पर्यावरणमौसम

जलवायु परिवर्तन से बदला मौसम चक्र, देश में बढ़ीं चरम मौसमी घटनाएं: सरकार

 

नई दिल्ली, 19 मार्च। केंद्र सरकार ने माना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश के मौसम चक्र में स्पष्ट बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं। सरकार के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में तापमान वृद्धि, भारी वर्षा की घटनाओं, सूखे, चक्रवातों की तीव्रता और समुद्र-स्तर में बढ़ोतरी जैसे संकेत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। यह जानकारी केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान एवं विज्ञान-प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में दी। यह जानकारी केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान एवं विज्ञान-प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 19 मार्च 2026 को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी

तापमान बढ़ा, मौसम का स्वभाव बदला

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया  कि सरकार ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का आकलन का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 1901 से 2018 के बीच देश में सतही वायु तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, वर्ष 1951 से 2015 के दौरान उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में समुद्र की सतह का तापमान करीब 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, वायुमंडलीय नमी में भी वृद्धि हुई है, जिससे मानसून की अनिश्चितता और चरम मौसमी स्थितियों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।

सरकार के मुताबिक, मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों, एरोसोल प्रभाव, भूमि उपयोग और भूमि आवरण में बदलाव ने भारतीय क्षेत्र की जलवायु पर प्रत्यक्ष असर डाला है। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर भारी वर्षा, सूखा और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तीव्रता बढ़ी है।

हिमालय, मध्य भारत और तटीय क्षेत्रों पर अधिक असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य, उत्तरी और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही उत्तर, उत्तर-पश्चिम और पड़ोसी मध्य भारत के कई हिस्सों में मध्यम सूखे की स्थिति और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के विस्तार के संकेत मिले हैं। तटीय क्षेत्रों में चक्रवात संबंधी आपदाओं का खतरा भी बढ़ा है।

विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र में ऊंचाई-निर्भर ताप वृद्धि, पश्चिमी विक्षोभ के पैटर्न में बदलाव, बर्फबारी के स्वरूप में परिवर्तन, ग्लेशियरों का पीछे हटना और अल्प अवधि की तीव्र वर्षा की घटनाओं में वृद्धि जैसे बदलाव सामने आए हैं। सरकार ने माना कि ये संकेत भविष्य में जल संसाधन, कृषि, पर्वतीय पारिस्थितिकी और आपदा जोखिम को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

समुद्रस्तर में तेजी से बढ़ोतरी

सरकार ने बताया कि हिंद महासागर में समुद्र-स्तर बढ़ने की रफ्तार भी चिंता का विषय है। उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर पिछली सदी (1900-2000) के दौरान हिंद महासागर में समुद्र-स्तर लगभग 1.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ा, जबकि 1993 से 2015 के बीच उत्तरी हिंद महासागर में यह रफ्तार बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष हो गई।

भारतीय तट के कुछ प्रमुख स्थानों पर 1993-2020 के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर समुद्र-स्तर वृद्धि के रुझान इस प्रकार बताए गए हैं—
मुंबई में 4.59 मिमी/वर्ष, मोरमुगाओ में 4.30 मिमी/वर्ष, कोच्चि में 4.10 मिमी/वर्ष, चेन्नई में 4.31 मिमी/वर्ष, विशाखापत्तनम में 4.27 मिमी/वर्ष और पारादीप में 4.43 मिमी/वर्ष।

आईएमडी ने जारी कियाक्लाइमेट हैजर्ड एंड वल्नरेबिलिटी एटलस

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने 13 सबसे खतरनाक मौसम संबंधी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए वेब-आधारित ‘क्लाइमेट हैजर्ड एंड वल्नरेबिलिटी एटलस ऑफ इंडिया’ भी जारी किया है। सरकार का कहना है कि यह एटलस राज्यों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और प्रशासनिक अधिकारियों को संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने, चरम मौसम की घटनाओं के लिए पूर्व तैयारी करने और जलवायु-लचीला बुनियादी ढांचा विकसित करने में मदद करता है।

इसके अलावा, आईएमडी ने पिछले 30 वर्षों के दौरान राज्यों और जिलों के स्तर पर वर्षा के बदलते पैटर्न और चरम घटनाओं का अध्ययन किया है। इस संबंध में ‘वर्षा परिवर्तनशीलता और परिवर्तन’ पर 29 रिपोर्टें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

सरकार ने गिनाईं कई राष्ट्रीय पहलें

जलवायु परिवर्तन और समुद्र-स्तर वृद्धि के प्रभावों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने कई प्रमुख कदम उठाए हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC), राज्यों की जलवायु कार्य योजनाएं, आपदा प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, जलवायु-लचीली कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, जल संरक्षण कार्यक्रम, तथा तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियम शामिल हैं।

सरकार ने कहा कि इन पहलों का उद्देश्य देश को बदलते मानसून, अधिक तीव्र गर्मी, सूखा, बाढ़, चक्रवात और समुद्र-स्तर वृद्धि जैसी चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम और लचीला बनाना है। भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य भी रखा है, ताकि उत्सर्जन में कमी लाकर दीर्घकालिक जलवायु जोखिमों को नियंत्रित किया जा सके।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!