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ट्रम्प की व्यापारिक घेरेबंदी: भारत का हित या कानूनी भंवर?

-उषा रावत-

​अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के 20 फरवरी 2026 के फैसले ने वैश्विक व्यापार की बिसात पर एक ऐसा मोहरा चल दिया है, जिसने राष्ट्रपति ट्रम्प की आक्रामक टैरिफ नीति की बुनियाद हिला दी है। कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से यह व्यवस्था दी कि राष्ट्रपति ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ का सहारा लेकर शांति काल में मनमाने आयात शुल्क नहीं थोप सकते, क्योंकि कर लगाने का संवैधानिक अधिकार केवल अमरीकी कांग्रेस के पास है। यह फैसला उन देशों के लिए एक बड़ी कानूनी जीत और ‘हित’ के रूप में देखा जा रहा है, जो ट्रम्प के भारी-भरकम ‘पारस्परिक शुल्कों’ के साये में व्यापार कर रहे थे। भारतीय निर्यातकों के लिए यह राहत की बात है कि जिन शुल्कों को डराकर समझौते की मेज पर लाया जा रहा था, उनका कानूनी आधार ही कमजोर पड़ गया है।

भारत-अमरीकी समझौते का डगमगाता भविष्य

​जहाँ तक भारत के साथ हुए हालिया व्यापारिक समझौते का प्रश्न है, तो इसकी स्थिति फिलहाल ‘अधर’ में दिखाई देती है। फरवरी की शुरुआत में भारत ने अमरीकी दबाव के बीच एक अंतरिम समझौता किया था, जिसमें 50 प्रतिशत के डरावने टैरिफ से बचने के लिए 18 प्रतिशत का शुल्क स्वीकार किया गया था। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मूल टैरिफ को ही अवैध करार दे दिया है, तो भारत के भीतर यह विमर्श तेज हो गया है कि क्या हमें इस 18 प्रतिशत की शर्त को भी ढोना चाहिए? वास्तविकता यह है कि ट्रम्प प्रशासन इस फैसले के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं है और उसने 10 प्रतिशत का एक नया वैश्विक बेसलाइन टैरिफ घोषित कर दिया है, जिससे भारत और अमेरिका के बीच बनी सहमति कानूनी दांव-पेंचों में उलझ गई है।

फंसे हुए समझौतों की कड़वी हकीकत

​न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट में काफी हद तक सच्चाई नजर आती है जिसमें कहा गया है कि हाल ही में हुए समझौते ‘फंस’ गए हैं। असल में जापान, ब्रिटेन और वियतनाम जैसे देशों ने ये सौदे किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि ट्रम्प के टैरिफ युद्ध से बचने की ‘मजबूरी’ में किए थे। अब जब कोर्ट ने राष्ट्रपति के हाथ बांध दिए हैं, तो ये देश उन शर्तों से पीछे हटने के रास्ते तलाश रहे हैं जो उन पर थोपी गई थीं। भारत के संदर्भ में भी यही जोखिम है कि यदि हम अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर की अमरीकी खरीद का वादा पूरा करते हैं और बदले में हमें वह बाजार पहुंच नहीं मिलती जिसकी उम्मीद थी, तो यह सौदा एकतरफा होकर रह जाएगा।

भारत इस समय एक दोराहे पर

​निष्पक्ष विश्लेषण यह कहता है कि भारत इस समय एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ कानूनी जीत ने हमें मोलभाव की शक्ति दी है, तो दूसरी तरफ ट्रम्प प्रशासन का अड़ियल रुख हमारे कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के लिए चुनौती बना हुआ है। ‘न्यूयोर्क टाइम्स’ का यह दावा कि ट्रम्प के समझौते संकट में हैं, इसलिए सही प्रतीत होता है क्योंकि ये किसी ठोस आर्थिक नीति के बजाय प्रशासनिक आदेशों पर टिके थे। भारत के लिए अब सबसे जरूरी यह है कि वह अपनी व्यापारिक कूटनीति को केवल राष्ट्रपति के आदेशों तक सीमित न रखकर अमरीकी कांग्रेस के साथ भी तालमेल बिठाए, ताकि भविष्य के व्यापारिक संबंध किसी एक अदालती फैसले से धराशायी न हों।

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