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तपती धरती, सिकुड़ती फसलें: भारत की खेती पर लू का प्रहार

This article of veteran journalist  and writer Jay Singh Rawat highlights a grave warning from the United Nations (FAO & WMO) regarding the devastating impact of intensifying heatwaves on Indian agriculture, particularly in the fertile Indo-Gangetic plains. Rising temperatures and erratic monsoons are no longer seasonal shifts but existential threats to food security and the rural economy. Beyond damaging staple crops like wheat and paddy, extreme heat induces “heat stress” in livestock, crippling dairy and poultry sectors. To safeguard the nation’s “breadbasket,” the report advocates for climate-resilient crop varieties, advanced early-warning systems, and sustainable water management to protect farmers’ livelihoods from a warming climate.-Usha Rawat,Admin.

-जयसिंह रावत

भारत जैसे कृषि प्रधान राष्ट्र के लिए बढ़ता पारा अब मात्र मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि हमारी खेती, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अस्तित्व पर मंडराता संकट बन गया है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट संस्थाओं— खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन—की एक नई रिपोर्ट ने आगाह किया है कि भविष्य में लू (भीषण गर्मी) का प्रकोप भारतीय फसलों और खेतों में पसीना बहाने वाले श्रमिकों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। विशेष रूप से देश के सबसे उर्वर भूभाग, गंगा और सिंधु नदी के मैदानी क्षेत्रों को इस आपदा के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील माना गया है।

यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब चालू वर्ष के दौरान मानसून में सामान्य से कम वर्षा का पूर्वानुमान है। यदि वर्षा की कमी और बढ़ते तापमान का दोहरा प्रहार होता है, तो इसका सीधा आघात धान, गेहूं और अन्य जीवनरक्षक फसलों पर पड़ेगा। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अत्यधिक ताप की घटनाएं अब पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बार, कहीं अधिक तीव्र और लंबे समय तक घटित हो रही हैं, जिससे कृषि तंत्र और प्राकृतिक संपदा पर भारी दबाव पड़ रहा है।

रिपोर्ट में वर्ष 2022 की उस भीषण गर्मी का विशेष उल्लेख है, जब दिन और रात, दोनों ही समय तापमान ने अप्रत्याशित रिकॉर्ड बनाए थे। उस दौर में देश के एक-तिहाई से अधिक राज्यों में फसलों, फलों, सब्जियों और पशुधन पालन पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कृषि के आधार स्तंभ माने जाने वाले राज्यों में उत्पादन में भारी गिरावट देखी गई थी। वह वर्ष इस तथ्य का प्रमाण बन गया कि जब प्रचंड ताप और अल्प वर्षा का मेल होता है, तो हमारी कृषि व्यवस्था कितनी भंगुर साबित हो सकती है।

लू, जिसे सरल शब्दों में अत्यंत गर्म और शुष्क हवाओं का दौर कहा जाता है, कई दिनों या हफ्तों तक जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर सकती है। जब रातें भी ठंडी नहीं होतीं, तब पौधों की जैविक विकास प्रक्रिया बाधित होने लगती है। उनमें नमी सोखने की क्षमता कम हो जाती है, पुष्प और दाने बनने का चक्र टूट जाता है और अंततः पैदावार घट जाती है। यही कारण है कि कृषि विज्ञानी निरंतर सचेत कर रहे हैं कि पारे में होने वाली आंशिक वृद्धि भी उत्पादन को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह ताप केवल फसलों का ही शत्रु नहीं है, बल्कि यह पशुपालन, मत्स्य पालन और दुग्ध व्यवसाय की कमर भी तोड़ देता है। उच्च तापमान के कारण पशु ‘ताप-तनाव’ (Heat Stress) का शिकार हो जाते हैं, जिससे दुग्ध उत्पादन कम हो जाता है। जलाशयों का तापमान बढ़ने से मछलियों के प्रजनन चक्र पर प्रभाव पड़ता है और कुक्कुट पालन (पोल्ट्री) में भी भारी क्षति होती है। इस प्रकार, लू का यह संताप खेत की मेड़ लांघकर पूरी ग्रामीण आजीविका को अपनी चपेट में ले लेता है।

भारत के लिए यह परिदृश्य इसलिए भी भयावह है क्योंकि यहाँ की एक विशाल जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिट्टी से जुड़ी है। गंगा-सिंधु का मैदान, जिसे राष्ट्र का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है, यदि वहां लू का प्रकोप स्थायी हुआ तो खाद्यान्न उत्पादन पर अभूतपूर्व दबाव बढ़ेगा। इसका परिणाम केवल किसानों की घटती आय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनाज की कीमतों में उछाल आने से आम जनता की थाली भी महंगी हो जाएगी।

पिछले कुछ वर्षों का अनुभव गवाह है कि मार्च और अप्रैल की असमय गर्मी ने गेहूं की फसल को झुलसाया है। समय से पूर्व बढ़ता तापमान गेहूं के दानों को ठीक से पकने नहीं देता, जिससे वे सिकुड़ जाते हैं। ठीक यही स्थिति धान के साथ भी है। अत्यधिक गर्मी न केवल पौधों की वृद्धि रोकती है, बल्कि मिट्टी की नमी को भी तेजी से सोख लेती है, जिससे सिंचाई की मांग और जल स्रोतों पर बोझ बढ़ जाता है।

इस चुनौती का सामना करने के लिए रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण समाधान सुझाए गए हैं। इनमें ऐसी ‘ताप-सहनीय’ फसल प्रजातियों का विकास करना प्राथमिकता है जो भीषण गर्मी में भी टिकी रहें। इसके अतिरिक्त, बुवाई के पारंपरिक समय में बदलाव करना भी एक प्रभावी उपाय है। यदि कृषक मौसम के मिजाज को समझकर बुवाई का समय समायोजित करें और ‘मल्चिंग’ (मिट्टी को ढकने की तकनीक) जैसी विधियां अपनाएं, तो नमी को सुरक्षित रखा जा सकता है।

साथ ही, ‘पूर्व चेतावनी प्रणालियों’ को सुदृढ़ करना अपरिहार्य है। यदि किसानों को समय रहते सटीक मौसमी जानकारी मिल जाए, तो वे अतिरिक्त सिंचाई या फसलों को ढकने जैसे तात्कालिक उपाय कर नुकसान को न्यूनतम कर सकते हैं।

हैरानी की बात यह है कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों में भी अब धीरे-धीरे तापमान बढ़ रहा है। जिन क्षेत्रों को कभी शीतल माना जाता था, वहां भी अब गर्मी की तीव्रता महसूस की जा रही है। इससे सेब जैसी बागवानी फसलों के लिए आवश्यक ‘चिलिंग ऑवर्स’ (ठंड के घंटे) कम हो रहे हैं, जिससे उनके उत्पादन और गुणवत्ता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में देखें तो बढ़ती लू मात्र एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक चुनौती है। बढ़ता तापमान, अनिश्चित वर्षा और जल संकट मिलकर खेती के लिए नए अवरोध खड़े कर रहे हैं। यदि समय रहते इन बाधाओं को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा का सपना टूट सकता है।

इस विकट स्थिति से निपटने के लिए सरकार, वैज्ञानिकों और अन्नदाताओं के मध्य बेहतर तालमेल की आवश्यकता है। जल संरक्षण, छोटे जलाशयों का पुनरुद्धार, वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों (जैसे ड्रिप सिंचाई) का विस्तार ही वह सुरक्षा कवच है जो हमें भविष्य की तपिश से बचाएगा। इसके साथ ही, किसानों को आधुनिक तकनीकों और मौसम आधारित परामर्श से जोड़ना अनिवार्य है।

निष्कर्षतः, यह रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें आभास कराती है कि यदि हमने आज अपनी कार्यशैली और नीतियों में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में ‘लू’ भारतीय कृषि की सबसे बड़ी बाधा बन जाएगी। अतः वैज्ञानिक शोध, तकनीकी नवाचार और प्रभावी नीतिगत कार्यान्वयन के माध्यम से इस संकट का समाधान खोजना होगा, ताकि देश का किसान और उसका खेत, दोनों सुरक्षित रह सकें।

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