हिमालयी ग्लेशियरों की रहस्यमयी चाल: मलबे की परत तय कर रही है बर्फ के पिघलने की रफ्तार

Recent studies by the Wadia Institute of Himalayan Geology (WIHG) reveal that the layer of debris covering Himalayan glaciers plays a critical role in their melting rates and retreat. By comparing Ladakh’s Penzilungpa (thick debris) and Durung-Drung (thin debris) glaciers from 1971 to 2019, researchers found that debris thickness significantly alters how glaciers respond to climate change. Beyond rising temperatures, factors like slope, snout geometry, and the formation of proglacial lakes are vital to understanding glacial mass balance. This research is crucial for water-stressed regions like Ladakh, where shifting glacial patterns directly threaten agriculture and increase the risk of catastrophic Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs).-JS Rawat

–जयसिंह रावत –
हिमालय के ग्लेशियर केवल बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं, बल्कि उनके व्यवहार को समझने के लिए उनकी सतह पर बिछे मलबे के आवरण को समझना भी अनिवार्य है। हालिया वैज्ञानिक शोधों से यह स्पष्ट हुआ है कि किसी ग्लेशियर की सतह पर जमा पत्थर और मिट्टी का घेरा उसके संकुचित होने, पीछे हटने और उसके कुल द्रव्यमान के संतुलन में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य के अध्ययनों में अगर हम इन कारकों को नजरअंदाज करते हैं, तो जलवायु परिवर्तन के प्रति ग्लेशियरों की वास्तविक प्रतिक्रिया को समझना नामुमकिन होगा। हिमालयी क्षेत्र में हिमनदों के निर्माण का अत्यधिक महत्व होने के बावजूद, इनकी आंतरिक गतिकी और इसे प्रभावित करने वाले सूक्ष्म कारकों के बारे में अब तक जानकारी का अभाव रहा है।
जलवायु और स्थलाकृति का जटिल जाल
हिमालयी पर्वत श्रृंखला के विभिन्न क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर और उनके द्रव्यमान संतुलन में काफी विविधता देखी गई है। यह अंतर मुख्य रूप से उस क्षेत्र की भौगोलिक बनावट और स्थानीय जलवायु से प्रेरित है। शोधकर्ताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने की बदलती दर और बर्फ की मोटाई या वेग जैसे सहायक डेटा की कमी के कारण जलवायु परिवर्तन के सटीक प्रभावों का एक सुसंगत चित्र तैयार करना कठिन रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों की एक विशिष्ट पहचान यह है कि ये मुख्य रूप से मलबे की मोटी परतों से ढके हुए हैं और ‘लघु हिमयुग’ की समाप्ति के बाद से ही लगातार घट रहे हैं।
अधिहिमनदीय मलबे का बर्फ पर नियंत्रण
ग्लेशियर की ऊपरी सतह पर मौजूद मलबे का सूर्य के प्रकाश, हवा और वर्षा के साथ एक विशेष संबंध होता है, जो बर्फ के पिघलने की दर को नियंत्रित करता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि मलबे की यह मोटाई तय करती है कि ग्लेशियर जलवायु के प्रति कितनी तेजी से या कितनी धीमी प्रतिक्रिया देगा। इस महत्वपूर्ण विषय पर गहराई से शोध करने के लिए भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत कार्यरत वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG), देहरादून के वैज्ञानिकों की एक टीम ने मोर्चा संभाला। डॉ. मनीष मेहता और उनके साथियों ने ग्रीष्म ऋतु में बर्फ के पिघलने की दर और ग्लेशियरों के अंतिम छोर (टर्मिनस) के पीछे हटने की प्रक्रिया का बारीकी से मूल्यांकन किया।
दो ग्लेशियरों की तुलना और शोध के निष्कर्ष
शोध दल ने 1971 से 2019 के बीच की लंबी अवधि का अध्ययन करने के लिए दो अलग-अलग विशेषताओं वाले ग्लेशियरों को चुना। इनमें से एक लद्दाख के लेह जिले की सुरु नदी घाटी में स्थित पेनसिलुंगपा ग्लेशियर है, जिसकी पहचान उसकी सतह पर मौजूद मलबे की मोटी परत है। वहीं दूसरी ओर, जांस्कर पर्वत श्रृंखला की डोडा नदी घाटी में स्थित डुरुंग-द्रुंग ग्लेशियर है, जहाँ मलबे का आवरण काफी पतला है। इन दोनों के तुलनात्मक विश्लेषण से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि मलबे की मोटाई द्रव्यमान संतुलन की प्रक्रिया को कैसे प्रभावित करती है।
‘सस्टेनेबिलिटी’ नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन ने यह साबित किया है कि ग्लेशियर के पीछे हटने की दर केवल जलवायु परिवर्तन पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इसमें ग्लेशियर की बनावट, ऊंचाई, ढलान और उसके आस-पास बनी झीलों की उपस्थिति जैसे कारक भी महत्वपूर्ण हैं। यह शोध इस बात पर जोर देता है कि ग्लेशियरों के अध्ययन में अब उनकी गतिकी के साथ-साथ इन भौगोलिक विविधताओं को शामिल करना अनिवार्य है, ताकि हम हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के भविष्य का सटीक अनुमान लगा सकें।
लद्दाख के जल भविष्य पर गहराता संकट
लद्दाख जैसे उच्च ऊंचाई वाले मरुस्थलीय क्षेत्रों के लिए यह शोध केवल वैज्ञानिक आँकड़ा नहीं, बल्कि जीवन-मरण का प्रश्न है। यहाँ का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि व्यवस्था पूरी तरह से ग्लेशियरों से निकलने वाले पानी पर टिकी है। यदि मलबे के आवरण के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की दर में अनपेक्षित बदलाव आते हैं, तो यह सीधे तौर पर सुरु और डोडा जैसी नदी घाटियों के जल प्रवाह को प्रभावित करता है। लद्दाख में पहले से ही सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा रहा है। ऐसे में मलबे की परत के प्रभाव को समझना स्थानीय समुदायों के लिए भविष्य की जल संचयन योजनाओं और खेती की रणनीतियों को तैयार करने में मददगार साबित होगा।
ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड
ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) एक ऐसी आकस्मिक और विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है, जो तब घटित होती है जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी अस्थाई झील का प्राकृतिक बांध—जो अक्सर मिट्टी, पत्थर और मलबे से बना होता है—अचानक टूट जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण जब ग्लेशियर तेजी से पीछे हटते हैं, तो उनके मुहाने पर विशाल झीलों का निर्माण होने लगता है। इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने, भारी वर्षा होने या ऊपर से बर्फ की चट्टान गिरने के कारण ये बांध फूट सकते हैं, जिससे निचले इलाकों में अत्यधिक वेग के साथ मलबे और पानी का सैलाब आता है। हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह की आपदाएं न केवल गांवों और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर सकती हैं, बल्कि ये जलविद्युत परियोजनाओं और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी एक गंभीर खतरा बनी हुई हैं।
(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार और कई पुस्तकों के लेखक हैं तथा इस न्यूज़ पोर्टल के मानद सम्पादकीय सदस्य के रूप में योगदान देते हैं.—एडमिन)
