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उत्तराखंड के रेशम उत्पादन में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग

देहरादून, 13 जुलाई (उहि)। उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (यू-सैक) द्वारा आई.आर.डी.टी. प्रेक्षागृह, सर्वे चौक, देहरादून के सभागार में रेशम उत्पादन विकास में रिमोट सेंसिंग और जी.आई.एस. के अनुप्रयोग विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

हिमालय के सर्वागीण विकास एवं पर्यावरणीय संतुलन के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचना तकनीक का महत्वपूर्ण योगदान है। आज अंतरिक्ष तकनीक मानव के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। यह बात कार्यशाला के मुख्य अतिथि नेशनल रिमोट सेसिंग सेन्टर, हैदराबाद के निदेशक डॉ0 प्रकाश चौहान ने कार्यशाला का उद्घाटन करते हुये कही। डॉ0 चौहान ने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी वर्तमान में आम जन मानस की पहली प्राथमिकता बन गयी है। उन्होंने कहा कि हमारा देश अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व के उन चुनिंदा देशों में स्थान पा चुका है जो अपने स्पेस कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य बड़े राष्ट्रों के भी स्पेस कार्यक्रमों में सहायता करता है। उन्होंने कहा कि हम आज अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नासा, यूरोपियन स्पेस एजेन्सी के साथ मिलकर कार्य कर रहे है। यू-सैक ने एन.ई-सैक, शिलांग द्वारा वित पोषित सेरीकल्चर डेवलपमेंट परियोजना में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेशम उत्पादन हेतु उत्तराखण्ड के सम्पूर्ण ब्लॉक में सम्भावित क्षेत्रों को मानचित्रों के रूप में उपलब्ध कराया है, जिससे रेशम विभाग को उन अधिक उत्पादन वाले क्षेत्रों को चिन्हिंत करने में आसानी होगी।


इससे पूर्व केन्द्र के निदेशक डॉ0 एम.पी.एस. बिष्ट ने आमंत्रित अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करने हुये कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी एवं उसके अनुप्रयोग राज्य के भौगोलिक स्थिति को देखते हुये यहॉ के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्द्वन के लिये अत्यन्त लाभकारी सिद्व हो रही है। उन्होंने कहा कि यू-सैक द्वारा उत्तर-पूर्वी अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र, शिलांग के वित्तीय सहयोग से सम्पादित इस परियोजना के तहत किये गये कार्यों को राज्य के रेशम विभाग व अन्य रेखीय विभागों के अधिकारियों व लाभार्थियों के साथ साझा करने हेतु इस एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखण्ड में टसर सिल्क उत्पादन की बहतर सम्भावना है। यहॉ बांज प्राकृतिक रूप से अत्यधिक मात्रा में पैदा होता है जिससे टसर सिल्क का उत्पादन किया जाता है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेशम उत्पादन हेतु उपयुक्त भूमि का चयन सम्भावित क्षेत्रों की उपलब्धता व पहचान कर उपयुक्त प्रजाति के पौधा रोपण एवं उत्पादन में वृद्वि कर किसानों की आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। प्रो0 बिष्ट ने कहा कि यू-सैक राज्य के विभिन्न रेखीय विभागों के उपयोगार्थ उनके विकास कार्यों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तकनीकी के उपयोग हेतु समय-समय पर ट्रेनिंग प्रोग्राम एवं कार्यशाला आयोजित करता है।
उत्तर-पूर्वी अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र, शिलांग (एन.ई-सैक) के निदेशक डॉ0 एस.पी. अग्रवाल ने कहा कि रेशम उत्पादन के विकास में राज्य को अग्रणी बनाने के लिये तकनीकी का उपयोग करना अति आवश्यक है। आर.एस और जी.आई.एस. तकनीक उत्तराखण्ड के सम्पूर्ण क्षेत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कार्यशाला में बोलते हुए उत्तराखण्ड रेशम विभाग के निदेशक श्री ए.के. यादव ने कहा कि हमारा राज्य मलबरी के क्षेत्र में आगे है इसे Ball of Bivoltine के नाम से जाना जाता है। उत्तराखण्ड में उत्पादित रेशम के धागे की क्वालिटी 3ए में है जबकि इन्टरनेशनल ग्रेड 4ए का है। उन्होंन कहा कि पहले हम 2ए धागे का उत्पादन करते थे अब 3ए ग्रेड का उत्पादन कर रहे है। शीघ्र ही उत्तराखण्ड इन्टरनेशनल ग्रेड 4ए के उत्पादन के तरफ भी अग्रसर होगा। उन्होंने कहा कि ओक टसर का वृक्षारोपण जोशीमठ, कपकोट, मुन्सीयारी और चकराता ब्लॉक में कराया गया है। आने वाले समय में हम चार तरह के रेशम के वृक्षों का प्लान्टेशन करने पर विचार कर रहे है।
कार्यशाला के तकनीकी सत्र में रेशम उत्पादन के बारे में बताया कि मलबरी चंपावत को छोड़कर अन्य 12 जिलों के 55 विकास खण्डों के 719 गांवों में उत्पादन किया जा रहा है जिससे 10,000 लाभार्थी वर्तमान में लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि सहतूती रेशम पहले 90 मीट्रिक टन उत्पादन होता था, आज 300 मीट्रिक टन उत्पादन कर रहे है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए यू-सैक की वैज्ञानिक एवं परियोजना इन्चार्ज डॉ0 सुषमा गैरोला ने परियोजना के फेस-2 के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने पौड़ी, चमोली और बागेश्वर जनपद का Suitability
मैप तैयार किया है। जिसमें रिमोट सेंसिंग एवं जी.आई.एस. ऐप्लीकेशन के उपयोग से पोटेंनशियल ऐरिया को आईडेन्टिफाई कर इन सारी सूचनाओं को लाभार्थियों तक पहुॅचाने के लिए सिल्क पोर्टल पर उपलब्ध कराया गया है। जिसे लाभार्थी http://www.silks.csb.gov.in पर सारी सूचनायें प्राप्त कर सकते है।
कार्यशाला में यू-सैक द्वारा तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया, जिनमें 1. ऐप्लिकेशन ऑफ आर.एस. एण्ड जी.आई.एस. इन सेरीकल्चर डेवलपमेंट फेस-2 2. कुम्भ मेला क्षेत्र हरिद्वार का जी.आई.एस. मानचित्रीकरण 3. जियोस्टेटिस्टिकल स्पेशियल वेरिएबिलिटी ऑफ सॉइल न्यूट्रिएंट्स यूजिंग सॉइल हैल्थ कार्ड डेटा का विमोचन उपस्थित अतिथिगणों ने किया।
कार्यशाला में प्रो0 ए.बी. भट्ट, पूर्व कुलपति गढ़वाल विश्वविद्यालय, प्रो0 एस.पी. काला, डॉ0 विक्रम सिंह चौहान- निदेशक, मौसम विज्ञान केन्द्र, प्रो0 अनीता रावत-निदेशक, यू-सर्क, डॉ0 राघवेन्द्र सिंह-निदेशक, आई.आई.आर.एस., डॉ0 सुनित नैथानी, ओ.हो. रेडियो के संस्थापक आर.जे. काव्य, डॉ0 डी.पी. उनियाल-वरिष्ठ वैज्ञानिक, यू-कॉस्ट, चीफ इंजीनियर-पेयजल, श्री सुरेश पन्त, डॉ0 गोपाल कुमार- प्रमुख वैज्ञानिक वैज्ञानिक, आई.एस.आर., डॉ0 रतन कुमार-संयुक्त निदेशक, उद्यान, यू-सैक के वैज्ञानिक डॉ0 प्रियदर्शी उपाध्याय, डॉ0 अरूणा रानी, डॉ0 नीलम रावत, डॉ0 आशा थपलियाल, श्री शशंाक लिंगवाल, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, श्री पुष्कर कुमार, श्री आर.एस. मेहता, श्री हेमन्त बिष्ट-सिस्टम मैनेजर के अतिरिक्त श्री गुरू राम राय विश्वविद्यालय, दून विश्वविद्यालय, लोक निर्माण विभाग, कृषि विभाग, रेशम विभाग, सेंटर स्वायल कन्जरवेशन, आई.आई.आर.एस., एफ.आर.आई., एफ.एस.आई., वन विभाग आदि रेखीय विभागों के लगभग 200 वैज्ञानिकों/अधिकारियों ने प्रतिभाग किया।

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