जलवायु परिवर्तन और विकास असंतुलन से बढ़ रहा उत्तराखंड का पलायन संकट, खाली हो रहे पहाड़ी गांव
देहरादून, 7 जून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता पलायन अब केवल रोजगार की तलाश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, कमजोर आधारभूत सुविधाओं और विकास के असमान वितरण से जुड़ा गंभीर सामाजिक संकट बनता जा रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राज्य के अनेक गांव स्थायी रूप से खाली होकर “भूतिया गांव” (घोस्ट विलेज) में तब्दील हो सकते हैं।
यह निष्कर्ष भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है। अध्ययन में उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन के कारणों का विश्लेषण करते हुए पाया गया कि जलवायु परिवर्तन ने पहले से मौजूद समस्याओं को और अधिक गंभीर बना दिया है।
शोध के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में गिरावट, जल स्रोतों का कमजोर होना, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव तथा रोजगार के सीमित अवसर लोगों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं। पहले जहां पलायन को अस्थायी माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में परिवार स्थायी रूप से मैदानों और शहरी क्षेत्रों में बस रहे हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की गति मैदानी इलाकों की तुलना में काफी धीमी रही है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। इसके कारण पहाड़ और मैदान के बीच विकास का अंतर लगातार बढ़ता गया, जिससे स्थानीय लोगों का अपने गांवों में टिके रहना कठिन होता जा रहा है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खेती और पशुपालन जैसी पारंपरिक आजीविकाएं प्रभावित हुई हैं। वर्षा के अनियमित पैटर्न, जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। ऐसे में परिवार बेहतर शिक्षा, चिकित्सा और स्थायी आय की तलाश में पलायन को मजबूरी के रूप में अपनाने लगे हैं।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि पलायन का सबसे बड़ा प्रभाव जनसांख्यिकीय संरचना पर दिखाई दे रहा है। बड़ी संख्या में युवा और कामकाजी आयु वर्ग के लोग गांवों से बाहर जा रहे हैं, जबकि पीछे बुजुर्ग आबादी रह जाती है। इससे गांवों की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
राज्य पलायन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 से 2022 के बीच उत्तराखंड के गांवों से लगभग 6.9 लाख लोगों ने अस्थायी पलायन किया, जबकि करीब 1.4 लाख लोग स्थायी रूप से गांव छोड़ चुके हैं। अल्मोड़ा, टिहरी और पौड़ी जिले सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। पिछले वर्षों में कई गांव पूरी तरह आबादीविहीन हो चुके हैं और “घोस्ट विलेज” की संख्या लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल सड़क और भवन निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल कृषि, स्थानीय रोजगार सृजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं का सुदृढ़ीकरण, जल संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाली नीतियों की आवश्यकता है। अन्यथा पलायन का यह सिलसिला आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
