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दिल के इलाज की बहुप्रतीक्षित दवा पेलाकार्सन परीक्षण में फेल ; वैज्ञानिक जगत को बड़ा झटका

The setback will not just affect Novartis, who announced the results on Friday. Amgen and Eli Lilly have large expensive clinical trials underway testing similar drugs.Credit…Arnd Wiegmann/Reuters

डॉक्टरों को उम्मीद थी कि नोवार्टिस द्वारा बड़े क्लिनिकल ट्रायल में परीक्षण की जा रही यह दवा हृदय रोग से लड़ने का एक शक्तिशाली नया हथियार साबित होगी। एलपी(ए) में 80 प्रतिशत तक कमी के बावजूद नहीं रुके हृदयघात और स्ट्रोक; सात साल के अध्ययन में 8,323 लोग हुए शामिल

-जिना कोलाटा-

हृदयघात, स्ट्रोक और हृदय संबंधी मौतों को रोकने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद मानी जा रही प्रयोगात्मक दवा पेलाकार्सन अपने महत्वपूर्ण क्लिनिकल परीक्षण में अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही है। दवा निर्माता नोवार्टिस ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की। इस नतीजे ने हृदय रोग विशेषज्ञों को चौंकाने के साथ ही उस वैज्ञानिक धारणा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके आधार पर दुनिया की कई बड़ी दवा कंपनियां नई पीढ़ी की हृदय रोग रोधी दवाएं विकसित कर रही हैं।

नोवार्टिस ने फिलहाल परीक्षण के विस्तृत नतीजे सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया है कि पेलाकार्सन अपने प्रमुख लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकी। वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह परिणाम इसलिए ज्यादा अप्रत्याशित है क्योंकि दवा ने पहले के अध्ययन में हृदय रोग के एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक लिपोप्रोटीन (ए), यानी एलपी(ए) को करीब 80 प्रतिशत तक घटाने की क्षमता दिखाई थी।

अमेरिकन सोसाइटी फॉर प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. डेविड मेरोन की प्रतिक्रिया इस निराशा को स्पष्ट करती है। उन्होंने परिणाम सामने आने पर कहा, “ओह नहीं—ओह नहीं। यह बहुत बड़ा झटका है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं।”

येल विश्वविद्यालय के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. हारलन क्रम्होलज ने भी नतीजे पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए इसे बेहद निराशाजनक खबर बताया। उनके अनुसार चिकित्सा जगत इस परीक्षण के सकारात्मक परिणाम का लगभग इंतजार ही नहीं, बल्कि जश्न मनाने की तैयारी कर रहा था।

आखिर क्यों इतनी बड़ी उम्मीद थी पेलाकार्सन से

पेलाकार्सन को लेकर उत्साह की वजह इसका लक्ष्य था। यह दवा लिपोप्रोटीन (ए) नामक कण के उत्पादन को कम करने के लिए विकसित की गई है। एलपी(ए) को लंबे समय से हृदय और रक्तवाहिका रोगों के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में गिना जाता रहा है। विभिन्न प्रकार के अवलोकन अध्ययनों और आनुवंशिक शोधों से एलपी(ए) के ऊंचे स्तर और हृदयघात तथा स्ट्रोक के बढ़े जोखिम के बीच मजबूत संबंध सामने आया है।

यही कारण था कि कार्डियोलॉजिस्टों को उम्मीद थी कि एलपी(ए) को बहुत नीचे ले जाने वाली दवाएं हृदय रोग की रोकथाम में स्टैटिन के बाद अगली बड़ी उपलब्धि बन सकती हैं।

विशेष रूप से ऐसे मरीजों के लिए इससे बड़ी उम्मीदें जुड़ी थीं, जो हृदय रोग से बचने के लगभग सभी स्थापित उपाय अपनाते हैं—खराब कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखते हैं, रक्तचाप सामान्य रखते हैं, धूम्रपान नहीं करते, नियमित व्यायाम करते हैं और मोटापे से बचते हैं—फिर भी आनुवंशिक कारणों से उनमें हृदयघात का जोखिम ऊंचा बना रहता है।

एलपी(ए) की सबसे बड़ी विशेषता और समस्या यही है कि सामान्य कोलेस्ट्रॉल के विपरीत इसे खानपान, वजन घटाने या व्यायाम के जरिए बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया जा सकता। इसका स्तर मुख्यतः आनुवंशिक रूप से निर्धारित होता है और किसी व्यक्ति में जीवन भर अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है।

दुनिया की बड़ी आबादी एलपी(ए) के जोखिम में

एलपी(ए) कोई दुर्लभ समस्या नहीं है। अनुमान है कि दुनिया में लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति में इसका स्तर बढ़ा हुआ हो सकता है। इस आधार पर वैश्विक स्तर पर लगभग 1.4 अरब से दो अरब लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं।

एलपी(ए) का अत्यधिक ऊंचा स्तर हृदय संबंधी जोखिम को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। इसके सबसे ऊंचे स्तर वाले लोगों में हृदयघात अथवा स्ट्रोक का खतरा सामान्य स्तर वाले लोगों की तुलना में काफी अधिक पाया गया है। सामान्य से कुछ अधिक स्तर भी हृदय संबंधी जोखिम में उल्लेखनीय वृद्धि से जुड़ा पाया गया है।

इस जोखिम की आनुवंशिक प्रकृति के कारण वैज्ञानिक वर्षों से ऐसी दवा की तलाश कर रहे हैं, जो सीधे एलपी(ए) के निर्माण को निशाना बना सके। पेलाकार्सन इसी दिशा में सबसे आगे बढ़ चुकी दवाओं में शामिल थी।

सात साल चला परीक्षण, 8,323 मरीज हुए शामिल

नोवार्टिस का यह बड़ा क्लिनिकल अध्ययन करीब सात वर्षों तक चला और इसमें 8,323 लोगों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों में एलपी(ए) का स्तर ऊंचा था और वे पहले से हृदय रोग से पीड़ित थे। इस कारण उन्हें भविष्य में दोबारा गंभीर हृदय संबंधी घटना होने का जोखिम अधिक था।

अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों को यादृच्छिक रूप से अलग-अलग समूहों में रखा गया। उन्हें हर महीने पहले से भरी हुई सिरिंज के जरिए पेलाकार्सन अथवा प्लेसीबो का इंजेक्शन दिया जाता था। इंजेक्शन देने की प्रक्रिया मोटापे के उपचार में इस्तेमाल होने वाली कई आधुनिक दवाओं जैसी थी।

इस अध्ययन का असली उद्देश्य केवल यह देखना नहीं था कि पेलाकार्सन रक्त में एलपी(ए) कितना घटाती है। निर्णायक प्रश्न यह था कि क्या एलपी(ए) में भारी कमी वास्तव में मरीजों में हृदयघात, स्ट्रोक और हृदय संबंधी अन्य गंभीर घटनाओं को कम करती है।

यहीं दवा अपेक्षा पर खरी नहीं उतर सकी।

पहले के अध्ययन में पेलाकार्सन ने एलपी(ए) के स्तर में करीब 80 प्रतिशत तक कमी दिखाई थी। इतने बड़े जैविक प्रभाव को देखते हुए विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि इसका असर वास्तविक हृदय संबंधी घटनाओं में भी दिखाई देगा। लेकिन बड़े परीक्षण में वह अपेक्षित चिकित्सकीय लाभ सामने नहीं आया।

एम्जेन और एली लिली के परीक्षणों पर भी नजर

पेलाकार्सन की विफलता केवल नोवार्टिस के लिए व्यावसायिक अथवा वैज्ञानिक झटका नहीं है। इसका असर एलपी(ए) को निशाना बनाने वाली दवाओं के पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

दवा क्षेत्र की दो अन्य बड़ी कंपनियां एम्जेन और एली लिली भी एलपी(ए) घटाने वाली अलग-अलग दवाओं पर काम कर रही हैं और उनके बड़े तथा महंगे क्लिनिकल परीक्षण चल रहे हैं। अब वैज्ञानिक समुदाय की नजर इन अध्ययनों पर और अधिक गहराई से रहेगी।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पेलाकार्सन की विफलता केवल इस विशेष दवा की विफलता है या इससे एलपी(ए) को कम करके हृदय रोग रोकने की पूरी वैज्ञानिक परिकल्पना पर सवाल उठता है।

दोनों स्थितियों में बहुत बड़ा अंतर है।

संभव है कि पेलाकार्सन जिस जैविक तरीके से काम करती है, उसमें कोई ऐसी सीमा हो जो दूसरी दवाओं में न हो। यह भी संभव है कि एलपी(ए) को और अधिक कम करना पड़े, इलाज ज्यादा पहले शुरू करना पड़े अथवा मरीजों के किसी विशेष वर्ग को ही इसका वास्तविक लाभ मिले। इसलिए एक परीक्षण की विफलता से पूरे वैज्ञानिक क्षेत्र को समाप्त मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।

पूरा सच नवंबर में सामने आएगा

नोवार्टिस ने फिलहाल परीक्षण की विफलता की घोषणा भर की है। विस्तृत आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कंपनी के अनुसार पूरा डेटा नवंबर में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की वार्षिक वैज्ञानिक बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा। इसके साथ ही शोध के किसी प्रमुख चिकित्सा जर्नल में प्रकाशित होने की भी संभावना है।

विस्तृत आंकड़े सामने आने के बाद ही यह पता चल सकेगा कि दवा बिल्कुल कोई लाभ नहीं दे सकी अथवा लाभ इतना कम था कि वह सांख्यिकीय रूप से निर्णायक साबित नहीं हुआ। यह भी देखा जाएगा कि मरीजों के किसी विशेष उपसमूह को लाभ मिला या नहीं और एलपी(ए) में वास्तविक कमी तथा हृदय संबंधी घटनाओं के बीच क्या संबंध सामने आया।

नोवार्टिस को प्रारंभिक परिणाम की सूचना इसलिए भी सार्वजनिक करनी पड़ी क्योंकि किसी बड़े क्लिनिकल परीक्षण का ऐसा परिणाम कंपनी के व्यावसायिक मूल्य और शेयर कीमत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण सूचनाओं के खुलासे से संबंधित नियमों के तहत कंपनी ने इसकी घोषणा की।

क्या एलपी(ए) कारण नहीं, केवल जोखिम का संकेत है?

पेलाकार्सन की विफलता से सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सवाल यही उभरा है।

डॉ. क्रम्होलज के अनुसार यह परिणाम चिकित्सा विज्ञान को एक पुराना लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सबक याद दिलाता है—दो चीजों के बीच मजबूत संबंध होना यह साबित नहीं करता कि उनमें से एक दूसरी का कारण भी है।

किसी व्यक्ति में एलपी(ए) का स्तर अधिक हो और उसी व्यक्ति में हृदय रोग का खतरा भी ज्यादा हो, तो पहली नजर में यह निष्कर्ष स्वाभाविक लगता है कि एलपी(ए) कम करने से जोखिम भी कम हो जाएगा। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में यह निष्कर्ष तभी निर्णायक माना जा सकता है जब यादृच्छिक नियंत्रित क्लिनिकल परीक्षण यह दिखाए कि उस कारक को बदलने से बीमारी का परिणाम भी बदलता है।

क्रम्होलज ने इसे समझाने के लिए झुर्रियों का उदाहरण दिया है। झुर्रियां बढ़ती उम्र से जुड़ी हैं, लेकिन झुर्रियों को मिटा देने से उम्र कम नहीं हो जाती। यानी कोई चीज बीमारी या अवस्था का मजबूत संकेतक हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वही उसका प्रत्यक्ष कारण भी हो।

हालांकि एलपी(ए) के मामले में आनुवंशिक अध्ययनों के कारण कारणात्मक संबंध के पक्ष में साक्ष्य सामान्य संकेतकों की तुलना में कहीं मजबूत माने जाते रहे हैं। इसीलिए पेलाकार्सन के नतीजे को समझने के लिए पूरे परीक्षण के आंकड़ों का इंतजार और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

कार्डियोलॉजी पहले भी देख चुकी है ऐसे झटके

हृदय रोग चिकित्सा के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब बेहद मजबूत वैज्ञानिक धारणा बड़े क्लिनिकल परीक्षण में जाकर विफल हुई हो।

कुछ समय पहले सूजन कम करने वाली एक बहुप्रतीक्षित दवा से भी उम्मीद की जा रही थी कि वह हृदय रोग से सुरक्षा देगी, लेकिन बड़े अध्ययन में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

इससे भी प्रसिद्ध उदाहरण एचडीएल यानी तथाकथित ‘अच्छे कोलेस्ट्रॉल’ का है। वर्षों तक यह धारणा मजबूत रही कि एचडीएल का स्तर जितना ऊंचा होगा, हृदय रोग का खतरा उतना कम होगा। इस कारण वैज्ञानिकों ने ऐसी दवाएं विकसित करने का प्रयास किया जो एचडीएल को बढ़ा सकें।

इसी दिशा में फाइजर ने टॉरसेट्रैपिब नामक एक अत्यंत आशाजनक दवा विकसित की थी। उससे इतनी बड़ी उम्मीदें थीं कि कंपनी इसे हृदय रोग उपचार के भविष्य के रूप में देख रही थी। लेकिन बड़े क्लिनिकल परीक्षण में परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत निकले। दवा न केवल अपेक्षित सुरक्षा देने में विफल रही, बल्कि मरीजों में जोखिम बढ़ने के संकेत भी मिले और अध्ययन रोकना पड़ा।

डॉ. क्रम्होलज के अनुसार उस समय फाइजर के शीर्ष नेतृत्व को दवा की सफलता पर इतना भरोसा था कि विफलता सामने आने से कुछ ही दिन पहले कंपनी अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन के सामने इसे बाजार में उतारने के लिए आवेदन की तैयारी कर रही थी।

बाद के अनुसंधानों ने यह समझ मजबूत की कि केवल एचडीएल की मात्रा बढ़ाना अपने आप हृदय रोग का जोखिम कम करने की गारंटी नहीं है। इस अनुभव ने कार्डियोलॉजी को जोखिम-संकेतक और वास्तविक उपचार-लक्ष्य के बीच अंतर का महत्वपूर्ण सबक दिया।

पेलाकार्सन की विफलता के बावजूद कहानी खत्म नहीं

फिर भी एलपी(ए) के खिलाफ चल रही वैज्ञानिक कोशिशों का अंत घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। पेलाकार्सन की विफलता एक महत्वपूर्ण चेतावनी जरूर है, लेकिन एम्जेन और एली लिली सहित दूसरी कंपनियों की दवाएं अलग तकनीकों और अलग उपचार रणनीतियों पर आधारित हैं।

आने वाले परीक्षण यह स्पष्ट कर सकते हैं कि समस्या एलपी(ए) को लक्ष्य बनाने की अवधारणा में है या पेलाकार्सन की विशेष कार्यप्रणाली, उपचार अवधि, मरीजों के चयन अथवा इलाज शुरू करने के समय में।

एक संभावना यह भी है कि जिन लोगों को पहले ही हृदय रोग हो चुका है, उनमें अपेक्षाकृत देर से एलपी(ए) घटाना पर्याप्त न हो। यदि एलपी(ए) दशकों तक धमनियों को नुकसान पहुंचाता रहा हो तो बीमारी स्थापित होने के बाद इसे कम करने का प्रभाव सीमित हो सकता है। ऐसी स्थिति में भविष्य के अध्ययन अपेक्षाकृत कम उम्र अथवा बीमारी शुरू होने से पहले उपचार की उपयोगिता की पड़ताल कर सकते हैं।

इसीलिए वैज्ञानिक समुदाय अब नोवार्टिस के विस्तृत आंकड़ों की प्रतीक्षा कर रहा है।

पेलाकार्सन ने एक महत्वपूर्ण परीक्षा जरूर गंवा दी है, लेकिन एलपी(ए) पर वैज्ञानिक फैसला अभी अंतिम नहीं हुआ है। एम्जेन और एली लिली के परीक्षण सकारात्मक निकलते हैं तो यह साबित हो सकता है कि लक्ष्य सही था, लेकिन उसे हासिल करने का तरीका बदलने की जरूरत थी। यदि वे भी विफल होते हैं तो कार्डियोलॉजी को एलपी(ए) और हृदय रोग के बीच दशकों से स्वीकार किए जा रहे संबंध को नए सिरे से समझना पड़ सकता है।

इसीलिए डॉ. क्रम्होलज की टिप्पणी इस समय पूरे क्षेत्र की दुविधा को व्यक्त करती है—“यह आपको सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह क्षेत्र आगे जारी रखने लायक है।”

फिलहाल इस एक असफल परीक्षण ने चिकित्सा विज्ञान का एक बुनियादी सिद्धांत फिर रेखांकित कर दिया है—किसी जैविक जोखिम कारक को प्रभावशाली ढंग से कम कर देना और मरीज का जीवन वास्तव में बचा पाना दो अलग उपलब्धियां हैं। इनके बीच की दूरी केवल बड़े, नियंत्रित और दीर्घकालीन क्लिनिकल परीक्षण ही तय कर सकते हैं।

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जीना कोलाटा बीमारियों और उनके इलाज के बारे में रिपोर्ट करती हैं—जैसे कि इलाज कैसे खोजे और टेस्ट किए जाते हैं, और लोगों पर उनका क्या असर होता है।

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