समान नागरिक संहिता – विवाह की उम्र में असमानता क्यो?

– उषा रावत-
देश के कई राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को सामाजिक और कानूनी एकरूपता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है। उत्तराखंड के बाद गुजरात और असम भी इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। लेकिन एक बुनियादी प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—जब संविधान समानता की बात करता है, तब विवाह की कानूनी आयु पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग क्यों है?
वर्तमान में भारत में महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष निर्धारित है। यह व्यवस्था दशकों से चली आ रही है, किंतु बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर बहस की आवश्यकता है।
18 वर्ष की आयु पूरी करते ही कोई युवक मतदान कर सकता है, सेना में भर्ती हो सकता है, वाहन चला सकता है, रोजगार कर सकता है, बैंक खाता खोल सकता है और अनेक कानूनी अनुबंधों में भाग ले सकता है। कानून उसे नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों के लिए परिपक्व मानता है। लेकिन वही युवक विवाह का निर्णय नहीं ले सकता। यह विरोधाभास स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़ा करता है कि यदि 18 वर्ष का व्यक्ति राष्ट्र के भविष्य से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम है, तो अपने जीवनसाथी के चयन का अधिकार उससे क्यों छीन लिया जाता है?
दूसरी ओर, महिलाओं की विवाह आयु 18 वर्ष निर्धारित होना भी अपने आप में विवादों से परे नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि कम आयु में विवाह करने वाली महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक भागीदारी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण था कि केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पहले महिलाओं की विवाह आयु 21 वर्ष करने का प्रस्ताव भी रखा था। हालांकि इस प्रस्ताव पर व्यापक सहमति नहीं बन सकी।
वास्तव में बहस का केंद्र केवल आयु नहीं, बल्कि समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता होना चाहिए। यदि राज्य का उद्देश्य लैंगिक समानता स्थापित करना है, तो पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग आयु सीमा बनाए रखना उस उद्देश्य के विपरीत प्रतीत होता है। दुनिया के अधिकांश देशों में विवाह की न्यूनतम आयु दोनों लिंगों के लिए समान है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार संस्थाएं भी समान कानूनी मानकों की वकालत करती हैं।
यूसीसी की चर्चा के बीच एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। यदि समानता का सिद्धांत विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों में लागू किया जा सकता है, तो क्या यह विवाह की आयु पर लागू नहीं होना चाहिए? समान नागरिक संहिता का वास्तविक अर्थ केवल अलग-अलग धार्मिक कानूनों को एकरूप करना नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच समान कानूनी व्यवहार सुनिश्चित करना भी है।
हालांकि विवाह की आयु घटाने या बढ़ाने का निर्णय केवल समानता के आधार पर नहीं लिया जा सकता। इसके सामाजिक परिणामों का भी मूल्यांकन आवश्यक है। शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य जैसे कारकों को ध्यान में रखे बिना केवल आयु परिवर्तन से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। ग्रामीण और शहरी भारत की परिस्थितियां भी एक जैसी नहीं हैं।
इसलिए आवश्यकता किसी जल्दबाजी में निर्णय लेने की नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की है। संसद, विधि आयोग, महिला संगठनों, युवा समूहों और सामाजिक वैज्ञानिकों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि 21वीं सदी के भारत में विवाह की न्यूनतम आयु क्या होनी चाहिए और क्या वह आयु पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान होनी चाहिए।
समान नागरिक संहिता पर चल रही बहस ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि कानूनों में वास्तविक समानता केवल धार्मिक समुदायों के बीच नहीं, बल्कि महिलाओं और पुरुषों के बीच भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विवाह की आयु का प्रश्न इसी व्यापक समानता की परीक्षा बन गया है। आखिर एक आधुनिक लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकार लिंग के आधार पर अलग-अलग क्यों हों? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर भविष्य के भारत को देना होगा।
