पर्यावरणब्लॉग

वन केवल लकड़ियों का भंडार मात्र नहीं

Forests are far more than trees: they form Earth’s vital life-support system, maintaining biological balance through complex underground networks known as the “Wood Wide Web.” Pioneering research by Suzanne Simard reveals how “mother trees” share nutrients and warn others of dangers via mycorrhizal fungi, creating a living social web. As powerful carbon sinks, forests absorb ~30% of human CO₂ emissions, yet massive deforestation since 1990 threatens climate goals like limiting warming to 1.5°C. Their destruction also drives zoonotic pandemics (Ebola, COVID-19) by collapsing biodiversity buffers and disrupts hydrological cycles, causing floods and erosion. True salvation lies not in monoculture plantations but in conserving mature, diverse forests and rewilding—our survival depends on theirs

 

जयसिंह रावत –

​मानव सभ्यता का इतिहास वनों की हरी-भरी गोद में लिखा गया है, लेकिन विडंबना यह है कि आधुनिकता की वर्तमान पटकथा उसी कलम से लिखी जा रही है जो वनों की जड़ें काट रही है। आज के दौर में वन केवल लकड़ियों का भंडार या पर्यटन स्थल मात्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक ऐसी जटिल और सूक्ष्म जैविक मशीनरी हैं जो पृथ्वी के ‘होमियोस्टेसिस’ यानी जैविक संतुलन को बनाए रखने का एकमात्र साधन हैं। जब हम एक जंगल की ओर देखते हैं, तो हमें केवल खड़े हुए वृक्ष दिखाई देते हैं, जबकि वैज्ञानिक धरातल पर वहां एक निरंतर चलने वाला जीवन-चक्र और संचार तंत्र सक्रिय रहता है।

प्रकृति का अदृश्य इंटरनेट

​हालिया वनस्पति विज्ञान के शोध, विशेषकर सुज़ैन सिमार्ड जैसे वैज्ञानिकों के कार्यों ने यह पूरी तरह सिद्ध कर दिया है कि वन कभी ‘मौन’ नहीं होते। उनके नीचे कवकों का एक अत्यंत विशाल और जटिल जाल फैला होता है जिसे वैज्ञानिक ‘वुड वाइड वेब’ के नाम से जानते हैं। इस अदृश्य तंत्र के माध्यम से पुराने और विशाल पेड़, जिन्हें ‘मदर ट्री’ कहा जाता है, अपने आस-पास के छोटे पौधों को कार्बन, फास्फोरस और जल जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भेजते हैं। यहाँ तक कि जब किसी पेड़ पर कीटों का हमला होता है, तो वह इसी नेटवर्क के जरिए रासायनिक संकेत भेजकर अन्य पेड़ों को अपनी सुरक्षा प्रणाली सक्रिय करने के लिए सचेत कर देता है। अतः एक वन को काटना केवल लकड़ी का नुकसान नहीं, बल्कि एक विकसित सामाजिक और संचार तंत्र को जड़ से ध्वस्त करना है।

कार्बन सिंक और बढ़ता तापमान

​जलवायु परिवर्तन के इस दौर में वनों की भूमिका एक ‘कार्बन सिंक’ के रूप में सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। वे वायुमंडल से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर उसे बायोमास और मिट्टी में सुरक्षित रूप से संचित करते हैं। हालांकि, ‘ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स असेसमेंट’ के आंकड़े एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। इसके अनुसार वर्ष 1990 के बाद से दुनिया ने लगभग 17.8 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र खो दिया है, जो भौगोलिक रूप से लीबिया जैसे बड़े देश के क्षेत्रफल के बराबर है। वैज्ञानिक गणित स्पष्ट है कि यदि हमें वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है, तो वनों की कटाई को तत्काल प्रभाव से रोकना अनिवार्य होगा। वर्तमान में दुनिया के वन मानवीय गतिविधियों से होने वाले कुल उत्सर्जन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले ही अवशोषित कर लेते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी प्राकृतिक ढाल है।

महामारियों के विरुद्ध प्राकृतिक ढाल

​वनों का विनाश केवल पर्यावरणीय संकट ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट का भी बड़ा कारण बनता जा रहा है। दुनिया की 80 प्रतिशत स्थलीय जैव विविधता वनों में ही निवास करती है और जब हम इन क्षेत्रों का अतिक्रमण करते हैं, तो वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। विज्ञान कहता है कि इबोला, सार्स और कोविड-19 जैसे विनाशकारी ‘जूनोटिक’ वायरस इसी पारिस्थितिक असंतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। वन एक प्राकृतिक ‘बफर जोन’ की तरह कार्य करते हैं जो इन घातक वायरसों को जंगल की गहराई तक ही सीमित रखते हैं। इसके साथ ही, वन एक विशाल ‘हाइड्रोलॉजिकल पंप’ की तरह कार्य करते हुए स्थानीय वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं। एक परिपक्व वृक्ष वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से प्रतिदिन सैकड़ों लीटर जल वाष्प हवा में छोड़ता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से बांधकर उसे स्पंज की तरह बनाती हैं, जिससे बारिश का पानी सीधा भूजल में समाहित हो जाता है। वनों के अभाव में यही वर्षा जल बाढ़ और विनाशकारी मिट्टी के कटाव का कारण बनता है, जिसकी बानगी हम हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन के रूप में देख रहे हैं।

पौधा नहीं, पारिस्थितिकी बचाएं

​आज के समय में समाधान केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी में नहीं, बल्कि वास्तविक संरक्षण में छिपा है। अक्सर एक पुराने जंगल को काटकर वहां हजारों नए पौधे लगाने का तर्क दिया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह दोषपूर्ण है। एक सौ साल पुराना पेड़ जितना कार्बन सोखने और ऑक्सीजन देने की क्षमता रखता है, उसे प्रतिस्थापित करने के लिए हजारों नए पौधों की आवश्यकता होती है, जिन्हें उस स्तर तक पहुँचने में कई दशक लगेंगे। हमें ‘मोनोकल्चर’ के बजाय ‘रीवाइल्डिंग’ यानी प्राकृतिक विविधता को पुनः जीवित करने वाली प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। वन दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि कुदरत के प्रति हमारी जिम्मेदारी को समझने का दिन है। विज्ञान की चेतावनियां और आंकड़ों का डर अब प्रत्यक्ष है, ऐसे में केवल सामूहिक मानवीय चेतना ही वह अंतिम शक्ति है जो इस हरी-भरी विरासत को मरुस्थल बनने से बचा सकती है। वनों का अस्तित्व ही मनुष्य का अस्तित्व है और यदि वन नहीं रहेंगे, तो हम केवल एक ऐसे निर्जीव ग्रह के निवासी बनकर रह जाएंगे जहाँ ऑक्सीजन तो शायद तकनीक से मिल जाए, पर ‘जीवन’ का अनुभव कभी नहीं मिलेगा।

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