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राघव चड्ढा प्रकरण: संख्या बल का गणित और वैधानिक चुनौतियां

जयसिंह रावत

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में दलबदल विरोधी कानून और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में संवैधानिक मर्यादाओं का विश्लेषण एक अत्यंत गंभीर और सामयिक विषय है। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है, का मुख्य उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्ठा की खरीद-फरोख्त को रोकना और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना था। हाल के दिनों में राघव चड्ढा और अन्य राज्यसभा सांसदों से जुड़ी अटकलों ने इस कानून की बारीकियों पर पुनः विमर्श छेड़ दिया है। संविधान के प्रावधानों के आलोक में यह समझना अनिवार्य है कि क्या केवल सांसदों का समूह अपनी इच्छा से किसी अन्य दल में विलय कर सकता है या इसके लिए वैधानिक रूप से राजनीतिक दल का अस्तित्व ही विलीन होना आवश्यक है।

दसवीं अनुसूची का कवच और जनादेश की गरिमा

संविधान की दसवीं अनुसूची का मूल स्वर मतदाता के जनादेश की रक्षा करना है। जब कोई मतदाता किसी प्रतिनिधि को चुनता है, तो वह केवल व्यक्ति को नहीं बल्कि उस दल की विचारधारा और घोषणापत्र को भी मत देता है। यदि प्रतिनिधि निर्वाचित होने के बाद अपनी सुविधा या प्रलोभन के आधार पर दल बदलता है, तो यह उस जनादेश के साथ विश्वासघात माना जाता है। इसीलिए, न्यायालयों ने समय-समय पर इस कानून की व्याख्या को सख्त किया है। सांसदों के एक समूह द्वारा किसी अन्य दल में विलय की बात यदि केवल संख्या बल तक सीमित है, तो यह राजनीतिक अस्थिरता का संकेत है। निष्पक्षता का तकाजा यही है कि राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर संविधान की आत्मा को प्रधानता दी जाए।

विभाजन से विलय तक: 91वें संशोधन का विधायी प्रभाव

संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ चार के अनुसार, किसी सदन के सदस्य को तब अयोग्य नहीं माना जाएगा जब उसके मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है। कानून की भाषा यहाँ अत्यंत स्पष्ट है कि विलय ‘दलों’ के बीच होना चाहिए। पूर्व में, 1985 के मूल कानून के तहत ‘विभाजन’ (Split) को मान्यता प्राप्त थी, जिसमें यदि किसी दल के एक-तिहाई सदस्य अलग होते थे, तो उनकी सदस्यता बची रहती थी। परंतु, 2003 में 91वें संविधान संशोधन के माध्यम से ‘विभाजन’ शब्द को कानून से हटा दिया गया। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, अब केवल ‘विलय’ ही एकमात्र मार्ग है जिसके माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी सदस्यता खोए बिना एक दल से दूसरे दल में जा सकते हैं। इसके लिए शर्त यह है कि उस सदन के संबंधित दल के कम से कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य उस विलय के निर्णय से सहमत हों।

दल-बदल कानून और राज्यसभा में विलय की संवैधानिक जटिलताएं

राघव चड्ढा और अन्य छह सांसदों के संदर्भ में यदि कानूनी विश्लेषण किया जाए, तो संख्या बल का गणित प्राथमिक भूमिका निभाता है। यदि किसी दल के राज्यसभा में कुल दस सदस्य हैं, तो दो-तिहाई का आंकड़ा सात सदस्यों पर ठहरता है। यदि ठीक सात सदस्य किसी अन्य दल में जाने का निर्णय लेते हैं, तो तकनीकी रूप से वे दो-तिहाई की शर्त पूरी कर सकते हैं। किंतु, यहाँ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में दी गई व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि केवल सदन के भीतर के सदस्यों का संख्या बल जुटा लेना ही पर्याप्त नहीं है। विलय की प्रक्रिया दो स्तरों पर होनी चाहिए। प्रथम स्तर पर, मूल राजनीतिक दल के संगठनात्मक ढांचे का दूसरे दल में विलय होना चाहिए, और द्वितीय स्तर पर, सदन के भीतर के दो-तिहाई सदस्यों को उस विलय को स्वीकार करना चाहिए।

दल बनाम निर्वाचित प्रतिनिधि: क्या केवल सांसदों का पलायन ‘विलय’ है?

इस प्रकरण में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह है कि यदि मूल दल (जैसे आम आदमी पार्टी) का अस्तित्व बाहर बना रहता है और केवल सदन के सदस्य अलग होते हैं, तो इसे विलय माना जाए या दलबदल? कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दल के भीतर के दो-तिहाई सदस्यों को यह साबित करना होगा कि उनकी मूल पार्टी का वास्तव में संगठनात्मक रूप से विलय हुआ है। यदि मूल पार्टी का संगठन बाहर सक्रिय है और उसने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है, तो सदस्यों का यह कदम वैधानिक चुनौती के घेरे में आ जाता है। दलबदल विरोधी कानून के तहत यदि कोई सदस्य अपनी स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ता है, तो वह अयोग्य हो जाता है। विलय के मामले में बचाव का रास्ता केवल तभी खुलता है जब सदस्यों की संख्या दो-तिहाई हो और वह प्रक्रिया पूर्णतः संवैधानिक हो।

सारा दारोमदार अब सभापति पर

इस विषय में राज्यसभा के सभापति की भूमिका निर्णायक और अर्ध-न्यायिक होती है। सभापति को यह तय करना होता है कि क्या सांसदों द्वारा दावा किया गया विलय वास्तव में संवैधानिक मानदंडों पर खरा उतरता है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहाँ सदस्य केवल संख्या बल के आधार पर खुद को एक अलग समूह बताते हुए दूसरे दल में शामिल हुए हैं। सभापति के समक्ष ऐसे मामलों में अक्सर गहन सुनवाई चलती है, और अंतिम निर्णय आने तक सदस्यों की स्थिति अधर में लटकी रहती है। यदि यह प्रक्रिया केवल संख्या बल के खेल तक सीमित रहती है और इसमें दल के विलय की वास्तविक प्रक्रिया का अभाव रहता है, तो यह निश्चित रूप से न्यायपालिका के हस्तक्षेप का विषय बनता है।

 राजनीतिक नैतिकता और संवैधानिक शुचिता का भविष्य

अंततः, भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि संस्थाएं संवैधानिक प्रावधानों का अक्षरशः पालन करें। दलबदल कानून में मौजूद कमियों का लाभ उठाकर यदि जनादेश को मोड़ने का प्रयास किया जाता है, तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण होता है। राघव चड्ढा और अन्य सांसदों से जुड़े इस संभावित प्रकरण में भी कानून की सूक्ष्म व्याख्या ही यह तय करेगी कि यह कदम संसदीय शुचिता के अनुकूल है या नहीं। संसदीय गरिमा को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हर ऐसा कदम न केवल कानून की कसौटी पर, बल्कि नैतिकता के पैमाने पर भी खरा उतरे, ताकि भविष्य में कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि कानून की बारीकियों का उपयोग अपनी निष्ठा बदलने के हथियार के रूप में न कर सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कई पुस्तकों के लेखक हैं, फिर भी इस लेख में प्रकट विचारों और तर्कों से एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं है – एडमिन)

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