में ग्रामीण सड़क संपर्क पर काम नहीं हुआ है। उत्तराखंड सरकार के 25 सितंबर 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत राज्य में 2,826 सड़कों के माध्यम से 21,915 किलोमीटर का नेटवर्क तैयार किया गया है। पीएमजीएसवाई के चौथे चरण के लिए राज्य ने 1,490 गांवों और करीब 9,344 किलोमीटर सड़क की आवश्यकता चिह्नित की है। इनमें सर्वाधिक 249 गांव पिथौरागढ़, 221 अल्मोड़ा, 185 पौड़ी, 175 चमोली, 168 टिहरी, 112 उत्तरकाशी, 111 रुद्रप्रयाग और 101 बागेश्वर में हैं। पहले चक्र में 309 गांवों को सड़क सुविधा से जोड़ने की योजना है।
केंद्र सरकार के मार्च 2026 के आंकड़े बताते हैं कि पीएमजीएसवाई-चतुर्थ के तहत उत्तराखंड में उस समय तक 184 सड़कें और 1,228.20 किलोमीटर लंबाई स्वीकृत हो चुकी थी।
जुलाई में संसद में दिए गए एक अन्य सरकारी आंकड़े में चालू वित्तीय वर्ष के दौरान उत्तराखंड के लिए 566 किलोमीटर सड़क, 38 बड़े पुल और 34 बस्तियों को जोड़ने का लक्ष्य दर्ज किया गया।
इन आंकड़ों को समझने में एक महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर भी ध्यान में रखना होगा। पीएमजीएसवाई में मूल इकाई राजस्व गांव नहीं, बल्कि पात्र ‘बसावट’ है। इसलिए अलग-अलग सरकारी या समाचार स्रोतों में ‘गांव’, ‘बसावट’ और ‘तोक’ की संख्या की सीधी तुलना भ्रामक हो सकती है। राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना विकास एजेंसी भी स्पष्ट करती है कि योजना में पात्रता का निर्धारण बसावट के आधार पर किया जाता है।
यही कारण है कि कम आबादी वाले गांव और तोक लंबे समय तक बड़ी योजनाओं के दायरे से बाहर रह गए। राज्य ने ऐसे क्षेत्रों के लिए मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना बनाई है, जिसका लक्ष्य मुख्यतः 0 से 249 आबादी वाले सड़क संपर्क से वंचित दूरस्थ गांवों को संपर्क सुविधा देना है।
वर्ष 2024 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट में ऐसे 9,888 छोटे गांवों का उल्लेख किया गया था, जो उस समय मोटर सड़क से दूर थे। इसलिए इस संख्या को वर्तमान 2026 की स्थिति न मानकर उस समय की आधाररेखा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सड़क बनना और सड़क का हर मौसम में चलना—दो अलग चुनौतियां
इन घटनाओं से ग्रामीण संपर्क की समस्या के कम से कम तीन अलग रूप सामने आते हैं। पहला, ऐसे गांव जहां सड़क अभी पहुंची ही नहीं। दूसरा, वे सड़कें जो स्वीकृत तो हैं, लेकिन वन भूमि हस्तांतरण, वित्तीय स्वीकृति या दूसरी प्रक्रियाओं में अटकी हैं। तीसरा और संभवतः सबसे कठिन सवाल उन सड़कों का है जो बन चुकी हैं, लेकिन भूस्खलन, अतिवृष्टि, नालों के उफान, रखरखाव की कमी अथवा अधूरे पुलों के कारण साल के महत्वपूर्ण हिस्से में वाहनों के योग्य नहीं रहतीं।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में निर्माण के बाद शुरुआती पांच वर्षों के नियमित रखरखाव को अनुबंध का हिस्सा बनाने का प्रावधान है। इसके बाद रखरखाव की अलग व्यवस्था होती है।
बागेश्वर-पिथौरागढ़ सीमा की धर्मघर-चुचेर-मजखेत-लाठी सड़क का मामला इसलिए विचारणीय है कि यहां समस्या केवल नई सड़क बनाने की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद संपर्क मार्ग को सुरक्षित और उपयोग योग्य बनाए रखने की भी है।
चमोली के सकंड गांव का हालिया उदाहरण बताता है कि प्रशासनिक हस्तक्षेप से लंबित मामलों में गति संभव है। ग्रामीणों द्वारा स्वयं श्रमदान कर सड़क बनाने की खबर सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को सड़क का काम तीन महीने में पूरा करने के निर्देश दिए।
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में हर गांव तक सड़क पहुंचाना मैदानी प्रदेशों जैसा निर्माण कार्य नहीं है। वन भूमि, खड़ी ढलान, भूगर्भीय अस्थिरता, नदियां-नाले, हिमपात, भूस्खलन और लगातार बढ़ती अतिवृष्टि इसकी लागत और कठिनाई दोनों बढ़ाते हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे सड़क तंत्र की तस्वीर बनाना उचित नहीं होगा। लेकिन जब बागेश्वर से चमोली और उत्तरकाशी तक अलग-अलग स्थानों से मरीजों को चार, पांच और यहां तक कि दस किलोमीटर डोली या स्ट्रेचर पर ढोने की घटनाएं सामने आती हैं, तो ये केवल अलग-अलग गांवों की स्थानीय शिकायतें भी नहीं रह जातीं।
सवाल अंततः सड़क की कुल किलोमीटर संख्या से आगे जाता है। किसी पहाड़ी गांव के लिए सड़क का वास्तविक अर्थ तब है जब एंबुलेंस मरीज के पास पहुंच सके, बच्चा नियमित स्कूल जा सके, रसोई गैस का वाहन गांव तक पहुंच सके और बरसात आते ही संपर्क टूटने का भय न रहे। उत्तराखंड ने ग्रामीण सड़क संपर्क में लंबी दूरी तय की है, लेकिन डोली में अस्पताल जाते मरीज और दो दशक बाद भी अधूरी अथवा बदहाल सड़कें यह याद दिलाती हैं कि सड़क की स्वीकृति, सड़क का निर्माण और बारहों महीने सुरक्षित सड़क संपर्क—तीनों एक ही बात नहीं हैं।
