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अमेरिका ईरान का झगड़ा कैसे खत्म होगा ? 

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा

अमेरिका शुरू से ही पाकिस्तान का मददगार दोस्त रहा है, पिछला इतिहास यही बताता है। पाकिस्तान भी इसी वजह से अमेरिका की पल्लेदारी कर लेता है तभी तो अमेरिका ने ईरान के मामले में पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाने की सोची , लेकिन अमेरिका ने भी सिर्फ एक ट्राई मारी है। अमेरिका की नीयत साफ़ नहीं थी वह पाकिस्तान के मार्फ़त ईरान को एक इशारा भी दे रहा है कि तुम्हारी औकात पाकिस्तान से ज्यादा नहीं है, वह तो हम दुनिया को यह जताना चाहते थे कि हम लड़ाई नहीं चाहते अन्यथा हम तुमसे से डरने वाले नहीं हैं।
दरअसल मध्यस्थ केवल वही व्यक्ति हो सकता है जिसकी इज्जत दोनों पक्ष करते हों अन्यथा प्रयास निष्फल हो जाते हैंI यहां पाकिस्तान और ईरान में सिर्फ धर्म ही कामन है अन्यथा उसे यह अच्छी तरह मालूम है कि पाकिस्तान अमेरिका पर आश्रित है इसलिए उसकी पैरवी कर रहा है ।
दूसरों के सहारे शक्तिमान बनने का दंभ कमजोर आदमी ही भरता है। कमजोर व्यक्ति ही सबसे पहले घातक अस्त्र का इस्तेमाल दूसरे पर करता है। इटली के राष्ट्रपति ने ट्रंप को सही जबाब दिया कि परमाणु शक्ति अन्य राष्ट्रों के पास भी थी लेकिन उसका प्रयोग सबसे पहले अमेरिका ने ही किया है, विश्वयुद्ध इसका उदाहरण है । अमेरिका की फितरत हमेशा लड़नाने की रही है इसलिए उसको शांति प्रेमी राष्ट्र कोई नहीं समझते। वहां जो लोग शांतिप्रेमी थे उनकी हत्या की गई -अब्राहम लिंकन , रोबर्ट केनेडी , मार्टिन लूथर किंग आदि इसके प्रमाण हैं ।
एक उम्मीद संयुक्त राष्ट्र संघ था लेकिन वह भी आस समय निष्चेष्ट और निष्क्रिय बना हुआ है। शांति स्थापित कौन करेगा यह यक्ष प्रश्न सामने है।

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