हर आबादी के आंत के बैक्टीरिया एक जैसे नहीं, दक्षिण एशिया पर बड़े अध्ययन में खुलासा
Scientists from Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (BSIP), an autonomous institution of the Department of Science and Technology (DST) along with the University of Chicago, and collaborating institutions across India, Sri Lanka, and the USA, designed a study to understand how changing lifestyles influence the gut microbiome across different cultural, dietary, and ecological settings and to generate a comprehensive microbiome resource representing the diversity of South Asia.
By- Jyoti Rawat
भारत और श्रीलंका सहित दक्षिण एशिया के लोगों की आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव दुनिया के दूसरे हिस्सों के लोगों से काफी अलग हैं। इतना ही नहीं, दक्षिण एशिया के भीतर भी अलग-अलग समुदायों के आंत के सूक्ष्मजीवों की बनावट एक जैसी नहीं है। खान-पान, रहन-सहन, स्थानीय संस्कृति, भौगोलिक परिस्थितियां और शहरीकरण इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
575 स्वस्थ वयस्कों पर किए गए एक बड़े अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भविष्य में मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और चयापचय से जुड़ी दूसरी बीमारियों की रोकथाम और उपचार में आंत के सूक्ष्मजीवों की भूमिका बढ़ सकती है। अध्ययन यह भी संकेत देता है कि पश्चिमी देशों के लोगों पर किए गए शोध के निष्कर्षों को सीधे दक्षिण एशियाई आबादी पर लागू करना हमेशा उचित नहीं होगा।
क्या है आंत का माइक्रोबायोम
हमारी आंतों में खरबों बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव रहते हैं। इनके पूरे समुदाय को ‘गट माइक्रोबायोम’ यानी आंत का सूक्ष्मजीव संसार कहा जाता है। ये सूक्ष्मजीव भोजन पचाने से लेकर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और चयापचय तक अनेक प्रक्रियाओं से जुड़े होते हैं। इनके संतुलन में बदलाव का संबंध मोटापा, मधुमेह और दूसरी बीमारियों से भी देखा जा रहा है।
अब तक आंत के माइक्रोबायोम पर अधिकांश बड़े अध्ययन यूरोप और उत्तरी अमेरिका की आबादी पर केंद्रित रहे हैं। दक्षिण एशिया में दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी रहने के बावजूद इस क्षेत्र का ऐसे अध्ययनों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रहा है।
इसी कमी को दूर करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने शिकागो विश्वविद्यालय और भारत, श्रीलंका तथा अमेरिका के अन्य संस्थानों के साथ मिलकर व्यापक अध्ययन किया।
575 लोगों के नमूनों की हुई जांच
शोधकर्ताओं ने भारत और श्रीलंका के दस सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से अलग-अलग समुदायों के 575 स्वस्थ वयस्कों को अध्ययन में शामिल किया। प्रतिभागियों से उनके खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य की जानकारी लेने के साथ मल के नमूने एकत्र किए गए। इन नमूनों के जरिए उनकी आंतों में मौजूद बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया गया।
वैज्ञानिकों ने ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच भी तुलना की। इसके साथ दक्षिण एशिया में मिले आंत के सूक्ष्मजीवों की तुलना दुनिया के दूसरे हिस्सों से उपलब्ध आंकड़ों से की गई।
अध्ययन में पाया गया कि प्रत्येक समुदाय के आंत के सूक्ष्मजीवों में बदलाव का अपना अलग स्वरूप है। इसे उस समुदाय का खान-पान, रहन-सहन, स्थानीय संस्कृति, भौगोलिक स्थिति और शहरीकरण प्रभावित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि शहरों की ओर बढ़ती जीवनशैली का असर भी हर समुदाय के आंत के सूक्ष्मजीवों पर एक जैसा नहीं पड़ता।
शहरीकरण के असर में भी अंतर
दक्षिण एशिया में तेजी से शहरीकरण के साथ मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और चयापचय संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। वैज्ञानिक पहले से जानते हैं कि ग्रामीण जीवनशैली से शहरी जीवनशैली की ओर जाने पर खान-पान, शारीरिक गतिविधि और पर्यावरण में बदलाव आते हैं और इनका असर आंत के सूक्ष्मजीवों पर भी पड़ सकता है।
नए अध्ययन ने इस तस्वीर को और स्पष्ट किया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि शहरीकरण के कारण आंत के माइ्रोबायोम में होने वाले बदलाव सभी समुदायों में समान नहीं हैं। अलग-अलग समुदाय अपने खान-पान, संस्कृति और पर्यावरण के कारण शहरीकरण पर अलग-अलग जैविक प्रतिक्रिया दिखा सकते हैं।
इसीलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी एक देश या आबादी के आधार पर तैयार माइक्रोबायोम संबंधी मानकों को पूरी दुनिया के लिए समान नहीं माना जा सकता।
भारत में पहली बार ‘सांबर’ का इस्तेमाल
अध्ययन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ‘साउथ एशियन माइक्रोबायोम ऐरे’ है, जिसे संक्षेप में ‘सांबर’ नाम दिया गया है। बीरबल साहनी संस्थान के वैज्ञानिकों ने भारत में पहली बार इस संसाधन का उपयोग किया।
आंत के सूक्ष्मजीवों की पहचान के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक डीएनए अनुक्रमण तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्नत जैव-सूचना विश्लेषण के जरिए यह समझने का प्रयास किया गया कि किस समुदाय में कौन से सूक्ष्मजीव अधिक या कम हैं और उनका खान-पान, भूगोल, शहरीकरण तथा चयापचय स्वास्थ्य से क्या संबंध है।
इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना का नेतृत्व बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज में प्राचीन डीएनए समूह के प्रमुख डॉ. नीरज राय ने किया। श्रेया एल. रामचंद्रन, नागार्जुन पसुपुलेटी, रिचर्ड जे. एब्दिल, नीरज राय और मानसा राघवन की अगुवाई वाली टीम ने आंकड़ों का विश्लेषण कर शहरीकरण तथा चयापचय स्वास्थ्य से जुड़े समुदाय-विशिष्ट सूक्ष्मजीवी संकेतों की पहचान की।
मधुमेह और मोटापे के अध्ययन में मिलेगी मदद
‘गट माइक्रोब्स’ शोध पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन को भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह भारत के स्वस्थ लोगों की आंत के माइक्रोबायोम से संबंधित शुरुआती व्यापक आधारभूत आंकड़ों में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
इसका व्यावहारिक महत्व यह है कि भविष्य में आंत के सूक्ष्मजीवों के आधार पर बीमारी की पहचान, व्यक्ति विशेष के लिए पोषण संबंधी सलाह अथवा उपचार विकसित किए जाते हैं, तो उनमें संबंधित क्षेत्र और आबादी की विशेषताओं को ध्यान में रखना होगा।
मसलन, किसी पश्चिमी देश के लोगों के आंत के बैक्टीरिया के आधार पर मधुमेह या मोटापे से संबंधित कोई मानक तैयार किया गया है तो जरूरी नहीं कि वही मानक भारतीय आबादी के लिए भी पूरी तरह उपयुक्त हो। भारतीयों का भोजन, पर्यावरण, जीवनशैली और आंत का सूक्ष्मजीव संसार अलग होने के कारण स्थानीय आंकड़ों की जरूरत होगी।
‘सांबर’ से तैयार यह आधार भविष्य में मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और जीवनशैली से जुड़ी अन्य बीमारियों पर होने वाले अनुसंधान में उपयोगी हो सकता है। अध्ययन का मुख्य संदेश यही है कि आंत का माइक्रोबायोम केवल शरीर के भीतर की जैविक व्यवस्था नहीं है, बल्कि उस पर हमारे भोजन, परिवेश, संस्कृति, भूगोल और बदलती जीवनशैली की भी गहरी छाप होती है।
