चुनाव सुधारों की अनदेखी: पांच राज्यों में 1,405 दागी उम्मीदवारों पर राजनीतिक दलों ने दिए रटे-रटाए तर्क, एडीआर की रिपोर्ट में खुलासा
नई दिल्ली। देश में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट और भारत निर्वाचन आयोग के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद राजनीतिक दल दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं कर रहे हैं। चुनावी निगरानी संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ द्वारा जारी ताजा विश्लेषण के अनुसार, पांच राज्यों—असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में 51 प्रमुख दलों के 3,539 प्रत्याशियों में से 1,405 यानी करीब 40 फीसदी उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि वाले रहे। चिंताजनक तथ्य यह है कि दलों द्वारा इन उम्मीदवारों के चयन के लिए अनिवार्य प्रारूप सी-7 में बेहद सतही, घिसे-पिटे और औपचारिकता मात्र के तर्क दिए गए हैं, जो न्यायिक आदेशों की मूल भावना का खुला मखौल उड़ाते हैं।
एडीआर के आंकड़ों के मुताबिक, इन पांच राज्यों के चुनावों में कुल 8,848 उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया था, जिनमें से प्रमुख दलों के 3,539 प्रत्याशियों के हलफनामों की जांच की गई। कुल दागी 1,405 उम्मीदवारों में से 1,214 के संबंध में ही राजनीतिक दलों ने सी-7 फॉर्म भरकर कारण सार्वजनिक किए, जबकि बाकी उम्मीदवारों को लेकर कोई स्पष्टीकरण तक नहीं दिया गया। राज्यों की स्थिति देखें तो केरल में राजनीतिक दलों के 431 में से सर्वाधिक 268 यानी 63 फीसदी प्रत्याशी आपराधिक मुकदमों में घिरे पाए गए, जिनमें से 159 पर गंभीर मामले दर्ज हैं। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में 559, तमिलनाडु में 473, असम में 66 और पुडुचेरी में 39 प्रत्याशी दागी पृष्ठभूमि के रहे। पुडुचेरी में नियमों की सबसे अधिक अनदेखी देखी गई, जहां 39 में से केवल 12 दागी उम्मीदवारों के लिए ही दलों ने कारण प्रकाशित किए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि दलों को यह बताना अनिवार्य होगा कि उन्होंने किसी बेदाग व्यक्ति के स्थान पर आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को ही टिकट क्यों दिया और इस चयन का आधार मात्र ‘जीतने की क्षमता’ नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए कारणों का विश्लेषण करने पर सामने आया कि लगभग सभी दलों ने एक जैसे रटे-रटाए बयानों का सहारा लिया। अधिकांश दलों ने अपने बचाव में लिखा कि संबंधित प्रत्याशी क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय और सम्मानित है, जनता के सुख-दुख में साथ रहता है, अथवा उसके खिलाफ दर्ज मामले राजनीति से प्रेरित हैं। कई दलों ने यहां तक तर्क दे दिया कि उस विधानसभा क्षेत्र में संबंधित दागी नेता से बेहतर कोई अन्य योग्य और प्रभावी कार्यकर्ता उपलब्ध ही नहीं था।
असम विधानसभा चुनाव के संदर्भ में रिपोर्ट दर्शाती है कि 9 प्रमुख दलों के 318 उम्मीदवारों में से 66 यानी 21 फीसदी पर आपराधिक मामले और 52 पर गंभीर मामले दर्ज थे। इनमें सर्वाधिक 21 मुकदमों वाले राइजोर दल के अखिल गोगोई, 13 मुकदमों वाले भाजपा के शिलादित्य देव और आप की रानुमई तेरोंपी शामिल रहीं। असम में 10 ऐसे उम्मीदवार रहे जिनके मुकदमों के बावजूद दलों ने कोई कारण नहीं बताया। इनमें कांग्रेस के 4, आप के 2, एआईयूडीएफ के 2, भाजपा का 1 और गण सुरक्षा पार्टी का 1 प्रत्याशी शामिल है।
रिपोर्ट में राजनीतिक दलों के लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को भी उजागर किया गया है। केरल में दलों ने छह ऐसे प्रत्याशियों के लिए भी सी-7 प्रारूप भर दिया, जिन पर कोई आपराधिक मामला ही दर्ज नहीं था। वहीं कई दलों ने वेबसाइटों पर आधी-अधूरी जानकारी डाली या बाद में हटा ली। एडीआर का कहना है कि राजनीतिक दल कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर साफ-सुथरी छवि वाले नागरिकों की अनदेखी कर रहे हैं। जब तक चुनाव सुधारों और अदालती आदेशों के उल्लंघन पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपराध के साए से मुक्त कराना संभव नहीं दिखता।
