सौर मंडल से परे सबसे आशाजनक संसार
हमारे सौर मंडल से बाहर अब तक 6,300 से अधिक ग्रह खोजे जा चुके हैं। इनमें कुछ ऐसे संसार भी हैं, जहाँ परिस्थितियाँ पृथ्वी से मिलती-जुलती हो सकती हैं। इनकी खोज अब विज्ञान को उस सबसे बड़े सवाल के करीब ले जा रही है—क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कहीं और भी जीवन है?
-नेटाली वोलचोवर द्वारा-
नेटाली पुलित्जर पुरस्कार विजेता विज्ञान पत्रकार हैं और ‘अदर वर्ल्ड्स’ नामक नए स्तंभ की लेखिका हैं, जो सौर मंडल से बाहर के ग्रहों और जीवन की खोज पर केंद्रित है।
1990 के दशक में बचपन के दिनों में मैंने शनि को अपना पसंदीदा ग्रह चुना था, क्योंकि उसके चारों ओर खूबसूरत वलय हैं। दूर से वे इतने पूर्ण, गोलाकार और ठोस दिखाई देते हैं, मानो गणित की किसी किताब में किसी गोले को काटती हुई एक डिस्क हो। लेकिन पास जाकर देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग है। ये वलय ठोस नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में स्वतंत्र रूप से घूमते बर्फ, पत्थरों और चट्टानों के असंख्य टुकड़ों से बने हैं। कल्पना कीजिए कि उनमें से किसी चट्टान से चिपके हुए आप शनि के चारों ओर चुपचाप घूम रहे हों। मेरी बहन का पसंदीदा ग्रह धारीदार और धब्बेदार बृहस्पति था और उसकी पसंद भी मुझे कम दिलचस्प नहीं लगती थी।
शायद दूसरे ग्रह हमें इसलिए आकर्षित करते हैं क्योंकि वे वैकल्पिक संसारों की तरह हैं—भौतिकी के उन्हीं नियमों से बने, लेकिन बिल्कुल अलग रूप में। चट्टान, गैस और बर्फ के ये विशाल गोले हमारी कल्पना को विस्तार देते हैं। साथ ही वे हमें अपनी पृथ्वी को नए ढंग से देखने का अवसर भी देते हैं। दूसरे ग्रहों के विचित्र वातावरण और परिदृश्य पृथ्वी की विशिष्टता को और अधिक स्पष्ट करते हैं।
जब टेक्सास के ग्रामीण इलाके के एक बेडरूम में हम भाई-बहन ग्रहों को लेकर ऐसे महत्वपूर्ण विचार-विमर्श कर रहे थे, लगभग उसी समय खगोलविद हमारे सूर्य के अलावा दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों का पता लगाना शुरू कर रहे थे।

उस समय मनुष्य को अपने सौर मंडल के केवल नौ ग्रह मालूम थे—तब प्लूटो को भी ग्रह माना जाता था। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। ज्ञात एक्सोप्लैनेट यानी सौर मंडल से बाहर के ग्रहों की संख्या 6,300 से अधिक हो चुकी है और हजारों अन्य संभावित ग्रह पुष्टि की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अकेली हमारी आकाशगंगा में ही करीब 100 अरब ग्रह हो सकते हैं।
इनमें से अधिकांश ग्रह इतने प्रकाश-वर्ष दूर हैं कि मौजूदा दूरबीनों से उनकी सामान्य तस्वीर लेना संभव नहीं है। कुछ धुंधले अपवाद जरूर हैं। इसलिए वैज्ञानिक अक्सर ग्रह को सीधे देखे बिना ही उसकी मौजूदगी का पता लगाते हैं। कभी किसी तारे पर उसके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से और कभी तारे के सामने से गुजरते समय पड़ने वाली उसकी बेहद हल्की छाया से।
अब जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप जैसे शक्तिशाली उपकरणों ने इस खोज को एक नए दौर में पहुंचा दिया है। वैज्ञानिक एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल, उसकी रासायनिक संरचना, उसके बनने के इतिहास और यहाँ तक कि वहाँ जीवन की संभावना के बारे में भी बेहद छोटे संकेतों से जानकारी निकालने लगे हैं।
एक्सोप्लैनेटों ने संभावित संसारों की हमारी कल्पना को लगभग असीम बना दिया है। मेरी बहन और मेरे बचपन के पसंदीदा ग्रहों की तरह अब बहुत से वैज्ञानिकों के भी अपने पसंदीदा दूरस्थ संसार हैं।
पृथ्वी का संभावित जुड़वां
जर्मनी के गॉटिंजन स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च के खगोलभौतिक विज्ञानी रेने हेलर को KOI-456.04 विशेष रूप से आकर्षित करता है। यह अभी पूरी तरह पुष्ट ग्रह नहीं है, लेकिन इसके अस्तित्व की संभावना काफी मजबूत मानी जाती है। हेलर और उनके सहयोगियों ने 2020 में नासा के केप्लर स्पेस टेलीस्कोप के पुराने आंकड़ों का दोबारा विश्लेषण करते हुए इसे खोजा था। वैज्ञानिक इसके अस्तित्व को लेकर लगभग 85 प्रतिशत आश्वस्त हैं।
केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन ने 2009 से 2018 के बीच हजारों एक्सोप्लैनेट खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
KOI-456.04 का सुराग एक दूर स्थित सूर्य जैसे तारे के प्रकाश में होने वाले अत्यंत मामूली बदलाव से मिला। नियमित अंतराल पर उस तारे की चमक थोड़ी-सी कम होती दिखाई दी। संभव है कि यह महज सांख्यिकीय उतार-चढ़ाव हो, लेकिन अधिक संभावना यह है कि कोई ग्रह नियमित रूप से उस तारे के सामने से गुजरता है और उसके प्रकाश के एक छोटे हिस्से को रोक देता है। यदि इसकी पुष्टि हो जाती है तो यह उस तारे की परिक्रमा करने वाला चौथा ज्ञात ग्रह होगा।
और यही वह बिंदु है जहाँ KOI-456.04 बेहद रोमांचक हो जाता है।
पुष्टि होने पर इसे अब तक ज्ञात सबसे पृथ्वी-समान संसारों में गिना जा सकता है। इसकी त्रिज्या पृथ्वी की लगभग 1.9 गुना होने का अनुमान है और इसे अपने तारे से लगभग उतनी ही ऊष्मा और रोशनी मिलती है जितनी पृथ्वी को सूर्य से। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल हुईं तो इसकी सतह पर तरल पानी मौजूद हो सकता है। वहाँ प्लेट टेक्टोनिक्स जैसी भूगर्भीय गतिविधि की संभावना भी हो सकती है।
और यदि समान आकार तथा परिस्थितियों वाले ग्रहों का विकास भी कुछ हद तक समान रास्ते पर चलता है, तो कल्पना की जा सकती है कि वहाँ प्रकाश-संश्लेषण करने वाले जीवों या किसी दूसरे प्रकार के जीवन की संभावना हो।
हेलर का सवाल सरल है—“दिलचस्प है, है न?”
ट्रैपिस्ट-1 : एक तारे के सात चट्टानी संसार
पुष्टि हो चुके एक्सोप्लैनेटों में सबसे चर्चित नामों में ट्रैपिस्ट-1 प्रणाली शामिल है। पृथ्वी से करीब 40 प्रकाश-वर्ष दूर एक छोटे लाल तारे की परिक्रमा सात चट्टानी ग्रह कर रहे हैं। इनमें से कुछ अपने तारे के उस क्षेत्र में हैं जिसे वैज्ञानिक ‘रहने योग्य क्षेत्र’ कहते हैं। यहाँ तापमान ऐसा हो सकता है कि अनुकूल परिस्थितियों में पानी तरल अवस्था में बना रहे।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रैपिस्ट-1 के इन ग्रहों के पास वायुमंडल भी है?
वैज्ञानिक चाहते हैं कि इसका जवाब ‘हाँ’ हो, क्योंकि जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने में वायुमंडल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। गैसों का आवरण किसी ग्रह का तापमान नियंत्रित कर सकता है, उसकी सतह को हानिकारक विकिरण से बचा सकता है और पानी को अंतरिक्ष में खो जाने से रोक सकता है। वायुमंडलीय गैसें जैविक प्रक्रियाओं के लिए जरूरी रासायनिक पदार्थ भी उपलब्ध करा सकती हैं।
ट्रैपिस्ट-1 एक ‘एम-बौना’ तारा है। इसकी त्रिज्या सूर्य की लगभग दसवीं और आयतन करीब हजारवें हिस्से के बराबर है। इसलिए यह सूर्य की तुलना में काफी धुंधला और ठंडा है। नतीजा यह है कि इसका रहने योग्य क्षेत्र तारे के बहुत पास है।
वैज्ञानिकों के लिए यह स्थिति फायदेमंद भी है। इतने पास परिक्रमा करने वाले ग्रह जब अपने तारे के सामने से गुजरते हैं तो तारे के प्रकाश में अपेक्षाकृत स्पष्ट कमी आती है। इससे उनके बारे में जानकारी जुटाना आसान होता है।
लेकिन यही निकटता उनके लिए खतरा भी है।
ये ग्रह अपने तारे से आने वाले तीव्र विकिरण और तारकीय गतिविधियों का सामना करते हैं। ऐसा विकिरण धीरे-धीरे किसी ग्रह के वायुमंडल के अणुओं को अंतरिक्ष में उड़ा सकता है।
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने ट्रैपिस्ट-1b के पर्याप्त ट्रांजिट का अध्ययन किया है। यह तारे के सबसे नजदीक स्थित ग्रह है। अब खगोलविदों का मानना है कि इसके पास शायद कोई महत्वपूर्ण वायुमंडल नहीं है और यह लगभग नंगी चट्टान है। इसके पड़ोसी ट्रैपिस्ट-1c के बारे में भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं दिखाई देती।
लेकिन उम्मीद खत्म नहीं हुई है।
नासा की वर्चुअल प्लैनेटरी लैबोरेटरी की प्रधान अन्वेषक विक्टोरिया मीडोज की नजर ट्रैपिस्ट-1e पर है। यह तारे से चौथा चट्टानी ग्रह है और अपेक्षाकृत दूर परिक्रमा करता है। मीडोज को यह ग्रह इसलिए खास लगता है क्योंकि इसका आकार लगभग पृथ्वी जितना है और इसका तापमान ऐसा हो सकता है कि अपेक्षाकृत पतले वायुमंडल के बावजूद तरल पानी बने रहने की संभावना हो।
मीडोज और उनके सहयोगी ट्रैपिस्ट-1e के वायुमंडल में ‘बायोसिग्नेचर गैसों’ की तलाश करना चाहते हैं। ये ऐसी गैसें या गैसों के ऐसे असामान्य संयोजन होते हैं, जिन्हें जैविक गतिविधियों से जोड़कर देखा जा सकता है।
मीडोज कहती हैं, “मुझे लगता है कि यह पहला ग्रह है जहाँ हम संभावित रूप से जीवन के संकेत की खोज कर सकते हैं।”
पृथ्वी से अरबों साल पुराने ग्रह
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन के ग्रह-शिकारी खगोलविद पॉल रॉबर्टसन को लगता है कि एक्सोप्लैनेटों की एक बेहद दिलचस्प प्रणाली को उतना ध्यान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए। यह है केप्लर-444।
वे मजाक में कहते हैं, “शायद मैं हिपस्टर हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि इसे कम आंका गया है।”
केप्लर-444 प्रणाली में पाँच छोटे ग्रह अपने तारे के बेहद करीब परिक्रमा करते हैं। वे संभवतः इतने गर्म हैं कि वहाँ जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं हो सकतीं। फिर भी इस प्रणाली की एक विशेषता वैज्ञानिक कल्पना को झकझोर देती है—इसकी उम्र।
तारे की रासायनिक संरचना से संकेत मिलता है कि यह प्रणाली करीब 11 अरब वर्ष पुरानी है। यानी सूर्य और पृथ्वी से दोगुनी से भी अधिक पुरानी और ब्रह्मांड की वर्तमान आयु के लगभग 80 प्रतिशत के बराबर।
यह तथ्य अपने आप में एक असाधारण सवाल पैदा करता है।
यदि ब्रह्मांड में ग्रह पृथ्वी के जन्म से अरबों वर्ष पहले बनने लगे थे, तो क्या कहीं ऐसे ग्रह भी रहे होंगे जहाँ जीवन को विकसित होने के लिए पृथ्वी से कहीं अधिक समय मिला हो?
रॉबर्टसन कहते हैं, “मुझे इस बारे में सोचना अच्छा लगता है कि वहाँ ऐसे ग्रह हैं जो सौर मंडल से अरबों वर्ष पुराने हैं। यदि उन ग्रहों पर लगातार रहने योग्य परिस्थितियाँ हो सकती हैं, तो वहाँ क्या हो सकता है?”
एक मृत तारे के पास जीवन की संभावना
जीवन की खोज केवल पृथ्वी जैसे ग्रहों तक सीमित नहीं है। वह ऐसी जगह भी संभव हो सकती है जिसकी हमने पहले कल्पना तक न की हो।
वेल्स के कार्डिफ विश्वविद्यालय के विलियम बेन्स WD 1856 b के हालिया अध्ययनों से प्रभावित हैं। यह बृहस्पति के आकार का गैसीय ग्रह है, जिसे 2020 में एक मृत तारे के अवशेष की परिक्रमा करते पाया गया था।
इसका तारा अब ‘सफेद बौना’ है। सूर्य जैसे तारे अपने जीवन के अंतिम चरण में फूलकर लाल दानव बनते हैं। इस दौरान वे अपने आसपास के ग्रहों को निगल भी सकते हैं। बाद में उनकी बाहरी परतें बिखर जाती हैं और पीछे गर्म, घना तारकीय कोर बचता है, जिसे सफेद बौना कहा जाता है।
आश्चर्य यह है कि WD 1856 b इस विनाशकारी प्रक्रिया के बाद भी मौजूद है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह ग्रह पहले अपने तारे से काफी दूर रहा होगा और बाद में किसी प्रक्रिया के कारण अंदर की ओर खिसककर वर्तमान कक्षा में आया होगा।
लेकिन बेन्स की दिलचस्पी इस विशाल गैसीय ग्रह से भी ज्यादा उसके संभावित चंद्रमाओं में है।
यदि बृहस्पति और शनि की तरह WD 1856 b के आसपास भी बड़े बर्फीले चंद्रमा रहे हों तो क्या तारे के सफेद बौने में बदलने और ग्रह की कक्षा बदलने के बाद उनमें से कुछ चंद्रमा महासागरीय संसार बन गए होंगे?
बेन्स सवाल उठाते हैं—“क्या अब यह महासागर संसारों से घिरा होगा? और यदि हाँ, तो क्या वहाँ जीवन विकसित हो सकता था?”
यह विचार विज्ञान-कथा जैसा लगता है। दिलचस्प बात यह है कि एड्रियन त्चाइकोव्स्की की 2025 की विज्ञान-कथा पुस्तक ‘श्राउड’ में भी लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में एक विदेशी सभ्यता की कल्पना की गई है।
दूसरे संसार हमें पृथ्वी को समझना सिखाते हैं
बाह्य अंतरिक्ष की सभ्यताओं और विचित्र ग्रहों की कल्पना करने का महत्व केवल यह नहीं है कि शायद एक दिन हमें एलियन जीवन मिल जाए। इन संसारों के बारे में सोचना हमारे अपने अस्तित्व को भी नए संदर्भ में रखता है।
यह अपने आप में हैरतअंगेज है कि पदार्थ भौतिकी के समान नियमों का पालन करते हुए कितने अलग-अलग प्रकार के विशाल संसार बना सकता है। कहीं गैस के दानव हैं, कहीं नंगी चट्टानें, कहीं संभवतः महासागरों से ढके संसार और कहीं ऐसे ग्रह हैं जो अपने तारे के इतने करीब हैं कि उनकी सतह पिघली हुई हो सकती है।
जो ग्रह पृथ्वी जैसे नहीं हैं, वे भी हमें पृथ्वी को समझने में मदद करते हैं। उनके साथ तुलना करने पर पता चलता है कि हम कितने असाधारण रूप से अनुकूल ग्रह पर रहते हैं—जहाँ तापमान जीवन के अनुकूल है, साँस लेने योग्य वातावरण है, जीवन के लिए जरूरी पानी विशाल महासागरों में मौजूद है और समुद्र से ऊपर उठे महाद्वीपों पर खड़े होकर हम उन्हीं दूरस्थ संसारों को देखने के लिए दूरबीनें बना सकते हैं।
और शायद सबसे रोमांचक बात यह है कि यह खोज अभी शुरुआती दौर में है।
खगोलविद मौजूदा दूरबीनों से अधिक से अधिक पृथ्वी-समान एक्सोप्लैनेट खोजने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही अगली पीढ़ी के ऐसे उपकरण बनाए जा रहे हैं, जिनकी क्षमता आज की दूरबीनों से कहीं अधिक होगी।
2040 के दशक के लिए प्रस्तावित नासा की ‘हैबिटेबल वर्ल्ड्स ऑब्जर्वेटरी’ का उद्देश्य आसपास के तारों के निकट पृथ्वी जैसे ग्रहों की सीधे तलाश करना और उनके वायुमंडल में उन गैसों की जांच करना है, जिनका संबंध जीवन से हो सकता है।
यदि ऐसी दूरबीन किसी पृथ्वी जैसे ग्रह के वातावरण में ऑक्सीजन, मीथेन या दूसरी गैसों का ऐसा संयोजन खोजती है जिसे सामान्य भूगर्भीय अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं से समझाना कठिन हो, तो वह मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में से एक हो सकती है।
ग्रहीय वैज्ञानिक सारा सीगर उन वैज्ञानिकों में हैं जिन्होंने एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल का अध्ययन करने की तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके लिए जीवन के संकेत वाले ग्रह की खोज की संभावना लगातार बढ़ रही है।
और शायद इस पूरे वैज्ञानिक अभियान की खूबसूरती उनकी एक पंक्ति में समा जाती है।
वे कहती हैं—“कोई पसंदीदा ग्रह नहीं है, क्योंकि हमेशा अगला बेहतर होता है।”
यही एक्सोप्लैनेट विज्ञान का सबसे बड़ा आकर्षण है। आज जो ग्रह सबसे अधिक पृथ्वी जैसा दिखाई देता है, कल उससे बेहतर उम्मीदवार मिल सकता है। हर नई खोज हमारे सामने एक नया संसार खोलती है और साथ ही उस पुराने प्रश्न को और गहरा करती जाती है—क्या पृथ्वी ब्रह्मांड में सचमुच अकेली है, या अरबों तारों के बीच कहीं कोई दूसरा संसार भी है जहाँ कोई आकाश की ओर देखकर यही सवाल पूछ रहा है?
