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वायरस में मिला जीन सुधार का नया हथियार, बीमारियों के इलाज की बढ़ी उम्मीद

Scientists have discovered a powerful gene-targeting system in viruses. Billions of years old, VIPR seems to predate CRISPR and may be even more effective.

वैज्ञानिकों ने वायरस में एक ऐसी प्राचीन जीन-टारगेटिंग प्रणाली खोजी है, जो भविष्य में जीन संपादन की नई तकनीक का आधार बन सकती है। VIPR नाम की यह प्रणाली संभवतः चार अरब वर्ष से भी अधिक पुरानी है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आज की चर्चित CRISPR तकनीक की विकासवादी जड़ें इससे जुड़ी हो सकती हैं। यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि VIPR आकार में छोटा है और CRISPR की तुलना में अधिक प्रकार के आनुवंशिक अनुक्रमों को निशाना बनाने की क्षमता रखता है। यदि इसे नियंत्रित जीन-संपादन उपकरण के रूप में विकसित किया जा सका तो जीनोम के उन हिस्सों तक भी पहुंच संभव हो सकती है, जहां मौजूदा CRISPR प्रणालियों की सीमाएं सामने आती हैं।

इस खोज से जुड़े दो शोधपत्र वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि VIPR की कहानी केवल नई जैव-प्रौद्योगिकी की नहीं, बल्कि पृथ्वी पर अरबों वर्षों से जारी वायरसों के आपसी संघर्ष की कहानी भी हो सकती है।

प्रकृति से मिला था CRISPR

पिछले एक दशक में CRISPR जीन-संपादन का अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक औजार बन चुका है। चिकित्सा से लेकर कृषि तक इसके अनेक संभावित और व्यावहारिक उपयोग सामने आए हैं। लेकिन CRISPR को वैज्ञानिकों ने शून्य से नहीं बनाया था। यह प्रणाली प्रकृति में पहले से मौजूद थी।

बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव हमलावर वायरसों से बचने के लिए CRISPR का उपयोग करते हैं। इसमें RNA और विशेष प्रोटीन मिलकर ऐसे आनुवंशिक अनुक्रम को पहचानते हैं, जो किसी वायरस के DNA से मेल खाता हो। RNA लक्ष्य की पहचान करता है और उससे जुड़ा प्रोटीन DNA को काटकर वायरस को निष्क्रिय करने में मदद करता है।

अब वैज्ञानिकों को इसी तरह की एक व्यवस्था स्वयं वायरस में मिली है। यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा हुआ है—क्या जिस आनुवंशिक हथियार का इस्तेमाल आज बैक्टीरिया वायरसों के विरुद्ध करते हैं, उसका बहुत पुराना रूप कभी वायरसों ने एक-दूसरे के खिलाफ विकसित किया था?

23 लाख प्रोटीन की पड़ताल

इस खोज के पीछे वैज्ञानिकों की लंबी पड़ताल है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में जेनिफर डौडना के साथ काम कर चुके पीटर यून ने CRISPR की उत्पत्ति समझने के लिए केवल जीनों की तुलना करने के बजाय उनसे बनने वाले प्रोटीन की संरचना का अध्ययन करने का रास्ता चुना।

इसके पीछे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तर्क था। अरबों वर्षों के दौरान जीन में बहुत से परिवर्तन हो सकते हैं, लेकिन उनसे बनने वाले प्रोटीन का मूल आकार और कार्य लंबे समय तक संरक्षित रह सकता है। इसलिए अत्यंत प्राचीन विकासवादी संबंध खोजने में प्रोटीन की संरचना महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।

पीटर यून और शोधार्थी केनेथ लोई ने लगभग 23 लाख प्रोटीन की जांच की। इनमें उन्हें सैकड़ों ऐसे प्रोटीन मिले, जिनकी संरचना CRISPR से जुड़े अणुओं जैसी थी, लेकिन वे सूक्ष्मजीवों की ज्ञात CRISPR रक्षा प्रणालियों का हिस्सा नहीं थे।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इनमें से लगभग सभी प्रोटीन वायरसों से आए थे।

यह खोज वैज्ञानिकों की अपेक्षा के ठीक विपरीत थी। अब तक CRISPR को मुख्य रूप से बैक्टीरिया द्वारा वायरस के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले रक्षा हथियार के रूप में देखा जाता था। लेकिन यहां वायरस स्वयं CRISPR जैसी प्रणाली लेकर घूम रहे थे।

इन प्रोटीनों को शोधकर्ताओं ने VIPR नाम दिया।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने खोली पुरानी परत

इस खोज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आधुनिक प्रणालियां लाखों प्रोटीनों की संरचनाओं की तुलना कर उनके बीच ऐसे प्राचीन संबंध पहचान सकती हैं, जिन्हें केवल आनुवंशिक अनुक्रमों को देखकर पकड़ना बेहद कठिन होता।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के सूक्ष्मजीव विज्ञानी फिलिप क्रैंज़ुश के अनुसार, कुछ वर्ष पहले इस तरह के संबंध खोजना बेहद मुश्किल था। नई गणनात्मक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विधियों ने जीवविज्ञान के अत्यंत पुराने विकासवादी संबंधों को समझने का नया रास्ता खोला है।

लेकिन केवल कंप्यूटर पर समानता मिलना पर्याप्त नहीं था। यह जानना जरूरी था कि VIPR वास्तव में करता क्या है।

संयोग से शोधकर्ताओं को ऐसा वायरस मिल गया, जिसमें VIPR मौजूद था और जिसका नमूना डौडना की प्रयोगशाला के फ्रीजर में पहले से सुरक्षित था। वैज्ञानिकों ने वायरस को सक्रिय कर कोशिकाओं को संक्रमित किया और फिर उसके व्यवहार का अध्ययन किया।

वायरस के खिलाफ वायरस का हथियार

प्रयोगों में सामने आया कि संक्रमित कोशिकाएं VIPR प्रोटीन बनाती हैं। ये प्रोटीन वायरल RNA अणुओं के साथ मिलकर विशेष DNA अनुक्रमों को पहचान सकते हैं।

यहीं VIPR और CRISPR में एक दिलचस्प अंतर दिखाई दिया। CRISPR से जुड़े कई प्रोटीन लक्ष्य DNA को काटते हैं, जबकि अध्ययन किए गए VIPR प्रोटीन लक्ष्य के आसपास कसकर जुड़कर उसकी गतिविधि रोक सकते हैं। परिणाम दोनों स्थितियों में समान दिशा में जाता है—निशाना बनाया गया जीन काम करना बंद कर सकता है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह प्रणाली वायरसों के बीच प्रतिस्पर्धा का हथियार रही होगी।

एक ही कोशिका को कई वायरस संक्रमित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें उस कोशिका की आणविक मशीनरी पर कब्जे के लिए एक-दूसरे से मुकाबला करना पड़ता है। जिस वायरस के पास VIPR जैसी प्रणाली हो, वह प्रतिस्पर्धी वायरस के महत्वपूर्ण जीन को निष्क्रिय कर स्वयं बढ़त हासिल कर सकता है।

पीटर यून ने इसे सरल उदाहरण से समझाया है—VIPR को ऐसी ‘बंदूक’ की तरह समझा जा सकता है, जिसे वायरस एक-दूसरे पर तानते रहे होंगे।

चार अरब साल पुराना ‘वायरल युद्ध’

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि VIPR की उत्पत्ति पृथ्वी के जैविक इतिहास के अत्यंत शुरुआती दौर में हुई होगी। यह समय चार अरब वर्ष से भी पीछे तक जा सकता है, जब प्रारंभिक जीवों और वायरसों के बीच प्रतिस्पर्धा विकसित हो रही थी।

संभव है कि वायरसों ने एक-दूसरे के आनुवंशिक तंत्र को निष्क्रिय करने के लिए ऐसे जीन-टारगेटिंग अणु विकसित किए हों। बाद में किसी सूक्ष्मजीव ने वायरल आनुवंशिक सामग्री को अपने जीनोम में शामिल कर लिया और यही व्यवस्था धीरे-धीरे उसके लिए वायरसों के विरुद्ध रक्षा प्रणाली बन गई।

वायरल DNA का मेजबान जीव के जीनोम में शामिल हो जाना असामान्य घटना नहीं है। मानव जीनोम में भी प्राचीन वायरसों से आए आनुवंशिक अवशेष बड़ी मात्रा में मौजूद हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो CRISPR की कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है। संभव है कि बैक्टीरिया ने जिस हथियार से वायरसों को रोकना सीखा, उसका मूल आविष्कार स्वयं वायरसों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों से लड़ने के लिए किया हो।

क्या CRISPR का विकल्प बनेगा VIPR?

VIPR को लेकर वैज्ञानिक उत्साह का एक बड़ा कारण इसका छोटा आकार है। जीन-संपादन तकनीक में किसी प्रणाली को लक्ष्य कोशिका तक पहुंचाना बड़ी चुनौती होती है। अपेक्षाकृत छोटे आणविक उपकरणों को कोशिकाओं तक पहुंचाना आसान हो सकता है।

इसके अलावा VIPR अधिक प्रकार के आनुवंशिक अनुक्रमों को लक्ष्य बनाने में सक्षम दिखाई देता है। इससे भविष्य में जीनोम के बड़े हिस्से पर काम करने की संभावना खुल सकती है।

फिर भी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि VIPR शीघ्र ही CRISPR का विकल्प बन जाएगा। इसकी सुरक्षा, सटीकता, कोशिकाओं में प्रभावशीलता और अनचाहे आनुवंशिक प्रभावों की विस्तृत जांच करनी होगी। प्रयोगशाला में किसी प्राकृतिक प्रणाली का काम करना और उसे चिकित्सा में सुरक्षित जीन-संपादन उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना दो अलग-अलग चरण हैं।

इस खोज का तत्काल महत्व इससे भी बड़ा है। इसने वैज्ञानिकों के सामने संभावना रखी है कि वायरसों के अरबों वर्ष पुराने आपसी संघर्ष में ऐसे कई और आणविक हथियार विकसित हुए होंगे, जिन्हें विज्ञान ने अभी खोजा ही नहीं है।

कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के वायरोलॉजिस्ट राफेल पिनिला-रेडोंडो का मानना है कि यदि VIPR ही ऐसी अंतिम अप्रत्याशित जीन-टारगेटिंग प्रणाली निकली तो यह आश्चर्य की बात होगी।

CRISPR पर काम के लिए 2020 का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाली जेनिफर डौडना के लिए इस खोज में एक दिलचस्प संयोग भी छिपा है। जिस प्रणाली को जीन-संपादन के अत्यंत प्राचीन पूर्वजों में गिना जा सकता है, उससे जुड़ा वायरस वर्षों से उनकी प्रयोगशाला के फ्रीजर में पड़ा था।

VIPR की खोज इसीलिए केवल अगली संभावित जीन-एडिटिंग तकनीक की कहानी नहीं है। यह इस बात की भी याद दिलाती है कि पृथ्वी पर अरबों वर्षों से चल रही सूक्ष्म जैविक प्रतिस्पर्धा के भीतर विज्ञान और चिकित्सा के कितने उपयोगी औजार अभी छिपे हो सकते हैं।

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