माटी का मसीहा: छात्र राजनीति के अखाड़े से उत्तराखंड के नवनिर्माण तक हीरा सिंह बिष्ट का ऐतिहासिक सफर
_____________________________
◆ शीशपाल गुसाईं की विशेष रिपोर्ट
_____________________________
उन्हें उत्तराखंड में कांग्रेस का सबसे वरिष्ठ नेता कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। उनकी वरिष्ठता का इतिहास 1977 से शुरू होता है, जब वे तत्कालीन टिहरी (गढ़वाल) संसदीय क्षेत्र (जिसमें टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून का ग्रामीण क्षेत्र शामिल था) से कांग्रेस के प्रत्याशी बने थे। यद्यपि 1977 की जनता पार्टी की लहर में वे भारतीय लोक दल के त्रेपन सिंह नेगी से चुनाव हार गए थे, लेकिन उनके राजनीतिक संघर्ष का ढांचा वहीं से तैयार हो गया था।
राजनीति का गणित भी बड़ा विचित्र होता है। 1980 में जब हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के टिकट पर पौड़ी गढ़वाल से चुनाव लड़े, तो उन्होंने टिहरी सीट पर अपने करीबी त्रेपन सिंह नेगी को टिकट दिलवा दिया। 1977 की पराजय के बाद 1980 में कांग्रेस की प्रचंड लहर के बावजूद हीरा सिंह बिष्ट टिकट पाने से वंचित रह गए। यह ठीक वैसा ही राजनीतिक घटनाक्रम था, जैसा 1989 में अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी के साथ हुआ था 1989 में कोश्यारी जी अल्मोड़ा – पिथौरागढ़ सीट से भाजपा के टिकट पर लड़े और हारे —जब 1991 में राम लहर आई, तो नई दिल्ली से जीवन शर्मा को प्रत्याशी बनाकर भेज दिया गया और वे सांसद बन गए। टिकटों के इस फेरबदल का दौर आगे भी जारी रहा। 1984 में त्रेपन सिंह नेगी, ब्रह्मदत्त के सामने नहीं टिक सके और फिर ब्रह्मदत्त का दौर शुरू हुआ, जिन्हें राजीव गांधी ने अपने मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पेट्रोलियम मंत्रालय की जिम्मेदारी दी। हीरा सिंह बिष्ट कभी भी ब्रह्मदत्त गुट के नेता नहीं रहे। उन्हें विधानसभा तक पहुँचाने का सबसे बड़ा श्रेय दिवंगत चंद्र मोहन सिंह नेगी को जाता है।
1977 के लोकसभा चुनाव से तीन साल पहले, साल 1972-73 और 1973-74 में हीरा सिंह बिष्ट देहरादून के प्रतिष्ठित डीएवी कॉलेज के लगातार दो बार छात्र संघ अध्यक्ष रहे थे। उस दौर में अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र की राजनीतिक बिसात पर हरीश रावत ने भी कदम रखा था। हरीश रावत 1980 में लोकसभा चुनाव लड़े; वे ग्राम प्रधान और ब्लॉक प्रमुख भी रहे। लेकिन वरिष्ठता के पैमाने पर हीरा सिंह बिष्ट उनसे भी आगे थे। हीरा सिंह बिष्ट तपोवन- नालापानी गांव (देहरादून) से दो बार ग्राम प्रधान रहे और 1980 में डोईवाला से पृथक होकर 1982 में बने रायपुर ब्लॉक के पहले ब्लॉक प्रमुख बने।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के दो माह बाद जब लोकसभा चुनाव हुए, तो पौड़ी गढ़वाल (जिसमें तत्कालीन देहरादून शहर सीट भी आती थी) से चंद्र मोहन सिंह नेगी सांसद चुने गए। बहुगुणा का 1982 में ही कांग्रेस से दूसरी बार मोहभंग हो चुका था। इसके बाद मार्च 1985 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा। देहरादून शहर सीट से केंद्रीय मंत्री ब्रह्मदत्त के बहुत नजदीकी विनोद चंदोला को कांग्रेस का टिकट मिल गया। चार दिनों तक यह टिकट चंदोला जी के पास ही रहा—ठीक वैसे ही जैसे 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में डोईवाला विधानसभा क्षेत्र का टिकट एक रात के लिए भाजपा नेत्री दीप्ति रावत भारद्वाज के पास रहा था। अगले दिन भाजपा का टिकट डोईवाला से बृजभूषण गैरोला को मिल गया, लेकिन चंद्र मोहन सिंह नेगी ने अपने राजनीतिक रसूख से यह टिकट बदलवा दिया और हीरा सिंह बिष्ट की किस्मत के दरवाजे खुल गए। 1985 के इस चुनाव में हीरा सिंह बिष्ट ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए हरबंस कपूर को भारी मतों से हराया। इस जीत के पीछे हीरा सिंह बिष्ट की दूरदर्शिता भी थी। उन्होंने डीएवी कॉलेज में अपने अनुज मित्र और 1975- 76 में छात्र संघ अध्यक्ष रहे विवेक खण्डूड़ी ( विवेकानंद खण्डूड़ी) को इस चुनाव में लोक दल से खड़े न होने के लिए मना लिया था। विवेक खंडूरी के चुनाव न लड़ने से समीकरण एकतरफा हो गए और हीरा सिंह बिष्ट पहली बार लखनऊ विधानसभा पहुँचे। यद्यपि 1989 के बाद से हरबंस कपूर ने देहरादून सीट पर ऐसा वर्चस्व बनाया कि वे 2021 तक अजेय रहे, लेकिन 1985 की वह जीत हीरा सिंह बिष्ट के जनाधार का प्रमाण थी।
उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की सरकार के दौरान हीरा सिंह बिष्ट ने भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) यानी कांग्रेस की श्रम इकाई को जबरदस्त मजबूती दी। मजदूरों के अधिकारों के लिए सड़क से लेकर सदन तक उन्होंने जो आवाज उठाई, उसने उन्हें ‘मजदूरों का मसीहा’ बना दिया। वर्ष 2002 में जब पृथक उत्तराखंड राज्य का पहला विधानसभा चुनाव हुआ, तब राजपुर रोड सीट सुरक्षित श्रेणी में नहीं थी। हीरा सिंह बिष्ट ने यहाँ से जीत दर्ज की और नारायण दत्त तिवारी के मंत्रिमंडल में परिवहन, श्रम और तकनीकी शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री बने। बतौर मंत्री उनके कार्यकाल की चार सबसे बड़ी उपलब्धियाँ आज भी देहरादून की पहचान हैं: उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (शुद्धोवाला): यद्यपि विजन एन.डी. तिवारी का रहा होगा , लेकिन इसे धरातल पर उतारने का कार्य हीरा सिंह बिष्ट के मंत्रालय के अधीन ही हुआ।
देहरादून का आईएसबीटी (ISBT): अंतरराज्यीय बस अड्डे का निर्माण परिवहन मंत्री के रूप में उन्हीं के खाते में दर्ज है। हीरा सिंह बिष्ट ने अविभाजित यूपी के दौर में ही रायपुर में स्टेडियम हेतु भूमि आवंटित करा दी थी, जहाँ आगे चलकर भव्य स्टेडियम और नवोदय विद्यालय की स्थापना हुई। राज्य के क्रिकेट को बीसीसीआई (BCCI) से आधिकारिक मान्यता दिलाने तथा अपने क्षेत्र में ‘आईटी पार्क’ स्थापित कराने में भी उनकी निर्णायक भूमिका रही। उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन में अग्रणी रहे बिष्ट जी ने दून की प्राकृतिक धरोहर को बचाए रखने के लिए आजीवन संघर्ष किया। तिवारी सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा के लिए राज्य हितैषी भू-कानून को लागू कराने में उन्होंने मंत्रिमंडल के भीतर सबसे सशक्त और ऐतिहासिक पैरवी की।
2002 से 2007 के दौरान हीरा सिंह बिष्ट को हरीश रावत खेमे का सबसे सशक्त चेहरा माना जाता था। 2005 के आसपास जब एन.डी. तिवारी को हटाए जाने की चर्चाएँ गर्म थीं, तो टीवी चैनलों की पट्टियों पर हीरा सिंह बिष्ट का नाम भावी मुख्यमंत्री के रूप में तेजी से तैरने लगा था। हालाँकि, नारायण दत्त तिवारी की राजनीतिक शैली अद्भुत थी। तिवारी जी देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के जंगलों के बीच में एक घर से प्रदेश की सरकार चलाते थे। जब भी असंतोष बढ़ता, वे केंद्रीय नेताओं (जैसे मोतीलाल वोरा) के माध्यम से नेताओं को सांत्वना दिलवाकर मामला शांत कर देते थे। या तिवाड़ी जी नई दिल्ली में आला कांग्रेसी नेताओं को बोल कर इन नेताओं का नाम मुख्यमंत्री के लिए खुद ही चलवा देते थे। उन्होंने ऐसा ही प्रयोग इंदिरा हृदयेश और शूरबीर सिंह सजवाण के साथ भी किया था। आगे चलकर 2014 के डोईवाला विधानसभा उपचुनाव में हीरा सिंह बिष्ट ने एक बार फिर शानदार वापसी की और विधायक चुने गए। हालांकि, साल-2017 में डोईवाला और 2022 में रायपुर से उन्हें सफलता नहीं मिल पाई।
राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं—इस लोकतांत्रिक मर्यादा, मानवीय संवेदना और राजनीतिक शिष्टाचार का अप्रतिम उदाहरण तब देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व पूर्व मंत्री स्वर्गीय हीरा सिंह बिष्ट को श्रद्धांजलि अर्पित करने उनके आवास पहुँचे। हीरा सिंह बिष्ट की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी निश्छल और जनपक्षधर सोच। वे देहरादून के हितों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहे। जब भी शहर पर कोई संकट आया या गलत नीतियाँ थोपी गईं, हीरा सिंह बिष्ट दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सबसे पहले बोलते थे। इसी राजनीतिक शुचिता का परिणाम था कि भाजपा के वरिष्ठ नेता / विधायक विनोद चमोली ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने हमेशा ‘हीरा सिंह भाई’ का सम्मान किया। जिस दिन हीरा सिंह बिष्ट का निधन हुआ, उस दिन भाजपा कार्यकर्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में व्यस्त थे। लेकिन अपने राजनीतिक विरोधी के प्रति अगाध सम्मान व्यक्त करते हुए, भाजपा नेताओं ने कार्यक्रम के दौरान ही 2 मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी और इसके बाद उनके अंतिम संस्कार में नालापानी पहुँचे।
वर्ष 2004–05 में, जब मैं नई टिहरी से टेलीविजन पत्रकारिता कर रहा था, तब पता चला कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता हीरा सिंह बिष्ट अपने पैतृक गांव धारकोट (चंबा के निकट) किसी धार्मिक अनुष्ठान में आ रहे हैं। यद्यपि मैं उनका कार्यक्रम कवर नहीं कर सका, लेकिन उनकी जन्मभूमि और पारिवारिक पृष्ठभूमि को जानने की उत्सुकता बढ़ गई। स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने पर उनके कुछ परिजनों ने बताया कि उनका परिवार बहुत पहले धारकोट से देहरादून के नालापानी क्षेत्र में बस गया था। हालांकि, इसके समर्थन में मुझे कोई प्रामाणिक दस्तावेज़ नहीं मिला। यह प्रसंग स्यूटा गांव ( चंबा ब्लॉक )से जौली गांव डोईवाला आकर बसे पूर्व विधायक रणजीत सिंह वर्मा के परिवार की याद दिलाता है, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। संभव है कि हीरा सिंह बिष्ट के परिवार का पलायन भी इसी प्रकार हुआ हो, लेकिन इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण इसे केवल एक संभावित अनुमान ही माना जा सकता है।
वर्ष 2020 में जब मैंने ‘भरतु दाई’ के संस्मरणों पर विस्तार से लिखना शुरू किया,। तब से हीरा सिंह बिष्ट मुझे पहचानने लगे थे। भरतु दाई के हीरा सिंह बिष्ट और मसूरी के विधायक / मंत्री शांति प्रपन्न शर्मा विरोधी थे। भरतु दाई यानी भरत सिंह नेगी 1970 के और 80 के दशक के देहरादून के रॉबिन हुड थे। बिष्ट जी के मोबाइल फोन की संपर्क सूची में मेरा नंबर दर्ज था और वे समय-समय पर खुद फोन करके पुरानी घटनाओं और राजनीतिक संदर्भों पर चर्चा किया करते थे। उनका वह सरल, बेबाक और स्नेहपूर्ण अंदाज अब केवल यादों में शेष है। हीरा सिंह बिष्ट केवल एक नेता नहीं थे; वे देहरादून के विकास, मजदूरों के हक और उत्तराखंड की संघर्षशील चेतना के जीवंत प्रतीक थे।
विनम्र श्रद्धांजलि बिष्ट जी ।
संदर्भ:
1. श्री सुरेंद्र सिंह सजवाण, पूर्व प्रधान 1980, अधोईवाला (व्यक्तिगत बातचीत)।
2. श्री राजीव नेगी, देहरादून (व्यक्तिगत बातचीत)।
3. श्री दर्शन सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व ब्यूरो प्रमुख, हिन्दुस्तान (व्यक्तिगत बातचीत)।
4. श्री संजय कोठियाल, संपादक, युगवाणी (व्यक्तिगत बातचीत)।
5. श्री जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार (व्यक्तिगत बातचीत)।
6. श्री जितेंद्र अंथवाल, वरिष्ठ पत्रकार एवं हिमालय बुलेटिन न्यूज़ पोर्टल 26 जुलाई ।
7. भारत निर्वाचन आयोग के अभिलेख।
8. राजीव गांधी क्रिकेट स्टेडियम रायपुर और बीसीसीआई के अभिलेख
9. वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा महाराणा प्रताप अंतरराज्यीय बस अड्डा, देहरादून के अभिलेख।
10. श्री विनोद चमोली , विधायक, धर्मपुर का वक्तव्य
