युवाओं का बढ़ता असंतोष और रोजगार का संकट

–उषा रावत
देश में युवाओं के बीच बढ़ती बेचैनी को केवल छात्र आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं या सरकारों के खिलाफ तत्कालीन नाराजगी के रूप में देखना समस्या की गंभीरता को कम करके आंकना होगा। दिल्ली में छात्रों का आंदोलन हो, झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं का आक्रोश या कर्नाटक में सरकारी भर्तियों में देरी के खिलाफ उठी आवाज—इन घटनाओं के पीछे एक साझा बेचैनी दिखाई देती है। यह बेचैनी उस पीढ़ी की है, जो पढ़-लिखकर रोजगार चाहती है, लेकिन उसके सामने अवसर सीमित और अनिश्चितता लगातार बढ़ती जा रही है।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है। यह युवा आबादी देश के लिए असाधारण आर्थिक शक्ति बन सकती है, लेकिन तभी जब उसके लिए पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध हों। यदि शिक्षा पूरी करने के बाद वर्षों तक युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता रहे, भर्ती की प्रतीक्षा करता रहे और अंततः परीक्षा में पेपर लीक, परिणाम में देरी, चयन प्रक्रिया पर सवाल या नियुक्ति रुक जाने जैसी स्थितियों का सामना करे, तो उसका असंतोष स्वाभाविक है।
समस्या केवल बेरोजगारी की संख्या से नहीं समझी जा सकती। असली संकट शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई का है। हर वर्ष लाखों युवा स्नातक और अन्य डिग्रियां लेकर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। दूसरी ओर, सरकारी नौकरियां सीमित हैं और निजी क्षेत्र जिस गति से रोजगार पैदा करना चाहिए, उस गति से अवसर पैदा नहीं कर पा रहा। परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में शिक्षित युवा अपनी योग्यता से कम स्तर के काम को स्वीकार करने के लिए मजबूर होते हैं।
इस स्थिति का एक दूसरा पहलू भी है। उच्च शिक्षा अब पहले जैसी सस्ती नहीं रही। देश में निजी शिक्षण संस्थानों की बढ़ती भूमिका ने शिक्षा के खर्च को कई परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बना दिया है। परिवार अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी अपेक्षा होती है कि शिक्षा के बाद बेटे-बेटियों को ऐसा रोजगार मिलेगा, जिससे वे आत्मनिर्भर हो सकें और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकें। लेकिन जब वर्षों की पढ़ाई के बाद भी स्थायी रोजगार नहीं मिलता, तो निराशा केवल युवा तक सीमित नहीं रहती, पूरे परिवार को प्रभावित करती है।
यही कारण है कि सरकारी नौकरी का आकर्षण आज भी इतना अधिक है। इसे केवल सरकारी नौकरी की सुरक्षा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में सरकारी नौकरी सामाजिक प्रतिष्ठा, नियमित आय और भविष्य की सुरक्षा का भी प्रतीक है। लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित होने के बावजूद जब लाखों अभ्यर्थी कुछ हजार पदों के लिए आवेदन करते हैं, तो प्रतियोगिता असाधारण रूप से कठिन हो जाती है। ऐसे में चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता सर्वोच्च महत्व हासिल कर लेती है।
भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी युवाओं के धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाती है। पेपर लीक, नकल, परीक्षा स्थगित होना, परिणाम में वर्षों की देरी, न्यायालय में मामले और नियुक्तियों का लंबे समय तक अटकना केवल प्रशासनिक खामियां नहीं हैं। इनका सीधा असर उन युवाओं पर पड़ता है, जो अपनी उम्र के महत्वपूर्ण वर्ष किसी एक परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं। एक परीक्षा रद्द होने का अर्थ उनके लिए केवल एक परीक्षा का नुकसान नहीं, बल्कि कई महीनों या वर्षों के समय का नुकसान हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षा के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का आवेदन और उसके बाद प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने भी यही दिखाया था कि सरकारी नौकरी के लिए युवाओं में कितनी तीव्र प्रतिस्पर्धा है। झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी जैसी संस्थाओं से जुड़ी शिकायतें हों या किसी अन्य राज्य में भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद, संदेश एक ही जाता है—यदि व्यवस्था युवाओं को निष्पक्ष अवसर देने में विफल रहती है तो असंतोष बढ़ेगा।
लेकिन इस संकट का समाधान केवल भर्ती परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने तक सीमित नहीं हो सकता। मूल प्रश्न यह भी है कि रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा क्यों नहीं हो रहे हैं?
निजी क्षेत्र आर्थिक विकास का सबसे बड़ा रोजगारदाता बन सकता है, लेकिन इसके लिए उद्योग, विनिर्माण, सेवा क्षेत्र और छोटे उद्यमों का पर्याप्त विस्तार जरूरी है। केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। ऐसी वृद्धि चाहिए जो बड़ी संख्या में युवाओं के लिए रोजगार पैदा करे। यदि अर्थव्यवस्था बढ़ती रहे लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में न बढ़ें, तो युवा आबादी आर्थिक शक्ति बनने के बजाय असंतोष का स्रोत बन सकती है।
सरकारों के सामने एक और गंभीर चुनौती है—स्वीकृत सरकारी पदों का लंबे समय तक खाली रहना। वित्तीय दबाव के कारण सरकारें नियुक्तियों को टाल सकती हैं। इससे अल्पकाल में वेतन और प्रशासनिक खर्च नियंत्रित दिखाई दे सकता है, लेकिन इसका दीर्घकालिक प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है। स्कूलों में शिक्षक कम हों, अस्पतालों में चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी कम हों, पुलिस बल में रिक्तियां बनी रहें या प्रशासनिक विभाग कर्मचारियों की कमी से जूझते रहें तो इसका असर सीधे सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ता है।
विडंबना यह है कि एक ओर बेरोजगार युवा सरकारी नौकरी के लिए वर्षों से इंतजार कर रहा है और दूसरी ओर सरकारी विभागों में पद खाली पड़े हैं। यह विरोधाभास नीति निर्माण की गंभीर कमी को सामने लाता है। सरकारों को यह तय करना होगा कि वास्तविक आवश्यकता वाले पदों को खाली रखना आर्थिक बचत है या सार्वजनिक व्यवस्था और मानव संसाधन में निवेश की कीमत टालना।
युवाओं के असंतोष का संबंध सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं से भी जुड़ता है। गरीब और जरूरतमंद वर्गों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता या सामाजिक सुरक्षा देने की अपनी उपयोगिता है, लेकिन रोजगार के विकल्प के रूप में लगातार नकद सहायता देना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। युवा सहायता नहीं, अवसर चाहते हैं। वे ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें उनकी शिक्षा, कौशल और मेहनत का उपयोग हो और उन्हें अपनी आय अर्जित करने का अवसर मिले।
राजनीतिक दलों के लिए मुफ्त योजनाएं तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकती हैं, लेकिन रोजगार का संकट लगातार बढ़ता रहा तो यही रणनीति भविष्य में उलटा असर डाल सकती है। जिस युवा को आज थोड़ी आर्थिक सहायता मिल रही है, वह कल स्थायी रोजगार और बेहतर भविष्य की मांग करेगा। युवाओं की आकांक्षाओं को लंबे समय तक केवल आर्थिक प्रोत्साहनों से नहीं दबाया जा सकता।
इसलिए सरकारों के सामने अब प्राथमिकता बदलने का समय है। भर्ती कैलेंडर समयबद्ध हो, रिक्त पदों की नियमित समीक्षा हो, परीक्षाओं की विश्वसनीय व्यवस्था बने, पेपर लीक और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी पर कठोर कार्रवाई हो तथा नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया निश्चित समय सीमा में पूरी की जाए। इसके साथ निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन, छोटे कारोबारों के विस्तार और कौशल आधारित रोजगार पर गंभीरता से काम करना होगा।
भारत की युवा आबादी को अक्सर जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है। लेकिन युवा आबादी अपने आप लाभांश नहीं बनती। उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, अवसर और भरोसेमंद संस्थागत व्यवस्था चाहिए। यदि युवा को लगे कि मेहनत के बाद भी नौकरी नहीं मिलेगी और नौकरी मिलने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष नहीं है, तो उसकी ऊर्जा व्यवस्था के निर्माण में नहीं, उसके खिलाफ असंतोष में लग सकती है।
आज के छात्र आंदोलन इसलिए केवल छात्रों के आंदोलन नहीं हैं। वे उस व्यापक सवाल का संकेत हैं जो देश का युवा पूछ रहा है—पढ़ाई के बाद मेरे लिए अवसर कहां है? इस सवाल का जवाब मुफ्त सुविधाओं से नहीं, रोजगार, पारदर्शी भर्ती और भरोसेमंद व्यवस्था से देना होगा। यही सरकारों के सामने सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक चुनौती है।
