सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों के नए रहस्य उजागर, 100 वर्षों के सौर रिकॉर्ड का एआई से विश्लेषण
For more than a hundred years, scientists have been trying to understand how the Sun’s magnetic activity rises and falls in rhythmic cycles. These cycles affect sunspots, flares, and eruptions, which can disrupt satellites, navigation, and power on Earth. However, older observations are often incomplete and inconsistent, making long-term study difficult. That’s why historical records are very valuable.
By- Jyoti Rawat
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग की मदद से वैज्ञानिकों ने दक्षिण भारत की कोडाइकनाल सौर वेधशाला (KoSO) में पिछले 100 वर्षों से संजोए गए सूर्य के हाथ से बनाए गए चित्रों का विश्लेषण कर सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन से वर्ष 1916 से 2007 के बीच सूर्य पर सक्रिय चुंबकीय क्षेत्रों में हुए बदलावों की नई जानकारी मिली है, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष मौसम (स्पेस वेदर) की बेहतर समझ विकसित होने की उम्मीद है।
वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि सूर्य की चुंबकीय गतिविधियां समय के साथ कैसे बदलती हैं। यही गतिविधियां सूर्य पर बनने वाले सूर्य धब्बों (Sunspots), सौर ज्वालाओं (Solar Flares) और अन्य शक्तिशाली विस्फोटों को प्रभावित करती हैं। इनका असर पृथ्वी पर भी पड़ता है और कभी-कभी उपग्रह संचार, जीपीएस, बिजली आपूर्ति तथा अन्य तकनीकी प्रणालियों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
अब तक पुराने सौर अभिलेखों का अध्ययन कठिन था क्योंकि वे हाथ से बनाए गए चित्रों पर आधारित थे और उनमें शैली, कागज तथा स्कैनिंग की गुणवत्ता में काफी अंतर था। इससे एक समान और विश्वसनीय डेटासेट तैयार करना आसान नहीं था।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन आर्यभट्ट अनुसंधान संस्थान (ARIES) के वैज्ञानिक दिब्य कीर्ति मिश्रा के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST), तिरुवनंतपुरम, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु तथा अमेरिका के साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने सहयोग किया।
कोडाइकनाल सौर वेधशाला में वर्ष 1904 से 2022 तक के दैनिक “सूर्य चार्ट” सुरक्षित हैं। इन चार्टों में वैज्ञानिकों ने प्रतिदिन सूर्य के धब्बों, प्लेज (Plage), फिलामेंट और अन्य सौर संरचनाओं का हाथ से अत्यंत सावधानीपूर्वक चित्रण किया था। ये रिकॉर्ड आज भी सौर विज्ञान के लिए अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यू-नेट (U-Net) नामक मशीन लर्निंग तकनीक का उपयोग किया। सबसे पहले एआई मॉडल ने प्रत्येक स्कैन किए गए चित्र में सूर्य की डिस्क की सही पहचान की और उसका केंद्र, आकार तथा झुकाव निर्धारित किया। इसके बाद उसने 1916 से 2007 के बीच के नौ सौर चक्रों में सूर्य की सतह पर मौजूद प्लेज नामक चुंबकीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों की पहचान कर उनका विश्लेषण किया।
प्लेज सूर्य के ऐसे चमकीले क्षेत्र होते हैं जो उसके चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता का संकेत देते हैं। इन्हें सूर्य के चुंबकत्व का विश्वसनीय “फिंगरप्रिंट” माना जाता है। पुराने अभिलेखों से इनकी सटीक पहचान होने से वैज्ञानिक वर्तमान अंतरिक्ष युग के आंकड़ों की तुलना लगभग एक सदी पुराने रिकॉर्ड से कर सकते हैं।
एआई द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने सूर्य की गतिविधियों का प्रसिद्ध “बटरफ्लाई डायग्राम” तैयार किया, जिससे विभिन्न सौर चक्रों के दौरान चुंबकीय गतिविधियों में होने वाले बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन हाथ से बनाए गए चित्रों से प्राप्त आंकड़े कोडाइकनाल वेधशाला के Ca II K प्रेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों से काफी मेल खाते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि पुराने सूर्य चार्ट सौर रिकॉर्ड में मौजूद अंतरालों को भरने और दीर्घकालिक आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय बनाने में उपयोगी हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का लंबी अवधि का सटीक रिकॉर्ड वैज्ञानिकों को विभिन्न सौर चक्रों की तुलना करने, सूर्य की ऊर्जा और चुंबकीय व्यवहार में समय के साथ आए परिवर्तनों को समझने तथा पृथ्वी को प्रभावित करने वाले अंतरिक्ष मौसम के दीर्घकालिक जोखिमों का अधिक सटीक आकलन करने में मदद करेगा।
यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल (The Astrophysical Journal) में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की सहायता से दशकों पुराने असंगठित वैज्ञानिक अभिलेखों को भी विश्वसनीय डिजिटल डेटा में बदला जा सकता है, जिससे भविष्य के सौर अनुसंधान को नई दिशा मिलेगी।
प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.3847/1538-4365/ae381e
