कोबरा का जहर: जानलेवा भी और जान बचाने वाला भी !

Cobra venom is dominated by Cytotoxins (CTXs), small three-finger proteins that primarily cause local tissue necrosis and cardiac failure by disrupting cell membranes. Research by Kalita, Utkin, and Mukherjee highlights that CTXs often work synergistically with PLA₂ enzymes, amplifying toxicity. A major clinical challenge remains: due to their low molecular mass, CTXs are poorly neutralized by traditional antivenoms, often leading to irreversible tissue damage or amputation. However, their selective toxicity also offers promising potential for future anti-cancer drug development.

– जयसिंह रावत –
सांप का जहर प्रकृति के सबसे जटिल रासायनिक संयोजनों में से एक है। हिंदी की प्रसिद्ध कहावत “विषस्य विषमौषधम्” यानी ‘विष ही विष की औषधि है’, कोबरा के जहर के संदर्भ में पूरी तरह सटीक बैठती है। कोबरा (Naja प्रजाति) के विष में कई प्रकार के प्रोटीन और एंजाइम पाए जाते हैं, लेकिन उनमें सबसे प्रमुख और घातक ‘साइटोटॉक्सिन्स’ (CTXs) होते हैं। ये न केवल शरीर के ऊतकों को नष्ट करते हैं, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए एंटीवेनम निर्माण में एक बड़ी चुनौती भी पेश करते हैं।
साइटोटॉक्सिन्स की आणविक संरचना और विशेषता
कोबरा विष में पाए जाने वाले साइटोटॉक्सिन्स वास्तव में ‘थ्री-फिंगर टॉक्सिन’ (3FTx) परिवार का हिस्सा हैं। इनका नाम इनकी शारीरिक बनावट के कारण पड़ा है, जो एक हथेली से निकली तीन उंगलियों जैसी दिखती है। ये गैर-एंजाइमेटिक प्रोटीन होते हैं जिनका आणविक भार काफी कम (लगभग 6 से 9 केडीए) होता है। शोध बताते हैं कि कोबरा के कुल विष प्रोटिओम में इनकी हिस्सेदारी 40 से 60 प्रतिशत तक होती है। संरचनात्मक रूप से ये टॉक्सिन अत्यंत स्थिर होते हैं क्योंकि इनमें चार डाइसल्फाइड पुल होते हैं जो इन्हें मजबूती प्रदान करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से इन्हें इनके अमीनो एसिड अनुक्रम के आधार पर ‘S-टाइप’ और ‘P-टाइप’ में विभाजित किया गया है। कलिता, उत्किन और मुखर्जी (2021) के शोध के अनुसार, ये सूक्ष्म भिन्नताएं ही तय करती हैं कि जहर कोशिका की झिल्ली में कितनी गहराई तक प्रवेश करेगा और उसे किस तरह नष्ट करेगा।
कोशिका मृत्यु के विविध वैज्ञानिक मार्ग
जब कोबरा किसी जीव को काटता है, तो ये साइटोटॉक्सिन्स शरीर की कोशिकाओं की बाहरी झिल्ली (Lipid Bilayer) पर सीधा हमला करते हैं। ये टॉक्सिन कोशिका झिल्ली में छिद्र बना देते हैं, जिससे कोशिका के भीतर का संतुलन बिगड़ जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘नेक्रोसिस’ और ‘एपोप्टोसिस’ कहा जाता है। नेक्रोसिस वह प्रक्रिया है जिसमें ऊतक सड़ने लगते हैं, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘डर्मोनेक्रोसिस’ कहते हैं। आशीष के. मुखर्जी एवं अन्य के अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि ये टॉक्सिन केवल बाहरी झिल्ली ही नहीं, बल्कि कोशिका के भीतर मौजूद ‘माइटोकॉन्ड्रिया’ (कोशिका का पावरहाउस) और ‘लाइसोसोम’ को भी नष्ट कर देते हैं। जब माइटोकॉन्ड्रिया बाधित होता है, तो कोशिका की ऊर्जा समाप्त हो जाती है और वह स्वतः मृत्यु की ओर बढ़ जाती है। यही कारण है कि कोबरा के काटने वाली जगह पर मांस तेजी से गलने लगता है और गहरा घाव हो जाता है।
हृदय घात और कार्डियोटॉक्सिसिटी का संकट
साइटोटॉक्सिन्स का एक अन्य खतरनाक रूप ‘कार्डियोटॉक्सिन’ है। ये मुख्य रूप से हृदय की मांसपेशियों की कोशिकाओं (Myocytes) को निशाना बनाते हैं। ये टॉक्सिन हृदय की कोशिकाओं में कैल्शियम के प्रवाह को अनियंत्रित कर देते हैं, जिससे हृदय की धड़कन की लय बिगड़ जाती है और अंततः हृदय गति रुक सकती है। मुखर्जी और उनकी टीम द्वारा रेखांकित किया गया है कि P-टाइप साइटोटॉक्सिन्स, S-टाइप की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली कार्डियोटॉक्सिन होते हैं। इनके प्रभाव से हृदय की मांसपेशियों में संकुचन पैदा होता है जो घातक सिद्ध होता है। यही कारण है कि कोबरा के शिकार व्यक्ति में अक्सर तंत्रिका तंत्र की विफलता के साथ-साथ हृदय संबंधी जटिलताएं भी देखी जाती हैं।
जहर की भौगोलिक विविधता और क्षेत्रीय प्रभाव
कोबरा के जहर की रासायनिक संरचना पूरी दुनिया में एक जैसी नहीं होती। इसमें भौगोलिक स्थान के कारण भारी विविधता पाई जाती है। मास स्पेक्ट्रोमेट्री आधारित अध्ययनों से पता चला है कि अफ्रीकी ‘थूकने वाले कोबरा’ (Spitting Cobras) जैसे नाजा निग्रिकॉलिस में साइटोटॉक्सिन्स की मात्रा 73 प्रतिशत तक हो सकती है, जबकि एशियाई कोबरा जैसे नाजा कौथिया में यह मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। कलिता और मुखर्जी के अनुसार, भौगोलिक कारणों से जहर में आने वाला यह बदलाव ही यह तय करता है कि किसी विशेष क्षेत्र के लिए कौन सा एंटीवेनम प्रभावी होगा। यह विविधता सांपों के भोजन, जलवायु और उनके विकासवादी इतिहास पर निर्भर करती है, जो चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी पहेली बनी हुई है।

टॉक्सिन्स की सहक्रियात्मक शक्ति (Synergism)
कोबरा का जहर केवल एक अकेले प्रोटीन का हमला नहीं है, बल्कि यह एक ‘टीम वर्क’ है। साइटोटॉक्सिन्स अक्सर ‘फॉस्फोलिपेज A2’ (PLA2) नामक एंजाइम के साथ मिलकर काम करते हैं। जब ये दोनों घटक आपस में जुड़ते हैं, तो एक ‘कॉम्प्लेक्स’ का निर्माण होता है जो व्यक्तिगत घटकों की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी होता है। मुखर्जी एवं अन्य ने अपने शोध में दिखाया है कि कोबरा विष में ये घटक मिलकर ‘हीटो-ओलिगोमर’ बनाते हैं, जो कोशिका झिल्लियों को भेदने में अकेले टॉक्सिन से कहीं ज्यादा सक्षम होते हैं। यह सहक्रियात्मक प्रभाव ही कोबरा के जहर को इतना घातक बनाता है कि वह शरीर के रक्षा तंत्र को कुछ ही मिनटों में ध्वस्त कर देता है।
एंटीवेनम की सीमाएं और वैज्ञानिक चुनौतियां
वर्तमान में सांप के काटने का एकमात्र प्रभावी इलाज ‘एंटीवेनम’ है, जिसे आमतौर पर घोड़ों या भेड़ों में जहर की अल्प मात्रा इंजेक्ट करके बनाया जाता है। हालांकि, साइटोटॉक्सिन्स के मामले में यह प्रक्रिया उतनी सफल नहीं है। चूंकि ये टॉक्सिन बहुत छोटे (Low Molecular Mass) होते हैं, इसलिए वे जानवरों के शरीर में पर्याप्त ‘इम्यून रिस्पांस’ पैदा नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप, उत्पादित एंटीवेनम में साइटोटॉक्सिन्स को बेअसर करने वाली एंटीबॉडीज की कमी होती है। कलिता, उत्किन और मुखर्जी के शोध पत्र में यह चिंता जताई गई है कि वर्तमान के कई पॉलीवैलेंट एंटीवेनम न्यूरोटॉक्सिन्स को तो रोकने में सक्षम हैं, लेकिन वे साइटोटॉक्सिन्स द्वारा किए जाने वाले ऊतक विनाश (Tissue Damage) को पूरी तरह नहीं रोक पाते।
स्थानीय ऊतक क्षति और सर्जिकल जटिलताएं
कोबरा विषाक्तता के सबसे दुखद पहलुओं में से एक अपरिवर्तनीय ऊतक क्षति है। साइटोटॉक्सिन्स के प्रभाव से शुरू हुआ ‘डर्मोनेक्रोसिस’ अक्सर एंटीवेनम देने के बाद भी जारी रहता है। इसका कारण यह है कि एंटीवेनम रक्त प्रवाह में तो काम करता है, लेकिन ऊतकों के भीतर गहरे धंसे हुए इन छोटे टॉक्सिन्स तक नहीं पहुँच पाता। चिकित्सा जगत में इसे एक बड़ी विफलता माना जाता है। पीड़ित को अक्सर बार-बार सर्जरी, सड़े हुए मांस की सफाई (Debridement) और गंभीर स्थितियों में अंगों को काटने की आवश्यकता होती है। मुखर्जी एवं अन्य का शोध यह सुझाव देता है कि जब तक एंटीवेनम की डिजाइन में इन छोटे प्रोटीनों की पहचान करने की क्षमता नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक स्थानीय क्षति को रोकना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
नैनोबॉडीज और कैंसर अनुसंधान
जहाँ एक ओर साइटोटॉक्सिन्स विनाश का कारण हैं, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक इनमें ‘जीवन रक्षक’ संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। अमृता स्कूल ऑफ नैनोसाइंसेज (कोच्चि) और IASST (गुवाहाटी) जैसे संस्थानों में चल रहे शोध यह दर्शाते हैं कि चूंकि ये टॉक्सिन कैंसर कोशिकाओं के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाते हैं, इसलिए इनका उपयोग ‘एंटी-कैंसर’ दवाओं के रूप में किया जा सकता है। भविष्य में प्रोटीन इंजीनियरिंग और ‘नैनोबॉडीज’ तकनीक के माध्यम से ऐसे एंटीवेनम बनाने की योजना है जो सीधे प्रभावित स्थान पर लगाए जा सकें और ऊतकों को गलने से बचा सकें। मुखर्जी का मानना है कि यदि हम साइटोटॉक्सिन्स के आणविक तंत्र को पूरी तरह समझ लें, तो हम न केवल सांप के काटने का सटीक इलाज ढूंढ लेंगे, बल्कि चिकित्सा विज्ञान में नई दवाओं के द्वार भी खोल सकेंगे।
प्रमुख संदर्भ एवं आभार:
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Kalita, B., Utkin, Y. N., & Mukherjee, A. K. (2021). “Cobra Venom Cytotoxins: Comprehensive Review.” Amrita School of Nanosciences and Molecular Medicine, IASST Guwahati, and Russian Academy of Sciences.
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Kondria, A. (2002). “Cobra venom cytotoxins: structure-function relationships.”
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Petras, D., et al. (2016). “Snake Venomics of African Cobras.”
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Chaim-Matyas, A., et al. (1995). “Synergy between cytotoxins and phospholipases.”
