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देश जब आजाद हुआ, टिहरी गुलाम ही रही

This article, based on Jay Singh Rawat’s research book Tehri Rajya Ke Aitihasik Jan Vidroh, explores the struggle of the people of Tehri Garhwal against monarchical rule during the transition from British rule to independent India. It examines how the Tehri ruler asserted sovereignty after 15 August 1947 and attempted to suppress the Prajamandal movement through arrests, restrictive laws and repression. The imprisonment of Prajamandal leader Paripurnanand Painuli became a turning point, sparking strikes, protests and intensified public resistance. The article traces this non-violent democratic movement through the eventual transfer of power to the Prajamandal, India’s assumption of administration, and Tehri’s final merger with the Indian Union in 1949.

 


-जयसिंह रावत
15 अगस्त 1947 को जब सारा देश आजादी का जश्न मना रहा था और देशवासी सारे जहां से अच्छे हिन्दोस्तां के खयालों में डूबे थे तो टिहरी राज्य में राजशाही की गुलामी का एक नया दौर शुरू हो रहा था। चूंकि अन्य देशी राज्यों के शासकों के साथ ही टिहरी नरेश की पैरामौंटसी (सार्वभौम सत्ता) भी ब्रिटिश सरकार के पास गिरवी थी इसलिये अंग्रेजी राज समाप्त होते ही टिहरी का राजा भी स्वयं को स्वतंत्र मान बैठा और लोकतंत्र के पक्ष में उठ रहे स्वरों को दबाने के लिये कमर कसने लगा। इससे पहले शोषत शासित प्रजा कभीकभार राजशाही की शिकायत सीधे पॉलिटिकल ऐजेंट या अंग्रेज हाकिमों से कर लेती थी लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद राजा महाराजाओं पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया था।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब 14 एवं 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया तो उसी दिन टिहरी में भी महाराजा द्वारा सैन्य परेड का आयोजन किया गया। शिव प्रसाद डबराल आदि इतिहासकारों के अनुसार इस अवसर पर घोषणा की गयी कि “अब हमारे ऊपर अंग्रेजों का अधिपत्य नहीं रह गया और ब्रिटिश इंडिया के साथ ही टिहरी राज्य भी स्वतंत्र हो गया।” इस अवसर पर महाराजा ने ढडकियों (आन्दोलनकारियों) को भी साफ तौर पर चेतावनी दे डाली कि उसके पास एक सुदृढ़ सेना है जो कि विद्रोहियों के दमन के लिये काफी है। चूंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बदले विश्व परिदृष्य में भारत की आजादी अवश्यंभावी लग रही थी और उसके बाद 20 फरबरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली ने पार्लियामेंट में उत्तरदायी भारतीयों के हाथों में देश की सत्ता सौंपने की घोषणा कर दी थी, इसलिये अन्य देशी राज्यों की तरह टिहरी राज्य के शासक को भी अंग्रेजों से मुक्ति मिलने की उम्मीद बढ़ने के साथ ही नयी परिस्थितियों में शासन की पकड़ मजबूत करने के लिये टिहरी नरेश ने ’टिहरी गढ़वाल मैंटेनेंस आफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट (शांति रक्षा अधिनियम) पारित इसके जरिये ढंडकियों का दमन शुरू कर दिया।

दरअसल ब्रिटिश इण्डिया की लगभग 560 देशी रियासतों के साथ ही टिहरी को भी आन्तरिक और बाहरी खतरों से सुरक्षा की गारण्टी मिली हुयी थी और इसके बदले इन राज्यों की ’पैरामौंटसी’ ब्रिटिश सम्राट के सुपुर्द थी। अब जबकि अंग्रेजी शासन खत्म होने के साथ ही ब्रिटिश सम्राट के साथ साथ हुयी सारी संधियों भी समाप्त हो गयीं तो इन रियासतों के शासकों की सार्वभौम सत्ता स्वतः ही वापस मिल गयी थी और वे अपने राज्यों के सम्प्रभु बन गये थे।
वैसे भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेंमेंट एटली कह गया था कि देशी राज्यों की सम्प्रभुता किसी अन्य को नहीं सौंपी जायेगी। हालांकि नेहरू ने देशी राज्यों की स्वतंत्रता की थ्योरी को साफ तौर पर अस्वीकार करते हुये चेतावनी दे दी थी कि जो बाहरी देश इन राज्यों के साथ सीधा संबंध रखेगा उसे भारत सरकार शत्रुता मानेगी।

पहले स्वतंत्रता दिवस पर जब टिहरी प्रजामण्डल के अध्यक्ष परिपूर्णानन्द पैन्यूली अपनी जेल से फरारी के बाद नयी उम्मीदों को लेकर टिहरी की नयी राजधानी नरेन्द्रनगर पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हिरासत में लेने के बाद पैन्यूली को जिस कोठरी में उन्हें रखा गया वह नर्क से बदतर थी। पैन्यूली स्वयं बताते हैं कि उस कोठरी की चाहर दीवारी पर मल-मूत्र से पुताई की गयी थी। यही नहीं सारे नगर का पखाना एकत्र कर इस कोठरी के फर्श पर जमा कर रखा था। ऐसी विभत्स और बदबूदार स्थिति में सांस लेना भी बहुत मुश्किल था। ऐसी स्थिति में भोजन करना भी बहुत कठिन था, इसलिये उन्होंने खाना-पीना बंद कर दिया। उन्होंने उस दौरान 21 दिन तक भूख हड़ताल की। चारों ओर मल-मूत्र की बदबू और भूख हड़ताल के कारण पैन्यूली का स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। चूंकि पैन्यूली अब एक साधारण आन्दोलनकारी न होकर प्रजामण्डल के प्रधान थे और टिहरी में चल रहे सत्याग्रह का उन्हें डिक्टेटर भी बनाया गया था, इसलिये उनकी गिरफ्तारी के कारण रियासत के अंदर और बाहर काफी बवाल मचना स्वाभाविक ही था। कुछ दिन बाद देशी राज्य लोक परिषद के महामंत्री जयनारायण व्यास को पता चला तो वह पैन्यूली से मिलने चले आये। तब तक पैन्यूली को उस नारकीय काल कोठरी से अस्पताल में लाया जा चुका था।

पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद टिहरी के चीफ सेक्रेटरी ने देहरादून, लखनऊ, कानपुर, दिल्ली और गढ़वाल के जिला मजिस्ट्रेटों को सचेत कर दिया कि पैन्यूली की जेल से फरारी के बाद वह प्रजामण्डल द्वारा प्रधान चुने गये हैं, इसलिये उनकी गिरफ्तारी की प्रतिक्रिया जनाक्रोश के रूप में उनके क्षेत्र में भी हो सकती है। वास्तव में अगले ही दिन 16 अगस्त को पैन्यूली की गिरफ्तारी के विरोध में टिहरी नगर में आम हड़ताल रही। दरबार की ओर से शांति प्रयास किये जाने के बजाय दमन का मार्ग अपनाया गया। राज्य में नरेन्द्र शाह की जगह 1946 में ही मानवेन्द्र शाह ने सत्ता संभाल ली थी मगर दरबारी तो पुराने ही थे, जो कि पूर्व की भांति राजा को गलत राय ही देते थे। पुलिस ने प्रजामण्डल के कार्यकर्ताओं को पकड़ कर कारागार में डाल दिया। नगर के चारों ओर सेना का पहरा लगा दिया गया, जिससे सारा टिहरी नगर छावनी जैसा लगने लगा। इससे जनता का आक्रोश और भी अधिक भड़क गया। (डबराल: गढ़वाल का इतिहास भाग-3: 385 ) इसके बाद रियासत के विभन्न बाजार विरोध में बंद हो रहे थे। नागेन्द्र सकलानी, बंशीलाल पुडीर, दिनेश चन्द्र सकलानी, प्रेमलाल वैद्य, वीरेन्द्रदत्त सकलानी, मास्टर रामस्वरूप रतूड़ी आदि प्रमुख नेताओं को आन्दोलन भड़काने और शांति व्यवस्था भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। प्रजामण्डल के संस्थापक सदस्य और अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार श्यामचन्द सिंह नेगी अपने एक लेख (सितम्बर 1947: टिहरी सरकार समय की पुकार ) में लिखते हैं कि “प्रजामण्डल के प्रधान श्री परिपूर्णानन्द पैनोली प्रतिबन्ध की परवाह न कर 15 अगस्त को राज्य के अन्दर प्रवृष्ट हुये, यहीं से प्रजामण्डल का वर्तमान आन्दोलन छिड़ा।” वास्तव में टिहरी को राजशाही से आजाद करने वाली अहिंसक क्रांन्ति की शुरुआत पैन्यूली की गिरफ्तारी से शुरू हुयी।

देवप्रयाग के भूमिगत आन्दोलनकारी मुरलीधर शास्त्री ने दिनांक 26 अगस्त 1947 को पत्र लिख कर पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद उत्पन्न स्थिति से अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के महामंत्री जयनारायण व्यास को अवगत कराते हुये कहा कि “अब पुनः पत्र लिखने का कारण कि टिहरी में पुनः दमन चक्र शुरू हो गया है। 16 ता. पं. परिपूर्णानंद, प्रधान केन्द्रीय प्रजामंडल के गिरफ्तार होने पर विरोध करने में राज्य की नौकरशाही ने दफा 144 ता. 17-8-47 से लेकर 29-8-47 तक लगा दी है और इसी में पं. प्रेमलाल वैद्य, पं. शंकर दत्त डोभाल वगैरह 8 व्यक्ति गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इन पर पुलिस द्वारा मारपीट भी की गयी और पं. प्रेमलाल वैद्य के मुंह से खून की कै भी निकली। शंकर दत्त डोभाल का हाथ भी टूटा है और 19 ता0 से सबने भूख हड़ताल भी कर दी है।…..सुमन काण्ड की पुनरावृत्ति न हो जाय, ऐसा प्रतीत हो रहा है।” पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद भड़के जनाक्रोश को दबाने के लिये टिहरी के एडिशनल मजिस्ट्रेट ने नये सुरक्षा कानून के तहत टिहरी राज्य की कड़ाकोट, अकरी, डागर, डुंडसिर, बडियारगढ़, भरदार और सरजूला पट्टियों में 3 महीने के लिये धारा 144 लागू कर दी थी। ये पट्टियां प्रजामंडल से सहानुभूति रखने वाली मानी गयी थीं, जबकि कहीं कोई अशांति नहीं दिखाई दे रही थी।

जानवरों जैसा भोजन, गंदगी और भूख हड़ताल से गिरते स्वास्थ्य तथा अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद सहित चारों ओर से पड़ रहे दबाव के आगे झुक कर दरबार ने अन्ततः पैन्यूली को सितम्बर 1947 में जेल से रिहा कर ही दिया। जेल से रिहाई के बाद परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने टिहरी के जनसंघर्ष का संचालन एक बार फिर अपने हाथ में ले लिया और 15 जनवरी 1948 को प्रजामण्डल ने टिहरी की सत्ता अपने हाथ में ले ही ली। अगले दिन भारत सरकार ने टिहरी का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और अन्ततः 1 अगस्त 1949 को टिहरी का भारत संघ में विलय हो ही गया। वास्तव में टिहरीवासियों का स्वतंत्रता दिवस ही यही है।

 

 ABOUT AUTHOR: Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author OF A several research books, and political commentator with 48 years of professional experience. He has worked with leading news organizations, including Press Trust of India (PTI), and has authored nine research and reference books on history, journalism, the Himalaya, environment, and Uttarakhand. His scholarship reflects extensive field research and documentation of regional history, culture, society, and democratic movements, with particular emphasis on preserving and interpreting the historical legacy of Uttarakhand.

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