सहज पालन-पोषण के दौर में भारतीय समाज किस दिशा में बढ़ रहा है?
-देवेंद्र कुमार बुडाकोटी-
कनाडा में 6 अगस्त को एक बच्चे के व्यवहार से जुड़ी घटना के बारे में पढ़ते हुए भारतीय समाज में बच्चों के पालन-पोषण को लेकर चल रही बहस एक बार फिर मन में उठी। बताया गया कि एक बच्चे ने अपनी सीट पर बैठने और सीट बेल्ट बांधने से इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप उड़ान में देरी हुई और अंततः उसे रद्द कर अगले दिन के लिए पुनर्निर्धारित करना पड़ा।
यह घटना एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है कि आधुनिक समाजों में सहज या सौम्य पालन-पोषण के क्या परिणाम हो सकते हैं? साथ ही, यह विमान में मौजूद अन्य यात्रियों के रवैये पर भी सवाल खड़े करती है। खबरों के अनुसार, माता-पिता ने कथित तौर पर बच्चे के व्यवहार में हस्तक्षेप नहीं किया और उनका तर्क था कि सीट बेल्ट पहनने से इनकार करना बच्चे का व्यक्तिगत अधिकार है।
क्या किसी बच्चे को अनुचित व्यवहार करने का असीमित अधिकार होना चाहिए, खासकर तब, जब उसके व्यवहार से दूसरे लोगों की सुरक्षा और सुविधा प्रभावित हो रही हो? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विमान में मौजूद कोई व्यक्ति बच्चे या उसके माता-पिता से समझाने-बुझाने के साथ दृढ़ता से बात क्यों नहीं कर सका? यह केवल सकारात्मक या सहज पालन-पोषण का सवाल नहीं है, बल्कि समाज में बढ़ती सामाजिक उदासीनता की ओर भी संकेत करता है।
पारंपरिक भारतीय समाज में बच्चों को अनुशासित करना केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं माना जाता था। रिश्तेदार, शिक्षक, बुजुर्ग और यहां तक कि समुदाय के अन्य सदस्य भी बच्चे के व्यवहार को आकार देने में अपनी भूमिका निभाते थे। खासकर सार्वजनिक स्थानों पर अनुचित व्यवहार करने पर बुजुर्ग बच्चों को डांट सकते थे। हालांकि, ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब बच्चों या युवाओं के खराब व्यवहार पर आपत्ति जताने वाले बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार या मारपीट तक हुई। ऐसी घटनाओं ने भी लोगों को दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप करने से हतोत्साहित किया है।
हाल में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान भी ऐसी ही बहस देखने को मिली, जब प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा की सोशल मीडिया पर व्यापक आलोचना हुई। कई लोगों ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के संस्कार और पालन-पोषण पर भी सवाल उठाए।
पश्चिमी देशों में बच्चों के पालन-पोषण के अधिक सहज और समझदारीपूर्ण दृष्टिकोण को 1950 के दशक में डॉ. बेंजामिन स्पॉक की पुस्तक द कॉमन सेंस बुक ऑफ बेबी एंड चाइल्ड केयर से व्यापक पहचान मिली। स्पॉक ने बच्चों के प्रति अधिक नरम और संवेदनशील दृष्टिकोण की वकालत की। उन्होंने कठोर और अधिनायकवादी पालन-पोषण को हतोत्साहित किया तथा शारीरिक दंड का विरोध किया।
मनोवैज्ञानिक कैरोलिन गोल्डमैन ने अपनी पुस्तक गो टू योर रूम में बच्चों के अनुचित व्यवहार की स्थिति में स्पष्ट और दृढ़ सीमाएं निर्धारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका तर्क है कि सहज पालन-पोषण के प्रभाव में ऐसी पीढ़ी तैयार हुई है, जिसके कुछ माता-पिता यह तय करने को लेकर असमंजस में हो सकते हैं कि बच्चों के लिए सीमाएं कब, क्यों और कैसे निर्धारित की जाएं। उन्होंने ऐसे कुछ व्यवहारों की भी पहचान की है, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जिनमें अत्यधिक शिकायत करना और अनावश्यक रूप से बहुत अधिक शोर करना शामिल है।
हालांकि, गोल्डमैन के विचारों की आलोचना भी हुई है। कुछ लोग ‘टाइम-आउट’ जैसी पद्धतियों को मनोवैज्ञानिक हिंसा का एक रूप मानते हैं। उनका तर्क है कि ऐसी पद्धतियां माता-पिता और बच्चों के बीच संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कई भारतीयों को गोल्डमैन का तर्क कुछ हद तक परिचित लग सकता है। भारत की कई पीढ़ियों ने स्वयं अनुभव किया है या देखा है कि बच्चों को माता-पिता, रिश्तेदारों, शिक्षकों, गांव के बुजुर्गों और समुदाय के अन्य सदस्यों द्वारा डांटा जाता था और कई बार शारीरिक दंड भी दिया जाता था।
परंपरागत भारतीय समाज में अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण की एक मजबूत व्यवस्था थी। बच्चे के अनुचित व्यवहार से केवल उसे ही नहीं, बल्कि उसके परिवार को भी सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता था। सामाजिक प्रतिष्ठा निजी और सार्वजनिक, दोनों जीवन में अनुशासन बनाए रखने का एक अतिरिक्त माध्यम थी।
निश्चित रूप से बच्चों को सम्मान, गरिमा और शारीरिक दंड से मुक्ति मिलनी चाहिए। लेकिन सहज पालन-पोषण का अर्थ सीमाओं, अनुशासन या माता-पिता की जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं होना चाहिए। व्यक्तिगत अधिकारों के नाम पर उचित ठहराया जाने वाला व्यवहार कई बार परिवार और सार्वजनिक जीवन के लिए परेशानी का कारण बन सकता है, जैसा कि विमान की घटना से स्पष्ट होता है।
यदि बचपन में अनुचित व्यवहार पर ध्यान नहीं दिया गया, तो बाद में उसे नियंत्रित करना अधिक कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति व्यक्ति और समाज, दोनों के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। अनुशासनहीनता आगे चलकर टकराव, हिंसा, दुर्व्यवहार और व्यापक सामाजिक अव्यवस्था का रूप भी ले सकती है।
व्यक्तिगत अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे दूसरों के अधिकारों और जिम्मेदारियों से अलग होकर अस्तित्व में नहीं रह सकते। प्रत्येक अधिकार अपने साथ दूसरों के प्रति एक जिम्मेदारी भी लेकर आता है। माता-पिता और समाज के सामने वास्तविक चुनौती बच्चों को यह समझाना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहां से शुरू होती है और कहां उसे दूसरों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों के सम्मान के लिए सीमित होना चाहिए।
शायद इसका समाधान यह नहीं है कि भारत अपने पुराने अधिनायकवादी पालन-पोषण की व्यवस्था को जस का तस बनाए रखे। बेहतर रास्ता यह है कि आधुनिक पालन-पोषण के सकारात्मक पहलुओं को अपनाते हुए पारंपरिक भारतीय समाज में मौजूद सामुदायिक जिम्मेदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व के बेहतर तत्वों को भी बचाया जाए।
बच्चों को स्नेह, सम्मान और स्वतंत्रता की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें सीमाओं, जवाबदेही और इस समझ की भी जरूरत है कि उनके कार्यों का प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। हमें ऐसा पालन-पोषण विकसित करना होगा, जो बच्चों को केवल अपने अधिकारों के प्रति सजग न बनाए, बल्कि उन्हें अपने कर्तव्यों और दूसरों के अधिकारों के प्रति भी जिम्मेदार नागरिक बनाए।

