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न्यूयॉर्क टाइम्स की नजर में ब्रिक्स: चीन की चुनौती के बीच भारत की अलग राह

Ahead of the New Delhi BRICS summit, The New York Times highlights a quiet rivalry between India and China for Global South leadership. China seeks to expand BRICS as a counterweight to US-led order, while India prefers it as a bridge between the West and developing nations, avoiding bloc confrontation. Despite economic disparities and divergent interests among members, India leverages its presidency for inclusive growth and strategic autonomy—balancing ties with Russia, China, the US (via Quad), and the Global South.

  • बीजिंग इसे अमेरिकी ताकत के मुकाबले का मंच बनाना चाहता है, नई दिल्ली की कोशिशब्रिक्स बने पश्चिम और विकासशील दुनिया के बीच सेतु

  • रूस को पश्चिमी अलगाव से राहत, चीन को प्रभाव बढ़ाने का मंच; भारत के सामने अमेरिका, रूस और चीन के बीच संतुलन की परीक्षा

 

जयसिंह रावत

क्या विकासशील दुनिया की आवाज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बनेंगे या भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी? नई दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसी सवाल के जरिए भारत और चीन के बीच उस शांत लेकिन गहरी प्रतिस्पर्धा को रेखांकित किया है, जिसका दायरा अब सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंधों से कहीं आगे निकलकर ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील विश्व के नेतृत्व तक पहुंच गया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने ब्रिक्स और भारत पर प्रकाशित अपनी दो विस्तृत रिपोर्टों में इस उभरते शक्ति-संघर्ष का विश्लेषण किया है। पहली रिपोर्ट “Emerging Powers Seek an Alternative to the West, but War Divides Them” टिफनी मे, येगानेह तोरबती, डेविड पियर्सन और वैलेरी हॉपकिंस ने तैयार की है। दूसरी रिपोर्ट “In a Club of Emerging Powers, China and India Vie for Influence” डेविड पियर्सन और एलेक्स ट्रैवेली की है। पहली रिपोर्ट के लिए हांगकांग, इस्तांबुल, नई दिल्ली और मॉस्को से रिपोर्टिंग की गई, जबकि दूसरी रिपोर्ट नई दिल्ली से है। पहली रिपोर्ट में जॉन एलिगॉन, रानिया खालिद, इस्माइल नार और बेरी वांग तथा दूसरी में बेरी वांग ने अतिरिक्त रिपोर्टिंग की है। पहली रिपोर्ट के लेखकों और उनके रिपोर्टिंग केंद्रों का विवरण भी अखबार ने दिया है।

एक ब्रिक्स, लेकिन दो अलग परिकल्पनाएं

न्यूयॉर्क टाइम्स के विश्लेषण में भारत और चीन के बीच असली अंतर ब्रिक्स के अस्तित्व को लेकर नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और उद्देश्य को लेकर दिखाई देता है।

चीन ब्रिक्स का विस्तार कर उसे अमेरिकी प्रभाव वाली विश्व व्यवस्था के मुकाबले एक बड़ी राजनीतिक-आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा करना चाहता है। इसके विपरीत भारत ब्रिक्स को किसी एक खेमे का संगठन बनाने से बचाना चाहता है। नई दिल्ली की दृष्टि में यह पश्चिम और विकासशील दुनिया के बीच एक सेतु बन सकता है।

यही फर्क दोनों एशियाई महाशक्तियों की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को भी परिभाषित करता है। चीन चाहता है कि पश्चिम से असंतुष्ट अधिक से अधिक देश एक ऐसे मंच पर आएं जहां अमेरिकी प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो। भारत भी पश्चिमी वर्चस्व वाली संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की अधिक हिस्सेदारी चाहता है, लेकिन वह दुनिया को फिर दो विरोधी खेमों में बांटने के पक्ष में नहीं दिखता।

पहली न्यूयॉर्क टाइम्स रिपोर्ट भी इसी भारतीय दुविधा की ओर ध्यान दिलाती है। उसके अनुसार, संस्थापक ब्रिक्स देशों में भारत की स्थिति विशिष्ट है। वह चीन को रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है और विश्व मामलों में बीजिंग का प्रभाव अत्यधिक बढ़ने से भी रोकना चाहता है। इसके बावजूद उसे रूस सहित अपने ब्रिक्स साझेदारों को साथ रखना है और वह खुला अमेरिका-विरोधी रुख भी नहीं अपना सकता।

 

करीब आधी दुनिया का संगठन

ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के रूप में हुई थी। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसमें शामिल हुए और दस अन्य देशों को भागीदार का दर्जा मिला। सदस्य देशों की आबादी दुनिया की करीब आधी और संयुक्त आर्थिक उत्पादन वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 40 प्रतिशत है।

इतने विशाल आकार के बावजूद ब्रिक्स कोई वैचारिक रूप से एकरूप गठबंधन नहीं है। रूस, चीन और ईरान अमेरिकी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में इसकी भूमिका पर अधिक जोर देते हैं, जबकि इसके कई दूसरे सदस्य अमेरिका के साथ भी घनिष्ठ आर्थिक या सुरक्षा संबंध रखते हैं। संयुक्त अरब अमीरात अमेरिकी सुरक्षा साझेदार है और मिस्र भी वाशिंगटन का महत्वपूर्ण सहयोगी है। इसलिए ब्रिक्स की ताकत उसका आकार है तो उसकी कमजोरी भी उसी विस्तार से पैदा होने वाले परस्पर विरोधी हित हैं।

शी की सात साल बाद भारत यात्रा का संदेश

इस बार शिखर सम्मेलन का एक बड़ा आकर्षण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक सात साल में यह उनकी पहली भारत यात्रा है। दोनों देशों के रिश्ते 2020 के सीमा संघर्ष के बाद बेहद निचले स्तर पर पहुंच गए थे। सीधी उड़ानों से लेकर निवेश और डिजिटल कारोबार तक अनेक क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ा।

2024 में रूस में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी और शी ने संबंध सुधारने की प्रक्रिया शुरू की। दूसरी रिपोर्ट के विश्लेषण में अमेरिकी शुल्क नीतियों और वैश्विक व्यापार में आए व्यवधान को भी दोनों देशों को कुछ करीब लाने वाला कारक माना गया है। लेकिन यह मेल-मिलाप भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के अंत का संकेत नहीं है।

स्टिमसन सेंटर की चीन कार्यक्रम निदेशक युन सन का आकलन है कि बीजिंग की एक प्रमुख चिंता भारत का अमेरिका की ओर झुकाव रहा है। भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड का सदस्य भी है। इसलिए चीन के लिए नई दिल्ली के साथ तनाव घटाने का एक रणनीतिक लाभ यह भी है कि भारत अमेरिका के और करीब न जाए।ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की वरिष्ठ फेलो तन्वी मदान ने स्थिति का सार इस रूप में रखा है कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं कर रहे, बल्कि उसे संभाल रहे हैं। यानी मोदी-शी संवाद को मित्रता की वापसी मानना जल्दबाजी होगी। यह फिलहाल दो बड़ी शक्तियों द्वारा अपनी प्रतिद्वंद्विता को नियंत्रित रखने की कोशिश अधिक दिखाई देती है।

भारत का संदेशहमारे विकल्प खुले हैं

न्यूयॉर्क टाइम्स के विश्लेषण का एक दिलचस्प पक्ष भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ से जुड़ता है। भारत चीन और रूस के साथ मंच साझा करके यह दिखाना चाहता है कि उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति केंद्र से बंधी नहीं है।

लेकिन साथ ही भारत के पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते भी कहीं अधिक गहरे हो चुके हैं। तन्वी मदान के विश्लेषण का आशय है कि नई दिल्ली पश्चिम को यह संदेश देना चाहती है कि भारत अपने विकल्प खुले रख रहा है, लेकिन इसका अर्थ पश्चिमी साझेदारों को छोड़ना नहीं है। यही भारत की ब्रिक्स नीति की कुंजी भी है—रूस से मित्रता, चीन से संवाद और प्रतिस्पर्धा, अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी तथा ग्लोबल साउथ में स्वतंत्र नेतृत्व।

मेजबानी से मोदी के हाथ में एजेंडा

भारत इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और मेजबान होने के कारण उसे सम्मेलन का एजेंडा निर्धारित करने का महत्वपूर्ण अवसर मिला है। न्यूयॉर्क टाइम्स दूसरी रिपोर्ट में इसकी तुलना 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता से करता है। उस समय भारत ने अफ्रीकी संघ को जी-20 में शामिल कराने को विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने की दिशा में अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया था। रूस-यूक्रेन विवाद के बावजूद संयुक्त घोषणा पर सहमति बनवाना भी भारतीय कूटनीति की महत्वपूर्ण सफलता माना गया।

ब्रिक्स में भी भारत की घोषित दिशा ‘समावेशी वैश्विक विकास’ पर केंद्रित दिखाई देती है। इसके पीछे वही व्यापक विचार है—भारत न तो अमेरिका तथा समृद्ध पश्चिमी देशों के अधीन दिखना चाहता है और न चीन के नेतृत्व वाली व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहता है।वह स्वयं को दोनों के बीच स्वतंत्र ध्रुव के रूप में स्थापित करना चाहता है।

चीन के पास भारत से कहीं बड़ी आर्थिक ताकत

हालांकि वैश्विक नेतृत्व की इस होड़ में दोनों देशों की आर्थिक क्षमता में भारी अंतर है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे विशेष रूप से रेखांकित किया है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसकी तकनीकी और सैन्य क्षमता लगातार बढ़ी है। प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद भारत के मुकाबले पांच गुना से अधिक है। वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी है, जबकि भारत दशकों से स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है।

महत्वपूर्ण खनिजों और ‘रेयर अर्थ’ के क्षेत्र में चीन की मजबूत स्थिति उसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर भी प्रभाव डालने की क्षमता देती है।

शंघाई के फुदान विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र के उप निदेशक लिन मिनवांग ने तो भारत-चीन प्रतिस्पर्धा की धारणा पर ही सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि दोनों देशों की वर्तमान क्षमताओं में इतना अंतर है कि वास्तविक प्रतिस्पर्धा किन क्षेत्रों में है, यह स्पष्ट करना कठिन है।

यह चीनी दृष्टिकोण है और स्वाभाविक रूप से भारत में इससे असहमति हो सकती है, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे दोनों देशों की शक्ति में मौजूदा असमानता दिखाने के लिए प्रमुखता से रखा है।

चीन केविकासशील देशहोने पर भी भारत का सवाल

भारत और चीन के बीच एक और दिलचस्प वैचारिक विवाद ‘ग्लोबल साउथ’ के नेतृत्व को लेकर है। भारत यह सवाल उठाता रहा है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विशाल कूटनीतिक-सैन्य शक्ति होने के बावजूद चीन को क्या उसी अर्थ में विकासशील देश माना जाना चाहिए जिस अर्थ में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कम आय वाले देश स्वयं को देखते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार भारत ने अपने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ सम्मेलनों में चीन को शामिल नहीं किया। इन आयोजनों में सौ से अधिक विकासशील देशों की भागीदारी रही है।

यानी असली प्रतिस्पर्धा केवल ब्रिक्स के भीतर प्रभाव की नहीं है। सवाल यह भी है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की उभरती दुनिया की ओर से बोलने का नैतिक और राजनीतिक अधिकार किसके पास अधिक है—चीन या भारत?

चीन की ताकत ही दूसरे देशों की समस्या भी

चीन का विशाल विनिर्माण आधार उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है, लेकिन यही कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती भी बन गया है। सरकारी सहायता, सस्ते ऋण और बड़े पैमाने के उत्पादन पर आधारित चीनी निर्यात मॉडल से उन देशों के उद्योगों को प्रतिस्पर्धा में मुश्किल होती है जो स्वयं विनिर्माण क्षमता विकसित करना चाहते हैं। भारत भी लंबे समय से इस समस्या को उठाता रहा है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की पूर्व टिप्पणी का उल्लेख किया है जिसमें उन्होंने चीन की वृद्धि को अनुचित व्यापार व्यवहार से जोड़ते हुए कहा था कि यह निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की कीमत पर हुई। यही कारण है कि विकासशील दुनिया के नेतृत्व की चीनी दावेदारी केवल उसके निवेश और आर्थिक ताकत से तय नहीं होगी। कई विकासशील देशों के लिए प्रश्न यह भी है कि चीन के साथ व्यापार उनकी घरेलू औद्योगिक क्षमता को मजबूत करेगा या चीनी उत्पादों पर निर्भरता बढ़ाएगा।

रूस के लिए ब्रिक्सअलगाव तोड़ने का मंच

चीन और भारत की प्रतिस्पर्धा के बीच रूस की जरूरत बिल्कुल अलग है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद मॉस्को के लिए ब्रिक्स यह दिखाने का महत्वपूर्ण मंच बन गया है कि पश्चिमी दबाव के बावजूद वह दुनिया में अलग-थलग नहीं है। पहली न्यूयॉर्क टाइम्स रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिक्स साझेदारों ने रूस को महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा दिया। चीन ने पश्चिम से पहले मिलने वाली अनेक वस्तुओं की जगह आपूर्ति बढ़ाई, भारत रूसी कच्चे तेल का महत्वपूर्ण खरीदार बना और ब्राजील ने रूसी उर्वरक खरीदे। लेकिन भारत और रूस की निकटता का अर्थ यूक्रेन युद्ध पर पूर्ण सहमति नहीं है। अखबार ने यह भी दर्ज किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन से युद्ध समाप्त करने का सार्वजनिक आग्रह किया।

यह फिर उसी भारतीय नीति की ओर लौटता है—साझेदारी कायम रखो, लेकिन हर मुद्दे पर साझेदार की नीति स्वीकार मत करो।

ईरान ने खोली ब्रिक्स की आंतरिक दरार

ब्रिक्स के विस्तार की सबसे कठिन परीक्षा ईरान के कारण सामने आ रही है। ईरान इस समूह को पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ताकत प्रदर्शित करने के मंच के रूप में देखता है। पहली रिपोर्ट के अनुसार चीन ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार रहा है और भारत, रूस तथा चीन से मजबूत संबंध तेहरान की कूटनीतिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं।

दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और तेल आपूर्ति में व्यवधान भारत सहित ऊर्जा आयातक देशों के सीधे आर्थिक हितों को प्रभावित करता है। रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने भी माना है कि ईरान युद्ध को लेकर ब्रिक्स में मतभेद हैं और अंतिम घोषणा पर सहमति में यह मुद्दा बाधा बन सकता है। इससे ब्रिक्स का मूल अंतर्विरोध सामने आता है—साझा असंतोष बहुत है, लेकिन साझा विदेश नीति नहीं।

फिर भी अर्थव्यवस्था जोड़ती है ब्रिक्स को

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद ब्रिक्स के पास एक मजबूत साझा आधार है—आर्थिक विकल्पों की तलाश। समूह व्यापार बढ़ाना चाहता है, स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहा है और अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता घटाने की दिशा में प्रयास कर रहा है। शंघाई स्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक सदस्य तथा साझेदार देशों को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर के बराबर वित्त उपलब्ध करा चुका है। कई देश इसे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अतिरिक्त वित्तीय विकल्प के रूप में देखते हैं। यही वह क्षेत्र है जहां भारत, चीन, रूस और अन्य ब्रिक्स सदस्य अपने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा जमीन तलाश सकते हैं।

चीन बनाम भारत नहीं, दो विश्वदृष्टियों की होड़

दोनों न्यूयॉर्क टाइम्स रिपोर्टों को साथ पढ़ने पर ब्रिक्स की कहानी केवल मोदी बनाम शी या भारत बनाम चीन की प्रतिस्पर्धा नहीं रह जाती। यह दरअसल भविष्य की विश्व व्यवस्था कैसी हो, इस सवाल पर दो अलग दृष्टियों की प्रतिस्पर्धा बन जाती है। चीन के लिए बड़ा और विस्तारित ब्रिक्स अमेरिकी शक्ति को संतुलित करने का माध्यम बन सकता है। रूस और ईरान के लिए भी पश्चिमी दबाव के मुकाबले इसका रणनीतिक महत्व है।

भारत की परिकल्पना अलग दिखाई देती है। वह पश्चिमी प्रभुत्व को चीनी प्रभुत्व से बदलने के बजाय अनेक शक्ति केंद्रों वाली व्यवस्था चाहता है। इसीलिए भारत एक साथ ब्रिक्स, क्वाड, जी-20 और पश्चिमी देशों के साथ विभिन्न साझेदारियों में सक्रिय रह सकता है। इस नीति में विरोधाभास दिखाई दे सकते हैं, लेकिन नई दिल्ली इसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की ताकत के रूप में पेश करती है।

नई दिल्ली का यह ब्रिक्स सम्मेलन इसलिए केवल एक और बहुपक्षीय बैठक नहीं है। यहां एक बड़ा सवाल आकार लेगा—क्या ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी राजनीतिक ध्रुव बनेगा, जैसा चीन की महत्वाकांक्षा से संकेत मिलता है, या भारत उसे ऐसी व्यापक व्यवस्था में ढाल पाएगा जिसमें अमेरिका से निकटता रखने वाले देश भी सहज रहें?

और इसके पीछे उससे भी बड़ा प्रश्न रहेगा—बदलती दुनिया में विकासशील देशों की आवाज आखिर कौन बनेगा: आर्थिक और सैन्य महाशक्ति चीन या विभिन्न खेमों के बीच संतुलन साधकर चलने वाला भारत?

न्यूयॉर्क टाइम्स की दोनों रिपोर्टें इस प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं देतीं। लेकिन वे यह जरूर संकेत करती हैं कि नई दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन उस उत्तर को तलाशने का एक महत्वपूर्ण मंच बनने जा रहा है।

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ABOUR AUTHOR : Jay Singh Rawat is a senior Dehradun-based journalist and author with over 48 years of experience. He has written eight books, two published by the National Book Trust, focusing on Uttarakhand’s tribes, political history, environment, and social issues. He is an honorary member of editorial board of this new portal- Admin.

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आधार एवं श्रेय: यह स्वतंत्र हिंदी समाचार-विश्लेषण न्यूयॉर्क टाइम्स की दो रिपोर्टों—टिफनी मे, येगानेह तोरबती, डेविड पियर्सन और वैलेरी हॉपकिंस की “Emerging Powers Seek an Alternative to the West, but War Divides Them” तथा डेविड पियर्सन और एलेक्स ट्रैवेली की “In a Club of Emerging Powers, China and India Vie for Influence”—में प्रस्तुत तथ्यों, विशेषज्ञ मतों और विश्लेषण के आधार पर नए ढांचे और हिंदी भाषा में तैयार किया गया है। पहली रिपोर्ट में जॉन एलिगॉन, रानिया खालिद, इस्माइल नार और बेरी वांग तथा दूसरी में बेरी वांग ने अतिरिक्त रिपोर्टिंग की है

 

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