स्मार्टफोन से आसान हो सकती है अल्जाइमर की शुरुआती पहचान
-ज्योति रावत –
अल्जाइमर रोग की शुरुआती पहचान को सरल, कम खर्चीला और अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा स्मार्टफोन आधारित जांच मंच विकसित किया है, जो अल्जाइमर से जुड़े प्रमुख जैव संकेतक एमिलॉयड-बीटा (Aβ) की पहचान कर सकता है। इस तकनीक में ‘TZ-48’ नामक एक विशेष फ्लोरेसेंस-प्रतिक्रियाशील छोटे अणु का उपयोग किया गया है। एमिलॉयड-बीटा के संपर्क में आने पर इस अणु की चमक में बदलाव होता है और स्मार्टफोन से जुड़ी प्रणाली उस बदलाव को दर्ज कर उसकी मात्रा का आकलन करती है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर) के वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आगे व्यापक परीक्षण और चिकित्सकीय सत्यापन के बाद यह प्रणाली अल्जाइमर की शुरुआती जांच को अधिक सुलभ बनाने में उपयोगी हो सकती है।
अल्जाइमर में क्यों महत्वपूर्ण है एमिलॉयड-बीटा
अल्जाइमर एक प्रगतिशील तंत्रिका संबंधी विकार है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त धीरे-धीरे कमजोर होने के साथ सोचने-समझने, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। बीमारी बढ़ने के साथ व्यवहार में भी बदलाव आ सकते हैं। अल्जाइमर की जटिल रोग प्रक्रिया में एमिलॉयड-बीटा प्रोटीन की असामान्य संरचना और उसका मस्तिष्क में जमा होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
एमिलॉयड-बीटा के अणु आपस में जुड़कर तंतुओं का रूप लेने लगते हैं और बाद में मस्तिष्क की कोशिकाओं के बाहर प्लाक के रूप में जमा हो जाते हैं। ये जमाव तंत्रिका कोशिकाओं के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। धीरे-धीरे तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क बाधित होने और उनके क्षरण की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
अल्जाइमर की पहचान में एमिलॉयड-बीटा, टाऊ प्रोटीन और तंत्रिका कोशिकाओं के क्षरण से संबंधित जैव संकेतकों को महत्वपूर्ण माना जाता है। इनमें एमिलॉयड-बीटा में होने वाले रोग संबंधी बदलाव अपेक्षाकृत शुरुआती अवस्था में सामने आ सकते हैं। इसी कारण वैज्ञानिक लंबे समय से इसकी आसान और सटीक पहचान की तकनीक विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
मौजूदा जांचें महंगी और जटिल
अल्जाइमर के आकलन में पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी यानी पीईटी और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी एमआरआई जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। ये मस्तिष्क में होने वाले बदलावों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती हैं, लेकिन इनकी लागत अधिक होने के साथ विशेष उपकरण, बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती है। इस कारण इनका बड़े स्तर पर इस्तेमाल आसान नहीं है।
मस्तिष्कमेरु द्रव और रक्त में एमिलॉयड-बीटा तथा टाऊ जैसे जैव संकेतकों की जांच के नए तरीके भी सामने आए हैं। रक्त आधारित जांचों को विशेष रूप से भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कई मौजूदा तकनीकों की लागत और जटिल प्रक्रिया अभी भी चुनौती है। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसी जांच प्रणाली विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं जो संवेदनशील होने के साथ सरल और बड़े स्तर पर इस्तेमाल योग्य हो।
‘TZ-48’ की चमक बताएगी एमिलॉयड-बीटा की मौजूदगी
जेएनसीएएसआर के वैज्ञानिकों ने इसी दिशा में ‘TZ-48’ नामक एक स्मार्ट फ्लोरेसेंस लाइफटाइम-रिस्पॉन्सिव प्रोब विकसित किया है। सरल शब्दों में कहें तो यह ऐसा विशेष अणु है जिसकी चमक एमिलॉयड-बीटा के संपर्क में आने पर बदल जाती है। इस बदलाव के आधार पर नमूने में एमिलॉयड-बीटा की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने फ्लोरेसेंस लाइफटाइम इमेजिंग माइक्रोस्कोपी तकनीक का भी उपयोग किया है। इसमें केवल किसी पदार्थ की चमक को देखने के बजाय यह मापा जाता है कि प्रकाश से उत्तेजित होने के बाद वह कितने समय तक चमकता है। इस अवधि को ‘फ्लोरेसेंस लाइफटाइम’ कहा जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह जांच में इस्तेमाल किए गए पदार्थ की मात्रा और समय के साथ उसकी चमक कम होने जैसी कुछ सीमाओं से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होती है। इससे जैव संकेतकों की अधिक विश्वसनीय पहचान में मदद मिल सकती है।
‘एसीएस केमिकल न्यूरोसाइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार TZ-48 ने एमिलॉयड-बीटा फाइब्रिल्स की अत्यधिक चयनात्मक और संवेदनशील पहचान की क्षमता दिखाई। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस अणु ने अल्जाइमर से प्रभावित ट्रांसजेनिक चूहों के मस्तिष्क में एमिलॉयड-बीटा प्लाक को प्रभावी ढंग से चिह्नित किया। शोधकर्ताओं ने बीमारी के विभिन्न चरणों में मस्तिष्क में एमिलॉयड के जमाव का आकलन करने के लिए भी इसका उपयोग किया।
रक्त और मस्तिष्कमेरु द्रव में भी पहचान
इस शोध की खास बात यह है कि TZ-48 का उपयोग केवल मस्तिष्क के ऊतकों की तस्वीर लेने तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने इसे मस्तिष्कमेरु द्रव और रक्त सीरम में एमिलॉयड-बीटा की पहचान के लिए भी परखा। अध्ययन में इसने अल्जाइमर से प्रभावित और स्वस्थ चूहों के नमूनों के बीच अंतर करने की क्षमता दिखाई।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अल्जाइमर से संबंधित जैव संकेतकों की विश्वसनीय पहचान रक्त जैसे आसानी से लिए जा सकने वाले नमूनों से संभव होती है, तो भविष्य में बीमारी की जांच को अधिक सरल बनाने की संभावना बढ़ सकती है। मौजूदा अध्ययन हालांकि मुख्य रूप से प्रयोगशाला और पशु मॉडल पर आधारित है, इसलिए मनुष्यों में इसके उपयोग से पहले व्यापक चिकित्सकीय परीक्षण आवश्यक होंगे।
स्मार्टफोन से जुड़ा ‘ADxFluor’ मंच
तकनीक को प्रयोगशाला से आगे अधिक व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने ‘ADxFluor’ नामक स्मार्टफोन आधारित मंच विकसित किया है। इस शोध में कृति के. भगवत, मधु रमेश, योगेंद्र कुमार, सब्यसाची मंडल, हिरियक्कनवर इला और थिम्मैया गोविंदराजू शामिल हैं।
ADxFluor स्मार्टफोन की मदद से TZ-48 की फ्लोरेसेंस प्रतिक्रिया को दर्ज करता है। इसके जरिए रक्त सीरम में एमिलॉयड-बीटा के स्तर का तेजी से और मात्रात्मक आकलन किया जा सकता है। यानी केवल यह जानने तक बात सीमित नहीं रहती कि जैव संकेतक मौजूद है या नहीं, बल्कि उसकी मात्रा का अनुमान लगाने की दिशा में भी यह तकनीक काम करती है।
इस पूरी प्रणाली में मस्तिष्क की इमेजिंग, शरीर के द्रवों में एमिलॉयड-बीटा की पहचान और स्मार्टफोन आधारित मापन को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। वैज्ञानिक इसे अल्जाइमर सहित अन्य तंत्रिका क्षय संबंधी बीमारियों के लिए भविष्य की सरल जांच तकनीकों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।
कम खर्च वाली जांच की दिशा में संभावना
TZ-48 को स्मार्टफोन आधारित ADxFluor मंच से जोड़ने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी संभावित सरलता और पोर्टेबिलिटी है। महंगी इमेजिंग मशीनों पर निर्भरता कम करने वाली ऐसी प्रणाली भविष्य में उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, जहां अत्याधुनिक चिकित्सा जांच सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
हालांकि इस उपलब्धि को फिलहाल अल्जाइमर की तैयार चिकित्सकीय जांच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शोध अभी नई तकनीक की क्षमता प्रदर्शित करता है और मनुष्यों में इसके व्यापक उपयोग से पहले इसकी संवेदनशीलता, सटीकता और विश्वसनीयता का बड़े स्तर पर नैदानिक परीक्षणों में सत्यापन जरूरी होगा। इसके बावजूद स्मार्टफोन, विशेष फ्लोरेसेंस अणु और रक्त आधारित जैव संकेतक जांच को एक मंच पर लाने की यह पहल अल्जाइमर की शुरुआती, सस्ती और आसानी से उपलब्ध जांच विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण संभावना प्रस्तुत करती है।
प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.1021/acschemneuro.6c00230
