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‘अनिकेत’ के स्वर्णिम 50वें वर्ष में प्रवेश : पांच दशकों की जनपक्षधर पत्रकारिता का सफर

 


अनुसूया प्रसाद मलासी
समय के पचास वर्ष किसी पत्र-पत्रिका के जीवन में केवल कैलेंडर के पन्नों का बदलना नहीं होते। इन वर्षों में पीढ़ियां बदलती हैं, समाज बदलता है, सरोकार बदलते हैं, पत्रकारिता के तौर-तरीके और माध्यम बदलते हैं और कई बार समय के साथ मुद्दों की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। इन तमाम बदलावों के बीच यदि कोई पत्र अपनी मूल चेतना, जनसरोकार और सामाजिक प्रतिबद्धता को थामे हुए आधी सदी की दहलीज तक पहुंचता है, तो यह केवल उसकी उम्र का पड़ाव नहीं, बल्कि उसके विचार, विश्वास और संघर्ष की सफलता का प्रमाण होता है। इसी गौरवपूर्ण पड़ाव पर आज ‘अनिकेत’ खड़ा है। प्रख्यात पत्रकार रमेश पहाड़ी की दूरदृष्टि, निर्भीक पत्रकारिता और जनसरोकारों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से शुरू हुई ‘अनिकेत’ की यात्रा अपने स्वर्णिम 50वें वर्ष में प्रवेश कर रही है।
‘अनिकेत’ का यह सफर किसी एक व्यक्ति, संपादक या संस्था का सफर भर नहीं है। यह उन असंख्य लोगों की साझी यात्रा है, जिन्होंने समाज के सवालों को अपना सवाल माना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और पत्रकारिता को केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने और बदलाव की राह बनाने का दायित्व समझा। इसलिए ‘अनिकेत’ का 50वां वर्ष उन सभी पत्रकारों, लेखकों, पाठकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, आंदोलनकारियों, बुद्धिजीवियों, सहयोगियों और शुभचिंतकों का भी वर्ष है, जिनकी संवेदनाएं, विचार और संघर्ष इसके पन्नों पर किसी न किसी रूप में दर्ज हुए हैं।
खबरों से आगे समाज की आवाज
‘अनिकेत’ की पहचान केवल खबरें प्रकाशित करने वाले पत्र के रूप में नहीं रही। उसने अपने समय की धड़कनों को सुना, समाज के भीतर उठती बेचैनियों को समझा और उन आवाजों को मंच दिया, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता था। जब पहाड़ के गांवों, जंगलों, नदियों और आम लोगों से जुड़े सवाल दूर बैठे सत्ता प्रतिष्ठानों तक आसानी से नहीं पहुंचते थे, तब ‘अनिकेत’ ने उन्हें शब्द दिए और जनचर्चा का विषय बनाया।
जनांदोलनों के दौर में इसने उन आवाजों को जगह दी, जो व्यवस्था से सवाल कर रही थीं। पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया। जंगल, जल, जमीन और हिमालय से जुड़े मुद्दों को केवल पर्यावरण का विषय न मानकर आम आदमी के जीवन, आजीविका और भविष्य से जोड़कर देखा। शराबबंदी जैसे सामाजिक अभियानों से लेकर महिलाओं, युवाओं, किसानों, श्रमिकों और वंचित समुदायों के अधिकारों तक ‘अनिकेत’ ने अपने सरोकारों का दायरा हमेशा व्यापक रखा।
अन्याय, भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों के सामने उसकी कलम ने मौन रहना स्वीकार नहीं किया। शायद यही कारण है कि अनेक ऐसे मुद्दे, जिन्हें शुरुआत में स्थानीय या छोटे सवाल समझकर नजरअंदाज किया जाता था, निरंतर लेखन और जनपक्षधर पत्रकारिता के कारण बाद में व्यापक जनचर्चा और आंदोलनों का आधार बने।
पांच दशकों में बदलती दुनिया, कायम रहे सरोकार
इन पचास वर्षों में पत्रकारिता की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। कभी समाचार के लिए पाठक को छपे हुए अंक की प्रतीक्षा रहती थी। समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही समाज के बीच विचार-विमर्श के सबसे प्रभावशाली मंच हुआ करते थे। फिर रेडियो और टेलीविजन का विस्तार हुआ और आज मोबाइल फोन, इंटरनेट तथा डिजिटल माध्यमों ने सूचना को पल भर में दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाना संभव बना दिया है।
तकनीक बदल गई, खबर पहुंचाने की गति बदल गई और पत्रकारिता के सामने चुनौतियां भी बदल गईं, लेकिन कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं होतीं—सत्य के प्रति निष्ठा, समाज के प्रति संवेदनशीलता और जनहित के पक्ष में खड़े होने का साहस। ‘अनिकेत’ की पांच दशक की यात्रा इसी बुनियादी विश्वास की यात्रा है।
उसने लोगों तक केवल समाचार पहुंचाने का काम नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने, सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराने और लोकतांत्रिक मूल्यों, न्याय तथा जनहित के पक्ष में सोचने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया। उसके पन्नों में समय-समय पर दर्ज खबरें, लेख, टिप्पणियां और विचार आज पीछे मुड़कर देखने पर केवल पत्रकारिता की सामग्री नहीं रह जाते, बल्कि अपने समय के सामाजिक इतिहास के दस्तावेज भी दिखाई देते हैं।
हर पन्ने के पीछे अनगिनत लोगों की स्मृतियां
किसी पत्र की पचास वर्षों की यात्रा केवल उसकी जिल्दों और पुराने अंकों में सुरक्षित नहीं रहती। उसका असली इतिहास उन लोगों की स्मृतियों में भी जीवित रहता है, जिन्होंने उसे पढ़ा, उसमें लिखा, उसके लिए खबरें जुटाईं, कठिन परिस्थितियों में उसे पाठकों तक पहुंचाया या उसके उठाए किसी सवाल से प्रभावित होकर सामाजिक बदलाव की किसी मुहिम का हिस्सा बने।
किसी के लिए ‘अनिकेत’ में छपी पहली कविता आज भी जीवन की अनमोल स्मृति होगी। किसी लेखक को अपना पहला लेख प्रकाशित होने की खुशी आज भी याद होगी। किसी पत्रकार के लिए वह पहली खबर अविस्मरणीय होगी, जिसे ‘अनिकेत’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। किसी आंदोलनकारी के लिए शायद ‘अनिकेत’ की कोई खबर या टिप्पणी उस समय संबल बनी होगी, जब उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। किसी पाठक के मन में किसी विशेष अंक, लेख, संपादकीय या तस्वीर की याद आज भी ताजा होगी।
इन्हीं छोटी-बड़ी स्मृतियों को जोड़ने पर ‘अनिकेत’ की असली कहानी बनती है। वह कहानी केवल कागज पर छपे शब्दों की नहीं, बल्कि मनुष्यों, संघर्षों, उम्मीदों, रिश्तों और सामाजिक सरोकारों की कहानी है।
आपकी यादें बनेंगी ‘अनिकेत’ की विरासत
इसीलिए ‘अनिकेत’ के 50वें वर्ष का यह अवसर केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि अपनी इस साझा विरासत को संजोने का भी अवसर है। आगामी अक्टूबर माह में ‘अनिकेत के स्वर्णिम सफर’ को यादगार बनाने के लिए एक विशेष आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर ‘अनिकेत’ से जुड़े रहे पत्रकारों, लेखकों, पाठकों, सहयोगियों और शुभचिंतकों की स्मृतियों को विशेष रूप से संजोया जाएगा।
यदि आप किसी भी रूप में ‘अनिकेत’ की इस यात्रा के सहभागी रहे हैं—लेखक के रूप में, पत्रकार के रूप में, सहयोगी के रूप में, पाठक के रूप में या किसी अन्य भूमिका में—तो आपके पास ‘अनिकेत’ से जुड़ी कोई न कोई ऐसी स्मृति जरूर होगी, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचना चाहिए।
वह आपका पहला लेख या कविता हो सकती है, जो ‘अनिकेत’ में प्रकाशित हुई। वह कोई ऐसी खबर हो सकती है, जिसने किसी समस्या की ओर समाज और व्यवस्था का ध्यान खींचा। वह कोई आंदोलन, व्यक्ति या घटना हो सकती है, जिसने ‘अनिकेत’ की यात्रा को प्रभावित किया। अथवा कोई ऐसी आत्मीय घटना, मुलाकात या प्रसंग हो सकता है, जिसे वर्षों बाद याद करने पर आज भी चेहरे पर मुस्कान आ जाती हो।
हम चाहते हैं कि आप ऐसी स्मृतियों को अपने तक सीमित न रखें। उन्हें शब्द दें, हमारे साथ साझा करें और ‘अनिकेत’ के इतिहास का हिस्सा बनाएं। 50वें वर्ष के अवसर पर प्रकाशित होने वाली विशेष स्मारिका में इन संस्मरणों और अनुभवों को संजोया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी जान सकें कि सीमित साधनों, अनेक चुनौतियों और बदलते समय के बीच जनसरोकारों की पत्रकारिता की यह मशाल किस तरह पांच दशकों तक जलती रही।
आइए, मिलकर पूरा करें 50 वर्षों का यह वृत्तांत
स्वर्ण जयंती अतीत को याद करने का अवसर जरूर है, लेकिन यह केवल पीछे मुड़कर देखने का क्षण नहीं है। यह भविष्य की ओर देखने और यह संकल्प दोहराने का अवसर भी है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज के प्रति जवाबदेही, सच के प्रति निष्ठा और कमजोर की आवाज को ताकत देना है।
‘अनिकेत’ के 50वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर हम उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञ हैं, जिन्होंने कभी एक पंक्ति लिखकर, कोई खबर भेजकर, कोई विचार साझा कर, एक अंक खरीदकर, उसे किसी दूसरे पाठक तक पहुंचाकर या मुश्किल समय में उसके साथ खड़े होकर इस यात्रा को आगे बढ़ाया। हर छोटा-बड़ा योगदान इस स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा है।
आइए, ‘अनिकेत’ के पचास वर्षों की कहानी को मिलकर पूरा करें। अपनी यादों को कागज पर उतारिए, टाइप करके भेजिए या वीडियो में अपनी स्मृतियां रिकॉर्ड कीजिए। क्योंकि आज की ये यादें ही कल का इतिहास बनेंगी।
यह स्वर्णिम पड़ाव ‘अनिकेत’ का ही नहीं, उन सभी का है जिनकी आवाज, संवेदना, संघर्ष और सपने कभी उसके पन्नों का हिस्सा बने। आइए, अपनी स्मृतियां जोड़कर इस विरासत को और समृद्ध करें और जनपक्षधर पत्रकारिता की इस यात्रा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।
यदि इसे स्वर्ण जयंती स्मारिका के मुख्य आलेख के रूप में प्रकाशित करना है, तो मैं इसमें रमेश पहाड़ी जी के योगदान और ‘अनिकेत’ के ऐतिहासिक दौर को थोड़ा और उभारकर इसे करीब 1000–1200 शब्दों का अधिक साहित्यिक और दस्तावेजी आलेख भी बना सकता हूँ।

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