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आज बंगाल का भद्रलोक जो सोचता है, क्या भारत का बाकी हिस्सा कल वही सोचेगा?

— देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी

गोपाल कृष्ण गोखले का प्रसिद्ध कथन— “आज बंगाल जो सोचता है, भारत का बाकी हिस्सा कल वही सोचता है”— उस दौर की उपज था जब बंगाल भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक जागरण का अग्रणी केंद्र था। यह समझने के लिए कि यह कथन आज कितना प्रासंगिक है, बंगाल की राजनीतिक और बौद्धिक संस्कृति के ऐतिहासिक विकास तथा समकालीन राजनीति में भद्रलोक वर्ग की बदलती भूमिका का अध्ययन आवश्यक है।

ब्रिटिश शासन के दौरान कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासनिक मुख्यालय था और बाद में 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी भी रहा। औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक संरचनाओं के विस्तार के साथ बंगाल उन शुरुआती क्षेत्रों में शामिल हुआ जहां कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, साहित्य और राजनीतिक चिंतन जैसे क्षेत्रों में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार हुआ।

उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल पुनर्जागरण का उदय हुआ, जिसने भारतीय समाज और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और स्वामी विवेकानंद जैसी विभूतियों ने सामाजिक सुधार, तार्किक चिंतन, महिला शिक्षा और आधुनिक राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। सती प्रथा जैसी कुरीतियों के विरोध से लेकर सामाजिक जागरण तक, इस आंदोलन ने बंगाल को औपनिवेशिक भारत के बौद्धिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित किया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में बंगाल औपनिवेशिक विरोधी राजनीति, श्रमिक आंदोलनों और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का भी प्रमुख केंद्र बना। स्वतंत्रता के बाद लगभग तीन दशकों तक कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा। किंतु सामाजिक असंतोष, किसान और श्रमिक आंदोलनों तथा कांग्रेस शासन से बढ़ती निराशा ने धीरे-धीरे वामपंथी राजनीति के लिए जमीन तैयार की।

1977 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा सत्ता में आया और 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक शासन करता रहा। इस दौरान पश्चिम बंगाल देश में वामपंथी राजनीति का सबसे सशक्त गढ़ बन गया। ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों और बौद्धिक वर्ग पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव दिखाई देता था। उस समय अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि बंगाल में वामपंथ का प्रभुत्व लगभग स्थायी हो चुका है। इसलिए जब लंबे शासन के बाद वामपंथ का पतन हुआ, तो इसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों और सामाजिक वैज्ञानिकों दोनों को चौंकाया।

2011 में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के उदय ने राज्य की राजनीति में एक और बड़े बदलाव को जन्म दिया। तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस और वाम दलों दोनों से नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ा और स्वयं को बंगाली अस्मिता तथा लोककल्याणकारी राजनीति पर आधारित एक क्षेत्रीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।

2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने से बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ आया। लंबे समय तक राज्य में सीमित प्रभाव रखने वाली भाजपा ने शहरी मध्यम वर्ग, हिंदू मतदाताओं, अनुसूचित जातियों, जनजातीय समुदायों तथा तृणमूल और वाम दलों से निराश युवाओं के बीच तेजी से अपना आधार बढ़ाया। राष्ट्रवाद, नागरिकता, सीमा सुरक्षा, धार्मिक पहचान तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जैसे मुद्दे सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गए।

भाजपा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद जैसी ऐतिहासिक हस्तियों पर बल देते हुए बंगाल की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत की नई व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इससे भद्रलोक संस्कृति से जुड़ी वाम-उदारवादी बौद्धिक परंपराओं को चुनौती मिली और राज्य में वैचारिक प्रतिस्पर्धा का एक नया दौर शुरू हुआ।

हालांकि बंगाल का इतिहास केवल अभिजात बौद्धिक वर्ग के प्रभाव तक सीमित नहीं रहा है। नील विद्रोह, तेभागा आंदोलन, किसान संघर्ष, श्रमिक आंदोलनों और नक्सलबाड़ी विद्रोह जैसे जनआंदोलनों ने यह दिखाया कि बंगाल की राजनीतिक चेतना का निर्माण व्यापक जनभागीदारी के माध्यम से भी हुआ है।

आज यह प्रश्न बहस का विषय हो सकता है कि क्या बंगाल अब भी भारत का वैचारिक और राजनीतिक नेतृत्व करता है, जैसा गोखले के प्रसिद्ध कथन में कहा गया था। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि बंगाल आज भी देश के सबसे राजनीतिक रूप से सक्रिय, वैचारिक रूप से संघर्षशील और सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली क्षेत्रों में से एक है।

बंगाल का पुनर्जागरण और वामपंथी राजनीति के केंद्र से राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय पहचान तथा जमीनी लोकतंत्र के अखाड़े में रूपांतरण, स्वयं भारत में हो रहे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का प्रतिबिंब है। इस दृष्टि से प्रश्न आज भी प्रासंगिक बना हुआ है— क्या बंगाल अब भी भारत की भविष्य की राजनीतिक और सामाजिक दिशा की एक प्रारंभिक झलक प्रस्तुत करता है?

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लेखक समाजशास्त्री एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्य का उल्लेख अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

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