होर्मुज के जहाजों से दुनिया भर के बंदरगाहों में विदेशी प्रजातियों के प्रसार का खतरा
Uttarakhand Himalaya bureau-
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों पर तो व्यापक चर्चा हो रही है, लेकिन जहाजों की लंबी नाकाबंदी से उत्पन्न होने वाले गंभीर पारिस्थितिकीय नुकसान के जोखिम को अब तक नजरअंदाज किया गया है। प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘द कन्वर्सेशन’ (The Conversation) में प्रकाशित और समुद्री पारिस्थितिकीविदों—चाड हेविट, ग्रेगरी रुइज़, इयान डेविडसन तथा मारियो ताम्बुर्री—द्वारा लिखित इस मूल शोध आलेख के अनुसार, फरवरी से फारस और अरब की खाड़ी में फंसे एक हजार पांच सौ से अधिक वाणिज्यिक जहाज पर्यावरण के लिए एक बड़ा संकट बन चुके हैं। लंबी अवधि तक खड़े रहने के कारण इन जहाजों के पेंदे पर समुद्री जीव-जंतु और वनस्पतियां तेजी से जम रही हैं, जिस प्रक्रिया को बायो-फाउलिंग कहा जाता है। जैसे ही होर्मुज जलडमरूमध्य यातायात के लिए खुलेगा, ये जहाज दुनिया भर के विभिन्न बंदरगाहों की ओर प्रस्थान करेंगे और अनजाने में इन जीवों को नई जगहों पर फैलाकर एक अंतरराष्ट्रीय ‘सुपर-स्प्रेडर’ घटना को जन्म दे सकते हैं।
जहाजों के खड़े रहने की मजबूरी
शोधकर्ताओं के अनुसार, दुनिया भर में समुद्री माल ढुलाई के चौबीस प्रमुख संकरे मार्ग हैं, जिनमें से बीस मार्गों के वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं, जिससे मार्ग बदलकर संकट को टाला जा सकता है। लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य सहित केवल चार ऐसे चोक पॉइंट्स हैं जिनका कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अन्य तीन में बाल्टिक सागर में ओरेसंड जलडमरूमध्य, काला सागर के निकास पर बोस्फोरस और डारडेनेल्स जलडमरूमध्य तथा बोहाई सागर में बोहाई जलडमरूमध्य शामिल हैं। होर्मुज के पास कोई वैकल्पिक जलमार्ग न होने के कारण जहाजों को खाड़ी में महीनों तक स्थिर खड़े रहने को विवश होना पड़ा है। उष्णकटिबंधीय गर्म पानी में खड़े रहने से इन जहाजों के पेंदे पर बहुत तेजी से समुद्री जीवों की परत जम जाती है, और फारस की खाड़ी में पहले से ही पचास से अधिक गैर-स्थानीय समुद्री प्रजातियां मौजूद हैं।
भारत और क्षेत्रीय बंदरगाहों पर सीधा खतरा
इस मार्ग के खुलने के बाद की स्थितियों का विश्लेषण दर्शाता है कि रास्ता खुलते ही इनमें से बड़ी संख्या में जहाज सीधे क्षेत्रीय बंदरगाहों का रुख करेंगे। इन जहाजों के लिए मुंबई और कोलंबो सबसे प्रमुख संभावित पड़ाव माने जा रहे हैं। यदि ये आक्रामक विदेशी प्रजातियां, परजीवी या बीमारियां यहां के स्थानीय जलीय तंत्र में प्रवेश कर जाती हैं, तो इससे तटीय पारिस्थितिकी, स्थानीय मत्स्य पालन और संबंधित उद्योगों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसे रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने बंदरगाह देशों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों को तुरंत कुछ सुरक्षा कदम उठाने की सिफारिश की है। इनमें खाड़ी छोड़ने से पहले प्रत्येक जहाज के हल (पेंदे) की सघन जांच करना, पानी के भीतर ही विशेष तकनीकों से पेंदे पर जमे जीवों को सुरक्षित रूप से हटाना, और जहाजों के पहले गंतव्य बंदरगाह की अग्रिम पहचान करना शामिल है ताकि वह देश अपनी जैविक सुरक्षा तैयारियां पूरी रख सके।
अतिरिक्त व्याख्या और तकनीकी परिप्रेक्ष्य
यह विषय समुद्री जीवविज्ञान और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के अंतर्संबंध का एक गंभीर उदाहरण प्रस्तुत करता है। आमतौर पर जहाजों से विदेशी प्रजातियों के प्रसार के लिए बैलास्ट वाटर (जहाज का संतुलन बनाए रखने के लिए भरा जाने वाला पानी) को जिम्मेदार माना जाता है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय नियम पहले से लागू हैं। इसके विपरीत, बायो-फाउलिंग जहाज की बाहरी सतह, प्रोपेलर और पाइपों पर चिपकी समुद्री वनस्पतियों और जीवों का जमाव है। गतिमान रहने पर यह जमाव धीमा होता है, लेकिन स्थिर खड़े रहने पर यह जहाज के पेंदे पर एक कृत्रिम पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर देता है। जब एक साथ सैकड़ों जहाज एक संदूषित क्षेत्र से निकलकर दुनिया भर में पहुंचते हैं, तो यह वैश्विक स्तर पर विदेशी प्रजातियों के एक साथ विस्फोट का कारण बनता है।
भारतीय समुद्री तटों और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां
भारतीय संदर्भ में इस खतरे के कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं। जब कोई आक्रामक विदेशी प्रजाति नए जलक्षेत्र में पहुंचती है, तो प्राकृतिक शिकारी न होने के कारण वह स्थानीय जलीय जीवों और उनके भोजन को नष्ट कर देती है। इससे भारत के पश्चिमी तट, विशेषकर महाराष्ट्र और गुजरात का मछली उत्पादन सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, विदेशी सीप और घोंघे बंदरगाहों की गोदियों और जहाजों के पाइपों को अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे औद्योगिक रखरखाव की लागत काफी बढ़ जाती है। कुल मिलाकर यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि रणनीतिक समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव केवल आर्थिक प्रभाव नहीं डालते, बल्कि वे एक गहरे पारिस्थितिकीय संकट को भी जन्म देते हैं।
भारत के मौजूदा समुद्री जैविक सुरक्षा प्रोटोकॉल
चूंकि आपने भारतीय प्रोटोकॉल के बारे में जानने की सहमति जताई थी, इसलिए यह जानना प्रासंगिक है कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) का एक सक्रिय सदस्य है। विदेशी प्रजातियों के प्रसार को रोकने के लिए भारत ने मुख्य रूप से ‘बैलास्ट वाटर मैनेजमेंट कन्वेंशन’ (BWM Convention) को अपनाया है, जिसके तहत बंदरगाहों पर आने वाले जहाजों को अपना पानी सुरक्षित तरीके से प्रबंधित करना होता है। हालांकि, जहां तक ‘बायो-फाउलिंग’ (जहाज के बाहरी पेंदे पर जीवों के जमने) का सवाल है, भारत वर्तमान में IMO के दिशा-निर्देशों का ही पालन करता है। प्रमुख भारतीय बंदरगाहों पर जहाजों की पानी के भीतर सफाई (In-water cleaning) के लिए कुछ नियम लागू हैं, लेकिन बायो-फाउलिंग से निपटने के लिए एक सख्त राष्ट्रीय कानून और उन्नत ढांचा अभी पूरी तरह से विकसित होना बाकी है। ऐसे में, यदि होर्मुज से अचानक बड़ी संख्या में जहाज मुंबई या अन्य बंदरगाहों पर आते हैं, तो यह भारत के मौजूदा निरीक्षण तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। (स्रोत: द कन्वर्सेशन)
