भिलंगना घाटी के एक दर्जन से अधिक बुग्यालों का हुआ अध्ययन

–विनय सेमवाल की रिपोर्ट–
घुत्तू (रुद्रप्रयाग), 9 सितंबर. बुग्यालों को बचाने के संकल्प के साथ बुग्याल बचाओ अभियान मंगलवार को सम्पन्न हो गया। चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र गोपेश्वर की ओर से पांच दिवसीय बुग्याल बचाओ जनजागरण और अध्ययन अभियान के दौरान रुद्रप्रयाग के त्रिजुगीनारायण से लेकर टिहरी जिले की भिलंगना घाटी के एक दर्जन से अधिक बुग्यालों का अध्ययन किया गया। बुग्यालों में रह रहे भेड़ पालकों, पशुचारको और आसपास के ग्रामीणों के साथ बुग्यालों के संरक्षण और समस्याओं को लेकर विचार-विमर्श किया गया।

अभियान दल में सामाजिक कार्यकर्ता,वनविद, पत्रकार और केदारनाथ वन्यजीव वन प्रभाग चमोली तथा टिहरी वन प्रभाग के अधिकारी कर्मचारी भी साथ रहे।
वरिष्ठ पत्रकार व्योमेश जुगरान के नेतृत्व मे चले इस अभियान की शुरुआत रुद्रप्रयाग जिले के फाटा गांव से हुई। फिर चिपको की कर्मभूमि रामपुर न्यालसू से होते हुए त्रिजुगीनारायण में ग्रामीणों के साथ बुग्यालों के संरक्षण और उपयोग को लेकर चर्चा से हुई।रा.ई.का.फाटा के छात्रों तथा न्यालसू और त्रिजुगी नारायण में ग्रामीणों के साथ *”हिमालय के बुग्यालों पर मंडरता खतरा* “विषय पर एक चिंतन गोष्ठी आयोजित की गई।

गोष्ठी में हिमालयी बुग्यालों को प्लास्टिक कचरे से मुक्त कराने का संकल्प लिया गया। इस दौरान अभियान दल के सदस्यों द्वारा पर्यावरण गोष्ठी के माध्यम से बुग्यालो की स्थिति और उनके संरक्षण को लेकर ग्रामीणों, पशुपालको,बुग्यालॉ मे निवास कर रहे पशुपालकों के साथ संवाद कर विस्तार से चर्चा- परिचर्चा की गई।
गोष्ठी को बतौर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए जिला पंचायत सदस्य विजय लाल ने बुग्यालो मे बड़ते पशु चारण पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी लोगो से इस विषय पर चिंतन करने की अपील की। उन्होंने सभी लोगों से बुग्यालो को बचाने को लेकर आगे आने की अपील करते हुए कहा कि सभी के सामूहिक प्रयासों से ही प्रकृति की यह धरोहर सुरक्षित रह सकती है।
इस दौरान गोष्ठी में उपस्थिति सभी वक्ताओ ने हिमालय और हिमानदो तथा बुग्यालों की स्थिति पर खुलकर अपने विचार रखे। इस
दौरान बुग्यालों मे बड़ते पशुचारण पर चिंता व्यक्त करते हुए पशुओ की संख्या को निर्धारित करने की बात कही गयी खासकर वन गुजरो को लेकर कहा गया कि उनके द्वारा निर्धारित संख्या से कई अधिक पशु बुग्यलो में ले जाये जा रहे हैं। इसी के साथ आवारा मवेशी भी बुग्याल में छोड़े जा रहे हैं।
घुत्तु मे आयोजित समापन गोष्ठी में अभियान दल के व्योमेश जुगरान नें पुराणों में बतायी गई हिमालय की महिमा के उल्लेख से अपनी बात रखते हुए कहा कि जिसे स्वयं भगवान शंकर ने अपना आलय बताया है। यह भगवान शिव की भूमि है। वेदव्यास ने हिमालय में ही वेदों की रचना की है। यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण होगा समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिमालय ही हमारे सनातन धर्म संस्कृति का आधार और जीवन मूल स्रोत है।
यदि हमने अभी अपने बुग्यालों को बचाने का संकल्प नहीं लिया तो बहुत देर हो जायेगी और शायद बाद में लाख कोशिस करने के बाद भी हम इन्हें बर्बाद और नष्ट होने से नहीं बचा पायेंगे और भविष्य में हमारी आने वाली पीढी हमें इसके लिए माफ भी नही करेगी।इसी के साथ उन्होंने कहा कि हिमालय में विकास संबंधी योजनाओं को बनाने से पूर्व हिमालय की भौगोलिक स्थिति तथा योजना द्वारा यहाँ के पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है। तभी हम हिमालय और उसके बुग्यालों तथा हिमनदों को बचाकर रख सकते हैं।
गोष्ठी में ओम प्रकाश भट्ट ने पँवाली बुग्याल की स्थिति पर अपने विचार रखते हुए कहा कि, पँवाली बुग्याल की स्थिति चिंतनीय है।कई जगह भू धसाव होने लगा है जो चिंतनीय है। पशुओ की संख्या बुग्याल की धारण क्षमता से कई अधिक है। हमें यह समझना होगा कि
बुग्याल हिमालय की आत्मा है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने शायद बहुत पहले ही बुग्यालों पर आने वाले खतरों को भांप लिया था तभी उनके द्वारा बुग्यालों के संरक्षण के लिए कई नियम तथा कायदो का जैसे बुग्यालों में समय से पूर्व नहीं जाना, रहने के तौर- तरीकों और कई स्थानों पर बोलना,थूकना आदि क्रियाकलापों को निषेध कर कई ऐसे ही अन्य नियमों का सृजन कर बुग्यालों के संरक्षण के लिए लोकाचार की परंपरा स्थापित की थी। उनके द्वारा बनाये इन लोकाचारों के द्वारा ही आज हमें ये बुग्याल सुरक्षित मिले हैं। हाल के वर्षों में हमारे द्वारा सदियों से चली आ रही अपनी इन परंपराओं को भुला दिये जाने के कारण बुग्यालों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।
गोष्ठी में सी पी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र के विनय सेमवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि, चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र द्वारा न् वर्ष 2014 से बुग्यालों के संरक्षण के लिए *बुग्यालों बचाओ अभियान* चलाया जा रहा है। जिसके तहत न्यास के स्वयं सेवियों द्वारा बुग्यालों में हो रहे परिवर्तनों के अध्य्यन करने के साथ ही वहाँ पड़े कचरे को एकत्रित कर निस्तरण स्थल तक पहुंचाया जाता है। इसी क्रम में उनके द्वारा यह भी बताया गया कि,बुग्यालों के संरक्षण के विषय में माननीय उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर निर्णय देते हुए कहा कि बुग्यालों पर सर्वप्रथम अधिकार वहाँ की वनस्पति का है। तत्पश्चाद् दूसरा अधिकार वहाँ के वन्य जीवों का और इसके उपरांत ही क्रमशः तीसरा अधिकार भेड़ पालकों का और चौथा अधिकार स्थानीय ग्रामीणों का है। पर्यटकों का अधिकार इनके बाद है।
मोहन पंत ने कहा कि पर्यटकों को चाहिये कि वो हिमालय क्षेत्र में यात्रा के दौरान प्लास्टिक की वस्तुओं का उपयोग ना करें तथा अपने साथ कचरे के लिए एक खाली बैग भी रखे। किसी भी प्रकार का कचरा बुग्यालों के लिए घातक है।
गोष्ठी में अपने विचार रखते हुए अन्य वक्ताओ में सा. कार्यकर्ता सुशील भट्ट ने कहा कि हमें चाहिए कि पौधरोपण के दौरान हम हिमालय क्षेत्र में उस क्षेत्र विशेष की ही स्थानीय प्रजाति के पौधों का रोपण करें। उन्होंने कहा कि,बुग्यालों में टूरिस्ट गाइड का काम करने वाले गाइडों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
ने बुग्यालों में टूरिस्टो की बड़ती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बुग्यालों की वहन क्षमता को देखकर ही वहाँ पर सीमित संख्या में ही ट्रैकिंग की अनुमति दी जानी चाहिए।
इस दौरान गोष्ठी में विनय सेमवाल,सुशील भट्ट,टिहरी वन प्रभाग के वन दरोगा मंगल सिंह गुसाई,संदीप राणा, पूर्व विशेष लोक अभियोजक मोहन पंत, शिव सिंह राणा,क्षेत्र पंचायत सदस्य रतनमणी भट्ट,नित्यानंद कोठियाल,अक्षित रावत,राजेंद्र सिंह चौहान,परमवीर सिंह रावत, प्रेम सिंह राणा,अरविंद,सुरजीत सिंह चौहान,सहित कई लोग मौजूद थे।
