“लोकमानस के कवि तुलसीदास ” एक संस्मरण

– गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
तुलसीदास जी यद्बयपि ड़े सक्षम और मौलिक कवि थे किन्तु रामचरितमानस की भूमिका लिखते समय उनके दिलो दिमाग में कालिदास छाया रहा फिर भी उनका कवित्व कौशल किसी भी दृष्टि से महाकवियों की तुलना में कम नहीं आंका जा सकता । उनकी लोकप्रियता का प्रमाण इससे बढ़िया क्या हो सकता है कि पढ़े -अनपढ़े लोगों की जुबान पर रामचरितमानस की कोई न कोई अर्द्धाली स्वतः बाहर निकल आती है।
मेरी ससुराल में कुछ वर्ष पूर्व फैज़ाबाद के एक माली काम करने आते थे, उसका नाम यद्यपि उसके बाएं हाथ की बांह पर *निठुरीलाल* खुदा हुआ था लेकिन रेसकोर्स मोहल्ले में उनका प्रचलित नाम ” भैइय्यन” ही था। वह सारे मोहल्ले के घरों में शादी- ब्याह आदि में सहयोग करते थे लंबे कदकाठी वाला भैइय्यन मास्टर आफ आल ट्रेड्स भी था… काफी समय बाद जब मैंने उसको देखा तो उसका हृष्ट-पुष्ट रीर बहुत दुबला हो गया था -मैंने पूछा अरे भैइय्यन ! क्या हो गया तुम बहुत कमजोर हो गए हो ! – तो कहने लगे ” का कहें जवाईं बाबू ! जनमत मरत दुसह दुख होई” बेचारे की बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु हो गयी थी –फिर एक दिन अपने बेटे की कहानी सुनाने लगा ,वह दारु पीता था, तो बोले बहुत समझाया पर मानता नहीं बिल्कुल , सुनता नहीं किसी की -देखहुँ करि सब करम गोसाईं –( देखहुँ करि सब करम गोसाईं I सुखी न भयउँ अबहिं कि नाईं )
–चलिए खैर मूल प्रसंग पर लौटता हूँ। बात हो रही थी कालिदास और तुलसीदास जी की -इन दोनों कवियों के नाम के साथ विनम्रता बोधक विशेषण जुड़े हुए हैं -जन श्रुति के मुताबिक जवानी में दोनों अपनी सुंदरी और विदुषी पत्नियों से प्रताड़ित हुएथे -घायल की गति घायल जाने —
फिर रामचरितमानस की प्रस्तावना के प्रसंग पर लौटता हूँ -तुलसी लिखते हैं –
” जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।।
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।।–रामचरितमानस
इसी अंदाज में कालिदास ने भी अभिज्ञान शाकुन्तलम् की प्रस्तावना में लिखा –
आपरितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।
बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः॥
“सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।।
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।।
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।।
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)-रामचरितमानस
क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः ।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥ १.२ ॥
मन्दः कवियशःप्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः ॥ १.३
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन् ।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलायप्रचोदितः ॥ १.९
रघुवंशम्- कालिदास
इस विषय पर आगे लिखने का मन था पर चलो लोगों को क्यों बोर किया जाय।
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