आठ दशक बाद किशाऊ बांध परियोजना का रास्ता साफ, छह राज्यों में समझौता
The Kishau Project, conceived in 1940, is considered important for the states of the Upper Yamuna Basin in terms of water and energy. The proposed project will create a reservoir with a capacity of about 1,562 MCM and develop a power generation capacity of 422 megawatts. Besides Uttarakhand and Himachal Pradesh, it is expected to help increase the availability of irrigation and drinking water for Uttar Pradesh, Haryana, Rajasthan, and Delhi. The project has also been linked to the rejuvenation of the Yamuna.

422 मेगावाट बिजली उत्पादन के साथ सिंचाई-पेयजल में मिलेगा लाभ, 1562 एमसीएम क्षमता का बनेगा जलाशय
नई दिल्ली/देहरादून, 15 सितम्बर। करीब आठ दशक से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को धरातल पर उतारने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में हुई बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
वर्ष 1940 में परिकल्पित किशाऊ परियोजना जल और ऊर्जा के साथ ही अपर यमुना बेसिन के राज्यों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रस्तावित परियोजना से करीब 1562 एमसीएम क्षमता का जलाशय बनेगा और 422 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता विकसित होगी। इससे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को सिंचाई एवं पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। परियोजना को यमुना के पुनर्जीवीकरण से भी जोड़ा गया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समझौते को परियोजना के करीब आठ दशक लंबे इंतजार के बाद निर्णायक पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि विभिन्न कारणों से परियोजना लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में 16 जून 2026 को हुई बैठक में परियोजना से जुड़ी कई अड़चनों के समाधान का रास्ता निकला था। इसके बाद केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच लगातार समन्वय से एमओयू तक पहुंचना संभव हुआ।
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा क्षेत्र में टौंस नदी पर प्रस्तावित है। परियोजना को अंतरराज्यीय जल प्रबंधन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे संग्रहित पानी का लाभ अपर यमुना क्षेत्र के कई राज्यों को मिलना है। मुख्यमंत्री ने इसे अंतरराज्यीय सहयोग और सहकारी संघवाद का उदाहरण बताया।
हालांकि परियोजना के क्रियान्वयन के साथ पुनर्वास और पर्यावरण से जुड़ी बड़ी चुनौतियां भी सामने आएंगी। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि परियोजना से प्रभावित परिवारों का उचित और सम्मानजनक पुनर्वास राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। विकास के साथ प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

परियोजना के लिए करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता बताई गई है। इसके बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए बड़ी मात्रा में भूमि उपलब्ध करानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि वन बहुल और पर्वतीय उत्तराखंड के लिए इतनी भूमि उपलब्ध कराना कठिन चुनौती है। उन्होंने केंद्र और सहभागी राज्यों से क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भूमि चिह्नित करने में सहयोग मांगा। साथ ही परियोजना के पर्यावरण और वन संबंधी प्रावधानों का नियमानुसार पालन करने की बात कही।
मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि एमओयू के बाद परियोजना के क्रियान्वयन की प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ेगी। परियोजना पूरी होने पर जल भंडारण, पेयजल, सिंचाई और विद्युत उत्पादन के साथ यमुना में जल उपलब्धता बढ़ाने में दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।
बैठक में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित केंद्र और संबंधित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
