हिमालय के जन्म से पहले की गाथा: लद्दाख की चट्टानों में कैद 130 मिलियन वर्षों का इतिहास

SCIENTISTS HAVE DECODED THE EVOLUTION OF THE LADAKH MAGMATIC ARC IN THE NW HIMALAYA, THAT ACTS AS A AROUND 130-MILLION-YEAR, RECORD OF PLATE TECTONICS THAT DOCUMENT THE SUBDUCTION, MATURATION, AND COLLISION BETWEEN THE INDIAN AND EURASIAN PLATES. MILLIONS OF YEARS BEFORE THE HIMALAYA BECAME THE TALLEST MOUNTAINS ON EARTH, THE REGION THAT IS NOW CALLED LADAKH LAY ABOVE AN OCEAN CALLED THE NEO-TETHYS OCEAN. BELOW THAT ANCIENT SEA, GIANT SLABS OF EARTH’S CRUST SLOWLY PLUNGED INTO THE MANTLE IN A PROCESS KNOWN AS SUBDUCTION LEADING TO THE FORMATION OF THE LADAKH MAGMATIC ARC (LMA). LMA IS A BELT OF IGNEOUS ROCKS IN THE TRANS-HIMALAYA FORMED IN THE PERIOD JURASSIC TO EOCENE- 201.3 MILLION YEARS AGO TO 33.9 MILLION YEAR (MA).
BY- JAY SINGH RAWAT
हिमालय की गगनचुंबी चोटियों के वजूद में आने से करोड़ों साल पहले, लद्दाख का इलाका एक विशाल महासागर की हलचलों का केंद्र था। हालिया भू-वैज्ञानिक शोध ने यह सिद्ध किया है कि लद्दाख की चट्टानें दरअसल एक ‘टाइम मशीन’ की तरह हैं, जो हमें 130 मिलियन वर्ष पीछे ले जाती हैं। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने ‘लद्दाख मैग्मैटिक आर्क’ के रासायनिक विश्लेषण से यह पता लगाया है कि कैसे टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने, समुद्र के सिमटने और महाद्वीपों के भीषण टकराव ने दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखला को जन्म दिया। यह लेख इन्हीं वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर हिमालय के उस ‘अदृश्य इतिहास’ की पड़ताल करता है, जो लद्दाख के पत्थरों में दर्ज है।
नियो-टेथिस महासागर और आग से बनी चट्टानें
हिमालय के अस्तित्व में आने से लाखों साल पहले, लद्दाख का यह हिस्सा ‘नियो-टेथिस’ नामक एक विशाल प्राचीन महासागर की गोद में स्थित था। उस समय पृथ्वी की बाहरी परत की विशाल प्लेटें ‘सबडक्शन’ नामक प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे नीचे की ओर धंस रही थीं। इसी भूगर्भीय उठापटक ने लद्दाख मैग्मैटिक आर्क को जन्म दिया, जो मुख्य रूप से जुरासिक से इओसीन काल (लगभग 201 से 33 मिलियन वर्ष पूर्व) के दौरान बनी आग्नेय चट्टानों की एक लंबी पट्टी है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इन चट्टानों के सूक्ष्म रसायनिक विश्लेषण के जरिए उस धीमी लेकिन शक्तिशाली हलचल का पता लगाया है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की नियति बदल दी।
तीन चरणों में सिमटा भूगर्भीय विकास
शोधकर्ताओं के अनुसार, लद्दाख के इस मैग्मा विकास का इतिहास तीन मुख्य चरणों में बंटा हुआ है, जो 160 मिलियन वर्ष से लेकर 45 मिलियन वर्ष से भी कम समय तक फैला है। पहले चरण में यह क्षेत्र समुद्र से निकलते ज्वालामुखी द्वीपों की एक श्रृंखला जैसा दिखता था, जिसे ‘द्रास-निदार द्वीप चाप’ कहा जाता है। इन चट्टानों के रासायनिक संकेत बताते हैं कि उस समय मैग्मा सीधे धरती के मेंटल (भीतरी परत) से निकल रहा था। इसके बाद दूसरे चरण में, जब प्लेटें और करीब आईं, तो जमीन के भीतर ग्रेनाइट के विशाल पिंड बने जिन्हें ‘लद्दाख बाथोलिथ’ कहा जाता है। इस दौरान महाद्वीपीय पदार्थों और तलछटों का मैग्मा में मिलना शुरू हो गया था, जो इस बात का संकेत था कि भारतीय और यूरेशियन प्लेटों का टकराव अब निकट है।
महाद्वीपों का टकराव और हिमालय का उदय
जैसे-जैसे समय बीता, भारतीय प्लेट और यूरेशिया के बीच का फासला खत्म होने लगा और नियो-टेथिस महासागर पूरी तरह बंद हो गया। इस टकराव ने न केवल हिमालय को ऊपर की ओर धकेला, बल्कि मैग्मा की रासायनिक संरचना को भी पूरी तरह बदल दिया। टकराव के अंतिम दौर में भी पिघली हुई चट्टानें दरारों से बाहर निकलती रहीं, जिससे गहरे रंग की ज्वालामुखीय चट्टानों की परतें बनीं जिन्हें ‘मैफिक डाइक’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने स्ट्रोंटियम और नियोडिमियम जैसे दुर्लभ तत्वों के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया का एक ‘टाइम मैप’ तैयार किया है। यह शोध निष्कर्ष निकालता है कि लद्दाख की ये चट्टानें महज पत्थर नहीं, बल्कि एक ‘जियोलॉजिकल टाइम मशीन’ हैं, जो बताती हैं कि कैसे करोड़ों वर्षों के पुनर्चक्रण और टकराव ने आज के भूगोल को आकार दिया है।
पत्थरों की जुबानी, हिमालय की कहानी’
वैज्ञानिकों ने लद्दाख मैग्मैटिक आर्क (LMA) के माध्यम से पृथ्वी के 130 मिलियन वर्ष पुराने रहस्यों की परतें खोली हैं। यह शोध केवल पत्थरों का अध्ययन नहीं, बल्कि उस समय का ‘लॉग-बुक’ है जब भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच ‘नियो-टेथिस’ महासागर लहराता था। वाडिया संस्थान के इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि कैसे तीन चरणों में हुए प्लेटों के टकराव और ज्वालामुखी गतिविधियों ने आज के हिमालय की आधारशिला रखी।
प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.1016/j.gsf.2026.102260
