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आया राम गया राम से मुक्ति कब?

 

साहित्य में थूंक कर चाटना विभत्स रस कहलाता है पर राजनीति में इसे श्रृंगार रस का दर्जा मिलना ही चाहिए। 

अरुण श्रीवास्तव देहरादून-

किसी और देश की राजनीतिक व्यवस्था को न दूर से देखा और न करीब से जाना है। किशोरावास्था से लेकर अधेड़ावस्था तक अपने देश की राजनीति को भी करीब से जानने को सुअवसर हासिल नहीं हुआ। राजनीति के दूर से ही दर्शन हुए हैं यानी मुझ जैसे बहुतेरों के लिए राजनीति “दूरदर्शन’ है। दूर से दर्शन कर ज़ाना कि, राजनीति में योग का एक नया आसन प्रचलित हो चुका है “दलासन” और झुकरासन। राजनीति का माहिर खिलाड़ी होने के लिए दलासन का सैद्धांतिक ज्ञान जरूरी है तो माहिर होने के बाद झुकरासन का व्यावहारिक ज्ञान। व्यावहारिक ज्ञान रैलियों, सभाओं व सम्मेलनों में बुलाकर सामने विराजमान करायी गई भीड़ के सामने ज़रूरी होता है‌। तो दलासन एक दल से दूसरे दल में समा जाने के लिए।

इस आसन में नेता बड़ी सहजता से एक पार्टी से दूसरी पार्टी में ऐसे प्रवेश करता है, जैसे सुबह की चाय से सीधे रात को सोमरस में उतर आया हो।

कभी हरियाणा में “आया राम–गया राम” हुआ करता था। हालांकि इसे रोकने के लिए ‘दल बदल’ विधेयक लाया गया। हालांकि यह विधेयक वह सरकार ने ले आई जिसके पास लोकसभा में चार सौ से अधिक सीटें थीं। बावजूद इसके वह विधेयक क्यों ले आई इस पर कयास ही लगाया जा सकता है।

बहरहाल उस विधेयक की स्थिति वही है जो काला धन या दहेज समाप्त करने वाली समस्याओं की रही है। यानी तुम डाल-डाल तो हम पात-पात

साल 1967 में हरियाणा के हसनपुर (अब होडल) से एक विधायक ने एक ही दिन में तीन बार दल बदला। सुबह एक पार्टी, दोपहर दूसरी, शाम तीसरी। तब देश की सबसे पुरानी पार्टी के एक ख्यातिलब्ध नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि, “जो गया राम था, वो अब आया राम हो गया!” भाई साहब, वो तो सिर्फ शुरुआत थी। आजकल तो इसने दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की है। दिन में दूना पर रात में यह चौगुना क्यों हो जाता है मुझे पता नहीं। विशेषज्ञ ही बता सकते हैं।

अब एक-दो विधायक नहीं, पूरी पार्टियाँ, पूरे गुट और कभी-कभी पूरा राज्य ही “आया-गया” करने लगा है। विधायक आया गया न करें इसके लिए अपने विधायकों को राज्य के बाहर लेकर चली जाती हैं पार्टियां वो भी चोरी-छिपे। उत्तराखंड, महाराष्ट्र व राजस्थान में पूरे देश की जनता ने अपनी आंखों से देखा। किसी समय एनटी रामाराव को राष्ट्रपति के सामने परेड करानी पड़ी। एसआर बोम्मई कांड उदाहरण है। इन दोनों घटनाओं के कारण एक ही है।

पर लक्षण के जैसे, सत्ता का सुख देखते ही सिद्धांत, वादे, विचारधारा सब ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे ‘गधे के सिर से सींग’। हरियाणा की कूद-फांद वाली परंपरा आज भी जीवित है‌। सुबह कांग्रेस का नारा लगाया, दोपहर भाजपा में स्वागत हुआ, शाम किसी और दल में “भाईचारा” जताया और रात को फिर से किसी और के साथ “मोहब्बत” हो गई। रात को सोते समय शायद खुद को याद नहीं रहा होगा कि आज वो किस पार्टी का सदस्य है!

अब एक नज़र पलटू चाचा पर। पलटू चाचा के बिना तो वैसे ही लगेगा जैसे बिन नमक के दाल।बिहार के यह सम्मानित नेता “पलटू” नाम से इतने मशहूर हो चुके हैं कि अब उनका नाम सुनते ही लोग मुस्कुरा देते हैं। ये इकलौते होंगे जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और फ़िर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अरे जब मुख्यमंत्री थे तो मुख्यमंत्री बनने के लिए इस्तीफा क्यों दिया।

सुबह चाय की टपरी पर एक नेता जी मिले‌। रात में वर्षों पुरानी पार्टी छोड़ कर आये थे। कहने लगे कि मैं पार्टी नहीं छोड़ना चाहता था, पर परिस्थितियों की गाड़ी फिसल गई… और सीधे दूसरी पार्टी के दरवाज़े पर जाकर रुकी। यह एक राजनीतिक दुर्घटना थी।”

मेरे विचार से “अब नेताओं को ‘दल बदल’ दुर्घटना बीमा मिलना चाहिए वो भी बिना किश्त जमा किए, आखिर माननीय जो ठहरे। बिजली, पानी, टेलीफोन के बिलों का बोझ जब जनता अपने कंधों पर उठाए हुए है तो इसका भी उठा लेगी। आखिर उनके इनकम का टैक्स भी तो वही भरती है।

“देश में थोक में डिवाइडर बनने के बाद सड़क दुर्घटनाएं तो कम हो रही हैं, लेकिन राजनीतिक बढ़ती जा रही हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि यहां चोट विचारधारा को लगती है और इलाज सत्ता में होता है।”

“कुछ नेता तो इतने घुटे हुए होते हैं कि उनकी हर ‘दुर्घटना’ उन्हें सीधे सत्ता के वीआईपी वार्ड में पहुंचा देती है चाहे वे पलटू चाचा की तरह संतुलन साधें या चौटाला की तरह समय देखकर कदम रखें।”

एक ख़ानदानी नेता जी का कहना था कि, उनका अपनी पुरानी पार्टी में दम घुट रहा था इसलिए पार्टी बदली। अब यह बात अलग है कि उनके पिताश्री भी अनेक घाट-घाट का पानी पी चुके थे। यानी इधर-उधर मुंह मारना उन्हें विरासत में मिला था। अब देखिए न बिहार के नये नवेले खेवनहार ऐसे खेवनहार नहीं बने। समता पार्टी की उंगली पकड़ी, लालू की लालटेन थामी और मौका मिलते ही तीर उठा लिया। किसी ने कहा था कि ‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं तो सम्राट ही क्यों करते। कमल पकड़ लिया गोया… सुदर्शन चक्र हो। गर सुदर्शन चक्र न होता तो आंदोलन से उपजी पार्टी के लोग उस दल में न समा जाते जिसे वे गाहे-बगाहे पानी पी-पीकर कोसा करते थे। अब चड्ढा साहब को ही ले लीजिए। संवाददाता सम्मेलन कर जिस दल को ‘दल दल’ कहा उसी में समा गए। फिर खुद गए जाते-जाते पांच हाथ पगहा भी ले गए। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि, कहीं बाहर नहीं गए, मूलधारा में समा गए। यानी बी टीम की एक उप-धारा ए टीम में विलीन हो गई। जो कि होना ही था। गर सत्ता बदलती है तो वापस आ जाएंगे यानी घर वापसी हो जाएगी जो कि मान्यता प्राप्त है। आज़ की राजनीतिक स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि पहले अपनी पार्टी प्रत्याशियों को जिताओ फिर उन्हें बचाओ। (लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं  -एडमिन)

 

 

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