हिमालय की व्यथा के संकेत: नेपाल, ऋषिगंगा और धराली
The latest devastating flood in the Bhote Koshi River in Nepal’s Rasuwa region has once again exposed the deep distress of the Himalaya—warning signs that would be perilous to ignore. Preliminary scientific assessments suggest that the sudden surge in the Bhote Koshi was not an ordinary rainfall-induced flood. As in the Rishiganga disaster of February 7, 2021, there are indications that a massive mass of ice and rock may have collapsed in an avalanche, plunged into the river valley and transformed into a destructive debris flow carrying water, boulders and sediment. The catastrophic flood at Dharali in Uttarkashi on August 5, 2025, too, occurred without rainfall intense enough to readily explain the scale of destruction. Scientific investigation into the precise causes of the latest Nepal flood is still under way, but the circumstances surrounding these three disasters show striking similarities. Taken together, they constitute a grave warning for the Himalayan region.

–जयसिंह रावत–
नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी की ताजा विनाशकारी जलप्रलय ने हिमालय की गंभीर वेदना को एक बार फिर प्रकट कर दिया, जिसे अनुसना करना आत्मघाती होगा। प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण संकेत देते हैं कि भोटेकोशी नदी में आया उफान सामान्य वर्षाजनित बाढ़ नहीं थी। इस बाढ़ में भी ठीक ऋषिगंगा की 7 फरबरी 2021 की बाढ़ की तरह विशाल हिमखण्ड के एवलांच के रूप में, नदी घाटी में गिरने और पानी, बोल्डर तथा तलछट के साथ विनाशकारी मलबा-प्रवाह में बदलने की आशंका सामने आई है। पिछले साल 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली की विनाशकारी बाढ़ भी तो बिना बारिश के आ गयी थी। नेपाल की बाढ़ के अंतिम कारणों की वैज्ञानिक जांच अभी जारी है, लेकिन इन तीनों बाढ़ों की परिस्थितियां समान ही हैं और यह समानता एक गंभीर चेतावनी के रूप में हमारे सामने है।

नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार प्रभावित क्षेत्र में घटना से पहले ऐसी भारी वर्षा दर्ज नहीं हुई जो अकेले इतनी प्रचंड बाढ़ को समझा सके। अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र के प्रारंभिक विश्लेषण में ल्हेंदे खोला के ऊपरी हिस्से में विशाल हिम-चट्टान (एवलांच) टूटने की संभावना सामने आई है। उपग्रह चित्रों में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से हिमखण्ड टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरने के संकेत मिले हैं। आशंका है कि मलबे ने कुछ समय नदी को अवरुद्ध किया और प्राकृतिक बांध टूटने पर विशाल जल-मलबा प्रवाह भोटेकोशी होते हुए त्रिशूली की ओर दौड़ पड़ा। हिमालय के नदी नालों में ऐसे बांध बनने और फिर टूटने का इतिहास पुराना अवश्य है लेकिन इनकी पुनरावृतियां न तो इतनी तीब्र थीं और ना ही इतनी मारक होती थीं।
दरअसल यह खतरा नेपाल तक सीमित नहीं है। पहले चट्टान या हिमखण्ड टूटता है और नीचे गिरते हुए मलबा समेटता है, नदी अवरुद्ध होती है, अस्थायी झील बनती है और झील टूटने पर पानी, हिम, बोल्डर और मिट्टी का विशाल मिश्रण घाटी में दौड़ पड़ता है। इसे केवल बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन या हिमनद झील विस्फोट के किसी एक पुराने खाने में रखना कठिन है। तिब्बती पठार और ऊंचे हिमालय से निकलने वाली भोटेकोशी, सतलुज और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में एवलांच और हिमनद झील फटने अथवा भूस्खलन से बनी झीलों के टूटने की घटनाएं पहले भी सीमाओं के पार विनाश ला चुकी हैं। तिब्बत में ‘पोइंकू चू’ नाम से उद्गम लेने वाली भोटेकोशी अत्यंत तीव्र ढाल वाली नदी है। जुलाई 2016 की बाढ़ ने नेपाल के तातोपानी क्षेत्र और अरनिको राजमार्ग को भारी क्षति पहुंचाई थी। वर्ष 2000 में तिब्बत में यिगोंग भूस्खलन-झील टूटने से अरुणाचल की सियांग घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई, जबकि 2005 में तिब्बत में बनी पारेचू झील के टूटने से हिमाचल प्रदेश की सतलुज घाटी प्रभावित हुई। दूसरी ओर अत्यधिक गाद और नदी का मार्ग बदलना भी हिमालयी नदियों के खतरे को कई गुना बढ़ाता है। वर्ष 2008 की कुसहा त्रासदी में कोशी ने तटबंध तोड़कर पुराना मार्ग पकड़ लिया और बिहार में व्यापक तबाही मचाई। ये घटनाएं बताती हैं कि हिमालय में पैदा हुआ जल-संकट राष्ट्रीय सीमाएं नहीं पहचानता।

7 फरवरी 2021 को ऋषिगंगा की बाढ़ ने हिमालयी आपदा-विज्ञान की पुरानी धारणा को तोड़ दिया था। उसने बताया था कि महाविनाशकारी बाढ़ के लिए न हमेशा बादल फटना आवश्यक और ना ही बरसात की आवश्यकता है। कभी-कभी स्वयं बर्फ का पहाड़ टूटकर भी या भूस्खलन भी जलप्रलय पैदा कर सकता है। ऋषिगंगा-धौलीगंगा जलप्रलय में रोंटी पर्वत की अत्यंत खड़ी ढाल से लगभग 2.7 करोड़ घनमीटर हिमखण्ड का विशाल द्रव्यमान टूटकर नीचे ऋषिगंगा में गिरा था। प्रचंड ऊर्जा ने उसे तेजी से बहते मलबे में बदल दिया, जो विशाल बोल्डर, मिट्टी और तलछट समेटता हुआ ऋषिगंगा से धौलीगंगा तक पहुंचा। इस आपदा में 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हुए। 13.2 मेगावाट की ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना लगभग समाप्त हो गई और 520 मेगावाट की निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुगाड परियोजना को भारी क्षति पहुंची।

इस कड़ी में उत्तरकाशी जिले की 5 अगस्त 2025 की धराली त्रासदी भी महत्वपूर्ण है। खीर गाड़ से आया पानी और मलबा कुछ ही मिनटों में धराली पर टूट पड़ा। उपग्रह विश्लेषण में खीर गाड़ और भागीरथी के संगम पर लगभग 20 हेक्टेयर में फैला, करीब 750 मीटर लंबा और 450 मीटर चौड़ा मलबा जमाव दिखाई दिया। मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार घराली की घटना वाले दिन निकटवर्ती हरसिल में केवल लगभग 8 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई। बाद के अध्ययनों में भी ऐसी स्थानीय असाधारण वर्षा का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला जो अकेले इतने विशाल मलबा-प्रवाह को समझा सके। वैज्ञानिकों का ध्यान ऊपरी खीर गंगा जलागम, श्रीकंठ हिमनद के नीचे की तीव्र ढाल, अस्थिर मोरेन और वहां जमा पर्वतीय मलबे की ओर गया। संभव है पानी ने पहले से अस्थिर सामग्री को सक्रिय करने वाले अंतिम कारक की भूमिका निभाई हो।
जलवायु परिवर्तन को हर घटना का सीधा कारण घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन बदलती पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है। हिंदूकुश-हिमालय तेजी से गर्म हो रहे पर्वतीय क्षेत्रों में है। हिमनद पीछे हटने पर बर्फ के सहारे स्थिर ढालें खुलती हैं, नई झीलें बनती और फैलती हैं, मोरेन अस्थिर होते हैं तथा चट्टानों में जमने-पिघलने और पानी के प्रवेश की प्रक्रियाएं बदलती हैं। गर्म होता वातावरण प्रत्येक आपदा का तत्काल कारण भले न हो, वह उस भू-व्यवस्था को अवश्य बदल रहा है जिसमें ऐसी आपदाएं जन्म लेती हैं।
इसलिए चुनौती विकास रोकने की नहीं, बल्कि उसे नए जोखिम के अनुरूप ढालने की है। जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा में केवल संभावित नदी-बाढ़ की गणना पर्याप्त नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि परियोजना से दस-बीस किलोमीटर ऊपर लाखों या करोड़ों घनमीटर हिम-चट्टान अचानक टूट जाए तो क्या होगा और लोगों को बचने के लिए कितना समय मिलेगा।
इन हालातों ने हिमालय की निगरानी को अतिआवश्यक बना दिया है। उपग्रह चित्र, मौसम केंद्र, भूकंपीय संवेदक, हिमनद निगरानी, नदी जलस्तर मापक और अस्थिर ढालों की वास्तविक समय निगरानी को एक तंत्र में जोड़ना होगा। भारत, नेपाल, भूटान और चीन के बीच ऊंचे हिमालय की झीलों, हिमनदों, भूस्खलनों और नदी अवरोधों की त्वरित सूचना साझा करना अब वैज्ञानिक सहयोग से आगे जीवन रक्षा की आवश्यकता है। ऋषिगंगा ने 2021 में चेताया। धराली ने 2025 में सवाल दोहराया और अब नेपाल ने उसे फिर सामने रख दिया है। हम अब तक बाढ़ आने पर नदी की ओर देखते रहे हैं। बदलते हिमालय में हमें नदी से हजारों मीटर ऊपर उस पहाड़ को भी लगातार देखना होगा, जहां अगली जलप्रलय की शुरुआत पानी से नहीं, एक चट्टान, एक हिमखंड या अस्थिर होती पर्वतीय ढाल से हो सकती है।
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ABOUT AUTHOR : Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author and researcher with nearly five decades of experience. He has written extensively on Himalayan affairs, environment, disasters, politics and history, and has authored several reference books on the region.

