रस्म बना मई दिवस भी

-अरुण श्रीवास्तव
“मई दिवस मजदूरों के उन बलिदानों का नाम है जिनसे बदला जग का नक्शा उनको लाल सलाम है”। कभी तनी मुट्ठियों का हुजूम इन नारों के साथ अपने हक की लड़ाई के लिए मिलों-कारखानों की चहारदीवारी फांदकर सड़कों पर निकल पड़ता था। पर अब यह एका देखने को नहीं मिलता।
वह दिन कब आएगा जब यह दिन दुनिया भर में मजदूरों की एकजुटता के लिए याद किया जाएगा। 1886 में शिकागो की गलियों में श्रमिकों ने आठ घंटे काम करने की मांग को लेकर अपनी जानें दीं। हाल ही में भारत में लागू हुए चार नए श्रम संहिताओं ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दे दिया है कि आखिर श्रमिकों के लिए वास्तविक ‘स्वतंत्रता’ क्या है?
नए कानूनों का सबसे चर्चित बदलाव है बेसिक वेतन का 50 फीसद से कम न होना। सरकार और उद्योगपति इसे “भविष्य सुरक्षा” बताते हैं। उनका तर्क है कि भविष्य निधि और ग्रेच्युटी बढ़ेगी लेकिन जब हाथ में मिलने वाला वेतन घटता है, और महंगाई पांच-छह फीसद के आसपास मंडरा रही है, तो क्या यह मजदूर के आज के राशन, बच्चे की फीस और किराए का मुआवजा है? यह एक ऐसी बचत है जिसे श्रमिक आज छू भी नहीं सकता।
कंपनियां अब चार दिन 12 घंटे यानी आधे दिन काम कराने की पेशकश (भारत में पेशकश का मतलब बताने की जरूरत नहीं) कर सकती हैं। उसमें आने-जाने का समय जोड़ दें तो यह एक इंसान के लिए एक दंड सा बन जाता है। शिकागो के श्रमिकों ने काम के घंटे आठ घंटे करने के लिए संघर्ष किया था। आज हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं?
अब हर मजदूर को लिखित नियुक्ति पत्र मिलना तो तय हो गया है। नियुक्ति पत्र मिलना ही सब कुछ नहीं है। इस कानून के आने के पहले भी सभी कर्मचारियों का पीएफ कटता था, ईएसआई की सेवाएं भी थीं पर इलाज केसा मिलता था सभी जानते हैं। एक तो कंपनियां हर विभाग में अपने नियमित कर्मचारी कम रखतीं हैं बाहरी एजेंसियों से हॉयर करतीं हैं। मैनपॉवर व इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां अपना कमीशन लेती हैं जिससे वेतन के रूप में मिलने वाली राशि वैसे भी कम हो जाती है। नये बदलाव से कंपनियां स्थायी कर्मचारी रखने से बचेंगी। बिना कारण बताए नौकरी से हाथ धोने का डर अब भी बरकरार है।
इतिहास गवाह है कि श्रमिकों को उनके अधिकार कभी उपहार में नहीं मिले। वे हमेशा संघर्ष से मिले हैं।
अपने देश के ज़्यादातर कानून सैद्धांतिक रूप से हसीन ख्वाब दिखाते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अलग होती है।
आज भी मई दिवस केवल फूल माला पहनाने या भाषण सुनने का दिन नहीं है। यह हिसाब मांगने का दिन है।
नए श्रम कानून शोषण को कम करें या बढ़ाए, यह उसी तरह तय होगा जैसे पहले तय होता था वह है हमारी एकजुटता और हमारी आवाज।
नया श्रम कानून कल को सुरक्षित रखने की बात करता है, लेकिन हम आज का गला नहीं घोंट सकते।”
