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पुस्तक समीक्षा ; पढ़ना है तो आदमी को पढ़ने का हुनर सीख

 

हर चेहरे पे लिखा है किताबों से ज्यादा!

 

चरणसिंह केदारखंडी
किताबें आदमी को पढ़ने के लिए ही लिखी जाती हैं। इसलिए मेरा मानना है कि जिन्हें आदमी को पढ़ना नहीं आता, उन्हें किताबें पढ़ने से भी बहुत लाभ नहीं होगा और जिनके पास आदमी को पढ़ने की तर्बियत है, उन्हें शायद किताबों की जरूरत भी कम पड़ती है। मेरे हाथों में जिस लेखक की किताब है, उस आदमकद आदमी को मैं पिछले 11 वर्षों से पढ़ रहा हूं। इसीलिए भरोसे के साथ कह सकता हूं कि जो कुछ किताब में है, वह सब इस आदमी में उपस्थित है। बल्कि बहुत कुछ ऐसा भी है जो किताब में भले दिखाई न देता हो, आदमी में पूरी तरह दिखाई देता है।
शायरों ने चेताया है कि हर आदमी में ‘10-20 आदमी’ होते हैं, लेकिन इस आदमी को देखकर लगता है कि इसके भीतर और बाहर लगभग एक ही आदमी है। ऐसे माहौल में, जब आसपास एक ही आदमी के भीतर कई-कई आदमी हों, भीतर-बाहर एक ही आदमी होना बहुत जज्बे और जोखिम का काम है।
लेकिन यही इस आदमी की तपस्या है और इसीलिए इस आदमी की कहानी को पढ़ा जाना चाहिए।
एक ऐसे समय में, जब ‘सेल्फीमेनिया’ आत्मसम्मोहन की उच्चतम चोटी छू रहा हो, जब फिल्टर लगाकर सुंदर दिखने की सुविधा उपलब्ध हो और जब परपीड़ा-आनंद अर्थात ‘शाडेनफ्रॉयडे’ सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनता जा रहा हो, तब इस किताब में आप एक ऐसे आदमी के जीवन और विरासत का अवगाहन करेंगे, जिसने आईने की तरह स्वयं को अनावृत किया है। वह शेक्सपियर की ‘द रेप ऑफ ल्यूक्रेस’ (1594) की उस भावना को चरितार्थ करता है कि शासकों और सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित लोगों का चरित्र आईने अथवा पुस्तकों की तरह होना चाहिए, ताकि उन्हें सब पढ़ सकें।
प्रो. धर्मपाल सिंह मेरे हृदय में रहते हैं, हालांकि दुनिया के लिए उनका पता सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश है। वहीं स्थित गनपत सहाय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से वर्ष 2017 में डॉ. सिंह एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। वे उन दुर्लभ साधकों और मनीषियों में हैं, जिनके ज्ञान और आचरण की सभ्यता ने मेरे जीवन की कई असभ्यताओं का परिष्कार किया है। हजारों दूसरे लोगों की तरह मैं भी उनके इस निःस्वार्थ स्नेह-अवदान के लिए कृतज्ञ हूं।


उनके बारे में डॉ. अभिषेक पांडेय ने लिखा है—‘मुझे अभी तक के जीवनकाल में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो डॉ. धर्मपाल सिंह सर जैसा संयमी एवं सरल, सिद्धांतवादी एवं सहज, स्पष्टवादी एवं वाकपटु हो।’ (‘अपनी और अपनों की नजर में मैं’, पृष्ठ 193)
वर्ष 2022 में प्रो. धर्मपाल सिंह की आत्मकथा ‘अपनी और अपनों की नजर में मैं’ का पहला संस्करण आया था, जिसे बौद्धिक जगत में सराहा गया। अब सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली ने इसका द्वितीय संशोधित संस्करण बेहतर कागज, कलेवर और कथ्य के साथ प्रकाशित किया है।
समझ के गांव की पाठशाला का विद्यार्थी होने के नाते मुझे लगता है कि डॉ. सिंह अपने परिवेश की निर्मिति हैं। उन्हें बचपन से जो वातावरण मिला, उसमें डॉ. धर्मपाल सिंह से कम कुछ हो भी नहीं सकता था। उन्हें प्रेम और परानुभूति जैसे मूल्यों से समृद्ध ‘आजी’ और दादा मिले; कर्मवीर, दयाभाव और आचरणसिद्ध माता-पिता मिले; विमला देवी जैसी सदाचारी और सेवाभाव से संपन्न समर्पित जीवनसंगिनी मिलीं। विद्यार्थी जीवन में शक्तिहीनता के भाव से मुक्त कराने और खेलकूद के जरिए शारीरिक बल देने वाले श्री नरेन्द्र बहादुर सिंह जैसे शिक्षक मिले। मानसिक बल और बौद्धिक आभिजात्य देने वाले श्री सरयूप्रसाद पाण्डेय, श्री प्रभाकर पाण्डेय, डॉ. हरिनाथ मिश्र, प्रो. हरिश्चंद्र जोग, प्रो. ललितमोहन पाण्डेय और अंततः प्रो. प्रताप सिंह जैसे शोध-मार्गदर्शक मिले।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए हठयोगी पंडित रामलगन तिवारी जैसे सिद्ध संत मिले और मित्रों के रूप में डॉ. जयकरन नाथ तिवारी, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. जे.पी. सिंह, डॉ. अरविंदप्रबोध मिश्र, श्री कमलनयन पाण्डेय और श्री दिनेश सिंह जैसे जीवन-बोध से संपन्न बुद्धिजीवी मिले। समाजसेवा के क्षेत्र में सर्जन डॉ. अरुण कुमार सिंह जैसे लोग उनके आसपास रहे।
प्रो. रामदेव शुक्ल जैसे मनीषी का स्नेह और आशीर्वाद भी उन्हें मिला, जिनके सुझाव पर उन्होंने 2012 में सुलतानपुर में समाजसेवा को समर्पित ‘लोक सरोकार समिति’ का गठन किया। लेखक ने ‘अपनी बात’ (पृष्ठ 11) में बताया है कि आत्मकथा लिखने की प्रेरणा भी उन्हें प्रो. रामदेव शुक्ल ने ही दी। श्रेष्ठ पुरुषों का संग-साथ किसी व्यक्ति को कितना श्रेष्ठ बना सकता है और उससे कितना श्रेष्ठ सृजन करवा सकता है, डॉ. धर्मपाल सिंह का जीवन इसका प्रमाण है।
शुक्ल जी के बारे में लेखक लिखते हैं—‘वे एक सच्चे साहित्य-साधक हैं। यदि मैं उनके संपर्क में न आया होता, तो लेखन-कार्य में कदापि प्रवृत्त न हुआ होता।’ (पृष्ठ 258)
सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी, ‘साइंस ऑफ सोल’ के संपादक और लेखक श्री दिनेश सिंह के सुझाव पर डॉ. धर्मपाल सिंह ने श्रीअरविन्द के द्वार पर जो दस्तक दी, उसे मैं उनके जीवन की एक बड़ी घटना और पिछले एक दशक में एक अत्यंत उर्वर लेखक के रूप में उनके उभार का आधार भी मानता हूं। श्रीअरविन्द चेतना की एक अनिर्वचनीय ऊंचाई हैं। ‘द लाइफ डिवाइन’ उनकी साधना का नवनीत है। इसका रसास्वादन करने के बाद डॉ. सिंह लिखते हैं—
‘द लाइफ डिवाइन ने मेरे चिंतन के नये गवाक्ष खोलने शुरू कर दिये। अब तक मैंने जितना भी अध्यात्म के बारे में जाना था, वह सब अधूरा लगने लगा।’ (पृष्ठ 260)
इस ‘अधूरेपन’ से लेखक के जीवन में जो पूर्णता आई, उसके सुफल के रूप में पिछले एक दशक में उन्होंने ‘A Journey through The Life Divine’ (2017) और उसके हिंदी रूपांतर ‘श्रीअरविन्द कृत दिव्य जीवन : एक अंतर्यात्रा’ (2018) सहित कई महत्वपूर्ण कृतियां दीं। प्रो. रामदेव शुक्ल की ‘बेघर बादशाह’ और ‘ग्रामदेवता’ का उन्होंने क्रमशः ‘A King without Home’ और ‘Village-gods’ के रूप में अनुवाद किया। ‘विचार-वीथी’, आत्मकथा और ‘Mastering English : A Practical Approach’ जैसी रचनाएं भी इसी दौर की उपलब्धियां हैं।
दिवंगत विद्वान प्रो. एस.जेड.एच. आबिदी ने लेखक से कहा था कि ‘Village-gods’ पहला भोजपुरी उपन्यास है जिसका अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है। वर्ष 2021 में इस पुस्तक को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ओरिएंटल इंस्टिट्यूट के पुस्तकालय में स्थान मिला। मुझे लगता है कि अगले एक दशक में डॉ. सिंह और भी अर्थपूर्ण सृजन करेंगे तथा स्वयं के साथ अपने समय और समाज को भी दृष्टिसंपन्न बनाएंगे। प्रत्येक अच्छे लेखक को अपना अब तक लिखा हुआ सब कुछ ‘रफ वर्क’ महसूस होना चाहिए; यही ‘फेयर वर्क’ की सर्वश्रेष्ठ तैयारी है।
अब फिर ‘अपनी और अपनों की नजर में मैं’ की बात। पुस्तक का पठनीय प्राक्कथन बम्बई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रामजी तिवारी ने लिखा है। पाठक इसमें कालक्रमानुसार जीवन का ब्यौरा न खोजें, इसलिए वे स्पष्ट करते हैं कि यह जीवन के विकास-क्रम की सूचीबद्ध ‘जीवनी’ नहीं, बल्कि जीवन की आंतरिक प्रेरणाओं, परिस्थितियों, प्रतिक्रियाओं और प्रतीतियों का वस्तुनिष्ठ समाकलन करने वाली ‘आत्मकथा’ है। (पृष्ठ 14)
कुल 290 पृष्ठों की पुस्तक में चार अध्याय विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—‘जिनसे मैं अनृण नहीं’, ‘अपनी नजर में मैं’, ‘अपनों की नजर में मैं’ और ‘मेरे जीवन निर्माता’। अंतिम अध्याय में आत्मकथाकार ने अपने जीवन को संवारने वाले संतों, गुरुओं और विचारवान मित्रों का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण किया है। चार पृष्ठों के उपसंहार के बाद 15 पृष्ठों की ‘चित्रवीथी’ जीवन की विभिन्न झांकियां प्रस्तुत करती है।
पुस्तक में ‘अपनी और अपनों’ की नजर से लेखक के जिन पांच गुणों की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, वे हैं—परदुःखकातरता, स्पष्टवादिता-सत्यवादिता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासनप्रियता और परिवार तथा समाज से संबंधों को निरंतर निभाने की आदत। यही पांच गुण पुस्तक के केंद्रीय भाव हैं और आत्मकथाकार के जीवन के स्थायी भाव भी।
‘जिनसे मैं अनृण नहीं’ अध्याय के 36 पृष्ठों में लेखक ने अपने दादा-दादी, माता-पिता और जीवनसंगिनी के ऋण को खुले मन से स्वीकार किया है। वे बताते हैं कि परदुःखकातरता और स्पष्टवादिता का गुण उन्हें अपनी अम्मा से मिला (पृष्ठ 49-51), अनुशासनप्रियता दादा श्री शिव बहादुर सिंह से (पृष्ठ 83), जबकि सहजता और सत्यनिष्ठा का पाठ ‘बाबू जी’ श्री रामबरन सिंह से सीखा।
अपने परिवार में लेखक सबसे निकट अपनी दादी यानी ‘आजी’ के रहे। आत्मकथा के सबसे मार्मिक प्रसंगों में एक कक्षा आठ की बोर्ड परीक्षा में उनके अनुत्तीर्ण होने से जुड़ा है। यह खबर सुनकर आजी रातभर रोती रहीं। बालक धर्मपाल के मन पर इसका इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने मन ही मन ठान लिया—अब ठीक से पढ़ना है।
स्नेह और वात्सल्य का सारा आगार उन पर लुटाने वाली आजी को लेखक ने अपना ‘अक्षय कवच’ (पृष्ठ 34) कहा है। प्रेम, सहृदयता, सदाशयता और निश्छल परोपकार के मूलभूत पाठ लेखक ने अपनी अनपढ़ आजी की पाठशाला में सीखे। गर्मियों में आजी घर के सामने कुएं पर पानी और गुड़ रखवाती थीं। राहगीर आते, पानी पीते और नीम की छांव में सुस्ताते। लेखक याद करते हैं कि आजी ने कभी किसी राहगीर की जाति नहीं पूछी। (पृष्ठ 68)
आजी कबीर को बिना पढ़े कबीर को जीती थीं!
‘अपनी नजर में मैं’ अध्याय में डॉ. सिंह ने सहृदयता, स्पष्टवादिता, अनुशासनप्रियता, सामाजिकता, कृतज्ञता, आध्यात्मिकता और मितव्ययिता जैसे जीवन-मूल्यों के साथ अपने क्रोध और भावुकता जैसी कमजोरियों की भी चर्चा की है। यह आत्मस्वीकार पुस्तक को अधिक विश्वसनीय बनाता है।
डॉ. सिंह का जीवनवृत्त बताता है कि उन्होंने अपने गांव सडांव से लेकर सुलतानपुर नगर तक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, गरीबों, पिछड़ों और साधनहीन लोगों की लगातार सहायता की। वे अवकाश के दिनों में भी एक अकेले विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए साइकिल से आठ किलोमीटर जाते थे। (पृष्ठ 107)
पृष्ठ 70 पर एक प्रेरक प्रसंग उस समय का है, जब डॉ. सिंह केवल 15 वर्ष के थे। बाढ़ के दौरान गांव की एक महिला का जीवन बचाने के लिए वे गोमती की धारा के विपरीत करीब दो किलोमीटर तैरकर सेना की टुकड़ी तक पहुंचे और वहां से डॉक्टर को स्टीमर पर लेकर गांव आए। वे लिखते हैं—‘मैं आज भी किसी व्यक्ति की तकलीफ की अनदेखी नहीं कर पाता हूं।’
उनके गुरु प्रो. ललितमोहन पाण्डेय अपने ‘अप्रतिम विद्यार्थी’ की इसी परदुःखकातरता से सबसे अधिक प्रभावित हैं। उनका कहना है कि लोग अक्सर दूसरे के दुःख पर दो शब्द बोलकर या दो आंसू बहाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन धर्मपाल उन विरले लोगों में हैं जो विपदा-पीड़ित व्यक्ति की सहायता और उसे संकट से निकालने के उपाय में पूरे मनोयोग से जुट जाते हैं। (पृष्ठ 133)
संग्रह कभी सुख का आधार नहीं रहा। हर कालखंड, संस्कृति और समाज में सुख का आधार यह रहा है कि हमने दूसरों के दुःख, अभाव, अवसाद, भय और विपदा को कितनी सत्यनिष्ठा से कम करने का प्रयास किया। बुकर टी. वाशिंगटन ने भी लिखा है कि सबसे सुखी वे लोग हैं जो दूसरों के लिए सबसे अधिक करते हैं। डॉ. सिंह का जीवन इस कथन को चरितार्थ करता है।
‘अपनों की नजर में मैं’ अध्याय में सुलतानपुर के प्रबुद्ध समाज के अनेक लोगों ने डॉ. सिंह के प्रति अपनी भावनाएं, स्मृतियां और कृतज्ञता व्यक्त की है। इनमें प्रो. रामदेव शुक्ल, सोमेशशेखरचन्द्र, दिनेश सिंह, हरिशंकर सिंह, इंजीनियर ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, पत्रकार राज खन्ना, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह, महामहोपाध्याय आचार्य जयप्रकाश नारायण द्विवेदी, डॉ. प्रभाकर मिश्र, डॉ. जयकरन नाथ तिवारी, डॉ. अरविंदप्रबोध मिश्र, डॉ. शिवाकांत त्रिपाठी, डॉ. अभिषेक पाण्डेय, डॉ. वंदना श्रीवास्तव, श्रीमती मधु गर्ग, प्रो. कृष्णमोहन पाण्डेय और प्रो. वेदव्यास जयप्रकाशनारायण द्विवेदी शामिल हैं। डॉ. सुशील कुमार शुक्ल ने कविता में उन्हें ‘कर्म की दीपित मशाल’ (पृष्ठ 168) कहा है, जबकि महामहोपाध्याय डॉ. द्विवेदी ने ‘असंभवशीलता की भूमि में सम्भावना के बीज बोने’ (पृष्ठ 173) वाला किसान बताया है।
पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने अपनी कमजोरियों को छिपाया नहीं है। श्रेष्ठ आत्मकथाओं और संस्मरणों की यही कसौटी भी है कि उनका नायक अपने दोषों, दुर्गुणों और असफलताओं को निष्पक्षता से सामने रखे। पृष्ठ 34 पर लेखक बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हैं जब कुसंग के प्रभाव में घर से दस रुपये चुराने पर दादा से उन्हें कठोर दंड मिला। इस घटना ने उन्हें आजीवन मितव्ययिता का पाठ दिया।
इसी तरह वे अपने क्रोध की खुलकर चर्चा करते हैं। समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि कठोर अनुशासनप्रियता, समयनिष्ठा और स्वभावगत क्रोध दूसरों पर सख्ती से नहीं थोपे जाने चाहिए थे। वे स्वीकार करते हैं—‘आज मुझे यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं है कि मेरा अनुशासित रखने का तरीका ठीक नहीं था।’ (पृष्ठ 84) पृष्ठ 102-103 पर वे यह भी स्वीकारते हैं कि ‘साइंस ऑफ सोल’ में ‘द लाइफ डिवाइन’ पर प्रकाशित लेख की विद्वत समाज में प्रशंसा से उनके भीतर अहंकार आया, लेकिन श्रीअरविन्द के चिंतन ने शीघ्र ही उसका शमन कर दिया।
‘मेरे जीवन निर्माता’ अध्याय में डॉ. सिंह ने उन तेरह प्रेरक व्यक्तित्वों को याद किया है जिन्होंने अलग-अलग रूपों में उन्हें प्रेरित, पोषित और प्रभावित किया। इनमें अधिकांश उनके शिक्षक और मित्र हैं। पहला नाम स्वामी अशोकानंद जी का है। महान संत और हठयोगी पंडित रामलगन तिवारी (1890-2003) का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा, जो गोमती नदी के किनारे एक गुफा में योगाभ्यास करते थे। धर्मपाल जी उनकी शिक्षाओं पर आधारित पुस्तक भी लिख रहे हैं।
अपने घनिष्ठ मित्र डॉ. जयकरन नाथ तिवारी के बारे में वे लिखते हैं—‘इसमें कोई दो राय नहीं कि मेरी सभी उपलब्धियों में उनका सहयोग अंतर्निहित है। अगर डॉ. जयकरन नाथ तिवारी जैसा मित्र मुझे न मिला होता, तो शायद मैं वह न कर पाता जो कर सका।’ (पृष्ठ 237) अपने शोध-निर्देशक प्रो. प्रताप सिंह के प्रति उनकी श्रद्धा भी पूरी पुस्तक में दिखाई देती है।
अब पुस्तक की कुछ कमियों की चर्चा भी जरूरी है। मेरा मानना है कि ‘अपनों की नजर में मैं’ अध्याय में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विमला देवी, अनुज श्री समर बहादुर और उनके बच्चों में से सभी अथवा किसी एक का वक्तव्य अवश्य होना चाहिए था। आखिर उन्होंने ही लेखक को सबसे निकट से देखा और ‘झेला’ है। उम्मीद है कि तीसरे संस्करण में यह कमी पूरी होगी।
‘चित्रवीथी’ के कैप्शन पठनीय हैं, लेकिन कई छायाचित्रों में अपेक्षित स्पष्टता नहीं है। भावी संस्करण में बाबा रामलगन तिवारी की गुफा, पैतृक गांव और घर, आजी का नीम का पेड़, दादा का ‘आश्रम’, लोक सरोकार समिति का कार्यालय तथा बचपन की कुछ अन्य छवियां शामिल की जा सकती हैं। ‘अपनों’ द्वारा लेखक के बारे में लिखी गई सामग्री में कुछ स्थानों पर पुनरुक्ति भी है। लेखक के लेखन और पुस्तकों की चर्चा बार-बार आती है, जिसे संपादन से कम किया जा सकता था। कुछ अंग्रेजी शब्दों और नामों के मुद्रण में भी त्रुटियां हैं, जिन्हें अगले संस्करण में सुधारना चाहिए।
अंततः, मैं एक आदमकद जीवन जीने के लिए डॉ. धर्मपाल सिंह को हार्दिक बधाई देता हूं। यह पुस्तक केवल किसी व्यक्ति की जीवन-कथा नहीं, बल्कि उस संस्कार-परंपरा की कथा भी है जिसमें मनुष्य का मूल्य उसकी उपलब्धियों से अधिक उसके आचरण, संवेदना और दूसरों के जीवन में छोड़ी गई रोशनी से तय होता है।
इसीलिए मैं ‘अपनी और अपनों की नजर में मैं’ को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, शोध केंद्रों और लिखे हुए आखर के प्रेमियों के लिए उपयोगी मानता हूं। इस महनीय जीवन की सुवास जनता तक जानी चाहिए—उस तरह, जैसे पतझड़ के कानों में ऋतुराज की खबर जाती है…।
पुस्तक : अपनी और अपनों की नजर में मैं
लेखक : डॉ. धर्मपाल सिंह
प्रकाशक : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
वर्ष : 2026
मूल्य : 999 रुपये
पृष्ठ : 290
चरणसिंह केदारखंडी, देहरादून, उत्तराखंड

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