अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भगवती प्रसाद मैंदोली ने साझा किया उत्तराखंड का शिक्षा परिवर्तन मॉडल
ऑक्सफोर्ड, 4 सितम्बर। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ‘सोशल आउटकम्स कॉन्फ्रेंस’ में उत्तराखंड की ‘आनंदम पाठचर्या’ चर्चा का केंद्र बनी। सम्मेलन में उत्तराखंड के शिक्षा परिवर्तन मॉडल, बच्चों के सामाजिक-भावनात्मक विकास और विद्यालयों में सचेतनता के प्रयोग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने रखा गया। सत्र की शुरुआत संस्कृत मंगलाचरण और ध्यान से हुई, जबकि समापन ‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ के सामूहिक उच्चारण के साथ किया गया।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में 3 और 4 सितम्बर को आयोजित सोशल आउटकम्स कॉन्फ्रेंस के विशेष सत्र ‘सरकार के भीतर से शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन कैसा दिखाई देता है?’ में उत्तराखंड शिक्षा विभाग के समग्र शिक्षा में स्टाफ ऑफिसर डॉ. भगवती प्रसाद मैंदोली ने राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयोगों और आनंदम पाठचर्या के अनुभव साझा किए।

सत्र की शुरुआत में डॉ. मैंदोली ने संस्कृत मंगलाचरण किया और उपस्थित प्रतिनिधियों को करीब दो मिनट का सचेतनता एवं ध्यान अभ्यास कराया। प्रतिभागियों ने शांत होकर अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित किया। इसके माध्यम से शिक्षा में मानसिक शांति, बच्चों के कल्याण और समग्र विकास के महत्व को रेखांकित किया गया।
डॉ. मैंदोली ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में बदलाव केवल नीतियां बनाने अथवा योजनाओं को बड़े स्तर पर लागू करने तक सीमित नहीं रह सकता। वास्तविक परिवर्तन तब दिखाई देता है, जब नीतियां विद्यालय और कक्षा तक पहुंचकर बच्चों के जीवन में सार्थक बदलाव का माध्यम बनती हैं। इस प्रक्रिया में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा में साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान के साथ आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, मानवीय मूल्य तथा बच्चों के कल्याण को भी पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। सामाजिक और भावनात्मक अधिगम को उन्होंने बच्चों के समग्र विकास तथा शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बताया।
सम्मेलन में उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष 2019 में शुरू की गई ‘खुशहाली पाठ्यचर्या-आनंदम’ की अवधारणा और उसके क्रियान्वयन की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। बताया गया कि इसका उद्देश्य विद्यालयों में ऐसा वातावरण तैयार करना है, जिसमें बच्चे पाठ्य विषयों के ज्ञान के साथ स्वयं और दूसरों को समझना, अपनी भावनाओं को पहचानना तथा सहानुभूति विकसित करना भी सीख सकें।
आनंदम के तहत विद्यालयों में दिन के शुरुआती 30 से 35 मिनट बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए निर्धारित किए जाते हैं। इसकी शुरुआत सचेतनता के अभ्यास से होती है। इसके बाद कहानी और संवादात्मक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को विभिन्न सामाजिक और भावनात्मक परिस्थितियों पर सोचने तथा उन्हें समझने का अवसर दिया जाता है। अंत में अभिव्यक्ति की गतिविधि के जरिए बच्चे अपने विचारों और भावनाओं को सामने रखते हैं।
डॉ. मैंदोली ने अपने शोध और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी), उत्तराखंड के अध्ययनों के अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया कि आनंदम के प्रयोग से बच्चों की एकाग्रता, सहानुभूति और आपसी संबंध बनाने की क्षमता में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। इसके साथ ही शिक्षकों के कक्षा प्रबंधन पर भी सकारात्मक प्रभाव सामने आया है।
उनके अनुसार आनंदम पाठचर्या वर्तमान में उत्तराखंड के करीब 16 हजार विद्यालयों, 30 हजार शिक्षकों और लगभग दो लाख विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी है। राज्य के पीएम श्री विद्यालयों में भी सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक अधिगम को मजबूत करने के साथ शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
प्रस्तुति के बाद सम्मेलन में मौजूद विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने उत्तराखंड की आनंदम पाठचर्या में विशेष रुचि दिखाई। खास तौर पर सचेतनता को सामाजिक और भावनात्मक अधिगम से जोड़ने के प्रयोग की सराहना की गई। इस दौरान यह बात सामने रखी गई कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा पद्धतियों के समन्वय से बच्चों के भावनात्मक कल्याण और सकारात्मक शैक्षिक वातावरण को मजबूत किया जा सकता है।
शिक्षकों और सरकार के प्रयासों को दिया श्रेय
डॉ. मैंदोली ने आनंदम की उपलब्धियों का श्रेय राज्य सरकार के नीतिगत सहयोग और शिक्षकों को दिया। उन्होंने कहा कि किसी नीति की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह कागज से निकलकर कक्षा और अंतिम बच्चे तक किस हद तक पहुंचती है। उत्तराखंड के शिक्षकों ने आनंदम को महज सरकारी कार्यक्रम न मानकर बच्चों के बेहतर भविष्य और खुशहाल जीवन से जोड़कर अपनाया है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड के अनुभव साझा करने का अवसर उपलब्ध कराने के लिए ‘ड्रीम अ ड्रीम’ और सहयोगी संगठनों का आभार व्यक्त किया। साथ ही ऑक्सफोर्ड में राज्य के शिक्षा परिवर्तन मॉडल को प्रस्तुत करने के अवसर को शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अनुभवों और नवाचारों के आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।
‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के साथ सत्र का समापन
सत्र का समापन भारतीय परंपरा के सार्वभौमिक कल्याण संदेश ‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के सामूहिक उच्चारण से हुआ। इसके बाद ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
ऑक्सफोर्ड के अंतरराष्ट्रीय मंच पर संस्कृत मंत्र, ध्यान और उत्तराखंड की आनंदम पाठचर्या की प्रस्तुति के माध्यम से यह संदेश भी सामने आया कि शिक्षा को केवल परीक्षा परिणाम और शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न रखकर बच्चों के सामाजिक-भावनात्मक विकास, मानसिक शांति और कल्याण से भी जोड़ा जाना चाहिए।
डॉ. मैंदोली ने शिक्षा के व्यापक उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा का अंतिम प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘मैं क्या प्राप्त कर सकता हूं?’, बल्कि यह भी होना चाहिए कि ‘मैं किस प्रकार योगदान दे सकता हूं?’। उनके अनुसार यही दृष्टिकोण शिक्षा को जीवन और बेहतर समाज के निर्माण से जोड़ता है।
