चमोली को फिर झटका: मंत्रिमंडल विस्तार में टूटी उम्मीदें, सियासत का ‘वटवृक्ष’ भारी
– गोपेश्वर से महिपाल गुसाईं –
शुक्रवार को धामी मंत्रिमंडल के विस्तार ने चमोली जिले को एक बार फिर गहरी निराशा के गर्त में धकेल दिया। जिले के दोनों भाजपा विधायकों को लेकर जो उम्मीदें पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व में पल रही थीं, वे शपथ ग्रहण समारोह से पहले ही बिखर गईं। हालात यह रहे कि समारोह में शामिल होने का न्योता तक न मिलना, चमोली के लिए सियासी संकेतों को साफ कर गया—इस बार भी जिला सत्ता के केंद्र से दूर ही रहा।
कहावत है कि वटवृक्ष के नीचे कोई दूसरी वनस्पति पनप नहीं पाती। चमोली की भाजपा राजनीति पर यह कहावत सटीक बैठती दिख रही है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य महेंद्र भट्ट आज उस ‘वटवृक्ष’ की तरह हैं, जिनकी राजनीतिक छाया में जिले के अन्य दावेदार उभर नहीं पा रहे। भले ही पिछला विधानसभा चुनाव वे हार गए हों, लेकिन सियासत में जब सितारे बुलंद हों, तो हार-जीत का गणित गौण हो जाता है—और इसका उदाहरण हालिया राजनीतिक परिदृश्य में कई बार दिख चुका है।
चमोली के कर्णप्रयाग से विधायक अनिल नौटियाल का राजनीतिक सफर भी संघर्ष और वापसी की मिसाल रहा है। 2002 में नवगठित उत्तराखंड के पहले चुनाव में जीत, 2007 में दोबारा सफलता, फिर 2012 में टिकट कटना और निर्दलीय हार—इसके बाद 2017 में भी उपेक्षा झेलने के बावजूद उन्होंने संगठन के लिए काम किया। 2022 में दमदार वापसी कर उन्होंने विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। गैरसैंण में दिख रही प्रगति में उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद मंत्रिमंडल में जगह न मिलना उनके समर्थकों को खल रहा है।
दूसरी ओर थराली से विधायक भूपाल राम टम्टा को भी इस बार प्रतिनिधित्व की उम्मीद थी। सीमांत जिला और सुरक्षित सीट का समीकरण उनके पक्ष में माना जा रहा था, लेकिन मंत्रिमंडल में जगह देहरादून की राजपुर रोड से विधायक खजान दास को मिल गई। इसके साथ ही टम्टा समर्थकों की उम्मीदें भी धराशायी हो गईं।
बदरीनाथ सीट का घटनाक्रम भी चमोली की राजनीतिक स्थिति को प्रभावित करता रहा है। 2022 में कांग्रेस से विधायक रहे राजेंद्र भंडारी 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी प्रत्याशी की जीत में अहम भूमिका निभाई। लेकिन उपचुनाव में उनकी हार ने समीकरण बदल दिए। यदि भंडारी उस समय जीत दर्ज कर लेते, तो संभवतः चमोली को सरकार में प्रतिनिधित्व मिल जाता। उनकी हार की कीमत आज पूरा जिला चुकाता नजर आ रहा है।
साफ है कि चमोली इस बार भी सत्ता के गलियारों में अपनी हिस्सेदारी से वंचित रह गया है। 2027 के चुनावी समीकरण क्या तस्वीर बदलेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन फिलहाल जिले में भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच हताशा और निराशा साफ झलक रही है। और ‘वटवृक्ष’ से बहुत ज्यादा उम्मीद करना भी शायद इसलिए मुश्किल है, क्योंकि उसे पूरे प्रदेश की छाया बनकर रहना है, न कि किसी एक जिले की आकांक्षाओं का केंद्र।
