ब्लैक होल की ‘हवाओं’ का रहस्य सुलझाने की दिशा में अहम शोध

Scientists have tracked the generation of this wind and how it is driven by the disc of diffused swirling materials around the black hole called an accretion disc. Matter flowing out due to the wind should contaminate the environment play a major role in the evolution of the region harbouring these black holes. Therefore how such a process can be triggered need to be ascertained. Though these processes are still at the level of theoretical prediction, consensus has not been reached.
By- Jyoti Rawat
ब्लैक होल को आमतौर पर ऐसी रहस्यमयी खगोलीय वस्तु माना जाता है, जो अपने आसपास की हर चीज़ को अपनी ओर खींच लेती है। लेकिन वैज्ञानिकों ने अब संकेत दिए हैं कि ब्लैक होल केवल निगलते ही नहीं, बल्कि अपने आसपास बनने वाली एक्रीशन डिस्क से बेहद तेज़ ‘हवाएं’ भी उत्पन्न कर सकते हैं। हालिया शोध में इन संभावित हवाओं की उत्पत्ति और उनके संचालन तंत्र को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
कैसे बनती है ब्लैक होल के आसपास एक्रीशन डिस्क
जब गैस और धूल जैसे पदार्थ किसी ब्लैक होल की ओर गिरते हैं, तो वे उसके चारों ओर घूमते हुए एक चक्राकार संरचना बना लेते हैं, जिसे एक्रीशन डिस्क कहा जाता है। इस डिस्क में पदार्थ के लगातार जमा होने से तापमान लाखों डिग्री तक पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसी प्रक्रिया के दौरान कुछ पदार्थ ब्लैक होल में समाने के बजाय अत्यधिक वेग से बाहर की ओर फेंके जा सकते हैं, जो ‘हवाओं’ के रूप में देखे जाते हैं।

आकाशगंगा के विकास में भी हो सकती है बड़ी भूमिका
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये हवाएं केवल ब्लैक होल के आसपास की गतिविधि तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे अपने मेजबान आकाशगंगा के विकास को भी प्रभावित कर सकती हैं। ये तेज़ बहाव आकाशगंगा की नाभिकीय गैस को बाहर धकेल सकते हैं और बाहरी क्षेत्रों से भीतर आने वाली गैस के प्रवाह को बाधित कर सकते हैं। इस कारण ब्लैक होल के ‘पोषण’ और आकाशगंगा के दीर्घकालिक विकास—दोनों पर इनका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि इन हवाओं की उत्पत्ति का तंत्र लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए जिज्ञासा और शोध का विषय बना हुआ है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने किया समय–निर्भर अध्ययन
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एरीज) के वैज्ञानिकों ने अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर इस प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने स्वदेशी रूप से विकसित संख्यात्मक अनुरूपण तकनीक (न्यूमेरिकल सिमुलेशन) का उपयोग करते हुए यह समझने की कोशिश की कि ब्लैक होल की एक्रीशन डिस्क से निकलने वाली हवाएं किस प्रकार उत्पन्न होती हैं और उन्हें कौन-सी शक्तियां संचालित करती हैं।
‘रेडिएशन ड्रैग’ की भूमिका पर खास फोकस
शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू था यह जानना कि क्या विकिरण–जनित कर्षण (रेडिएशन ड्रैग) इन हवाओं की गति को नियंत्रित करता है। इसे सरल भाषा में समझें तो यह कुछ-कुछ वैसा ही प्रभाव है, जैसा हवा किसी गतिमान वस्तु, जैसे गिरते पैराशूट या फेंके गए पत्थर, पर प्रतिरोध के रूप में डालती है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकिरण किसी गतिशील माध्यम से गुजरता है, तो वह हवा के प्रवाह की गति पर असर डाल सकता है। यही प्रभाव ब्लैक होल के आसपास बनने वाली हवाओं की रफ्तार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रकाश की गति के 10 प्रतिशत तक पहुंच सकती हैं हवाएं
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में दिखाया कि अत्यधिक चमकदार एक्रीशन डिस्क ऐसी हवाएं पैदा कर सकती हैं, जिनकी गति प्रकाश की गति के लगभग 10 प्रतिशत तक हो सकती है। यह भी पाया गया कि ये हवाएं ब्लैक होल के बेहद नज़दीकी क्षेत्रों से उत्पन्न होती हैं।
अध्ययन के अनुसार, रेडिएशन ड्रैग इन हवाओं की अंतिम गति को सीमित करने में अहम भूमिका निभाता है। वहीं, अपेक्षाकृत कम चमकदार डिस्क के मामलों में यही प्रभाव हवाओं को काफी हद तक शांत या कमजोर कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से हुआ शोध
इस शोध का नेतृत्व कोलकाता स्थित बोस इंस्टीट्यूट के सानंद रायचौधरी ने किया। उनके साथ इज़राइल की बार-इलान यूनिवर्सिटी के मुकेश के. व्यास और एरीज के इंद्रनील चट्टोपाध्याय शामिल रहे। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका मंथली नोटिसेज़ ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी (MNRAS) में प्रकाशन के लिए स्वीकार किया गया है।
शोध में डॉ. इंद्रनील चट्टोपाध्याय द्वारा पहले विकसित किए गए एक न्यूमेरिकल सिमुलेशन कोड का संशोधित रूप इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए ब्लैक होल एक्रीशन डिस्क से निकलने वाली हवाओं का मॉडल तैयार किया गया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन
यह अध्ययन ब्लैक होल के आसपास होने वाली जटिल भौतिक प्रक्रियाओं को समझने में एक अहम कदम माना जा रहा है। इससे वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि ब्लैक होल किस तरह अपने परिवेश को प्रभावित करते हैं और आकाशगंगाओं के विकास में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी गहरी है।
सरल शब्दों में कहें तो, यह शोध उस धारणा को और मजबूत करता है कि ब्लैक होल सिर्फ “निगलने” वाले पिंड नहीं, बल्कि अपने आसपास के ब्रह्मांडीय वातावरण को आकार देने वाले सक्रिय और प्रभावशाली खगोलीय केंद्र भी हैं।
[Publication link: Raichaudhuri S., Vyas, M. K., Chattopadhyay I., MNRAS 2021, vol 501, pg 4850-4860
(DOI:10.1093/mnras/staa3920; ArXiv: 2012.08886)
