चुनाव आयोग में मतभेद : सवाल व्यक्ति का नहीं, संवैधानिक निष्पक्षता का है
This article examines reported differences within India’s Election Commission over its decision-making process. Two Election Commissioners reportedly raised written objections concerning electoral rolls, voter registration, data access and the Special Intensive Revision process. While the Commission maintains that final decisions were unanimous, the controversy raises questions about institutional procedures. Drawing on Article 324, the 2023 law governing the Commission and the Supreme Court’s T.N. Seshan judgment, the article emphasizes that the Chief Election Commissioner is “first among equals” and collective decision-making is fundamental. Its central argument is that electoral integrity requires impartiality, transparency and public confidence in constitutional institutions.

-जयसिंह रावत-
देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर सामने आए मतभेदों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 अवसरों पर ऐसे निर्णयों और आदेशों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी या अनुमोदन के बिना लिए गए। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाता आंकड़ों तक पहुंच और अपील जैसे संवेदनशील विषय शामिल हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं तथा पिछले एक वर्ष में पूर्ण आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं। इसलिए मूल प्रश्न मतभिन्नता का नहीं, बल्कि यह है कि उसका निस्तारण संविधान और कानून में निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार हुआ या नहीं।
किसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में मतभिन्नता अस्वाभाविक नहीं है। स्वतंत्र रूप से राय रखने वाले सदस्य उसकी कमजोरी नहीं, मजबूती भी हो सकते हैं। लेकिन मामला तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब तीन सदस्यीय आयोग के दो सदस्य दर्ज करें कि कुछ महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी अथवा अपेक्षित अनुमोदन के बिना हुए। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” तक कहा गया। यह अखबार की जांच में सामने आया दावा है और आयोग ने अपनी अलग व्याख्या दी है। इसलिए इसे न अंतिम निष्कर्ष माना जाना चाहिए, न सामान्य मतभिन्नता बताकर छोड़ देना उचित होगा।
यहीं चुनाव आयोग की संवैधानिक संरचना महत्वपूर्ण हो जाती है। संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी चुनाव आयोग में निहित है। बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त अध्यक्ष होते हैं, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्त उनके अधीनस्थ नहीं हैं। सामान्यतः मुख्य चुनाव आयुक्त की स्थिति “समानों में प्रथम” की है और निर्णय प्रक्रिया में अन्य आयुक्तों की भी वास्तविक भागीदारी है।
इस प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय 1995 के ऐतिहासिक टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में विस्तृत व्यवस्था दे चुका है। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था को वैध ठहराते हुए स्पष्ट किया कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त की राय ही अंतिम मानी जाए तो अन्य आयुक्तों की उपस्थिति व्यावहारिक रूप से अर्थहीन हो जाएगी। जहां सर्वसम्मति संभव न हो, वहां निर्णय बहुमत से होगा।
अब यह केवल न्यायिक व्याख्या नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और मतभेद की स्थिति में मामला बहुमत की राय के अनुसार तय होगा। इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त अध्यक्ष अवश्य हैं, लेकिन तीन सदस्यीय आयोग में अकेले उनकी राय स्वतः आयोग की राय नहीं हो सकती।
मौजूदा विवाद में यही सिद्धांत प्रासंगिक है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने आयोग के नाम से कुछ संचार अपेक्षित अनुमोदन के बिना जारी होने पर सवाल उठाए। नए मतदाताओं के पंजीकरण वाले प्रपत्र-6 में विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित प्रश्न जोड़े जाने पर भी आपत्ति हुई। रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने दर्ज किया कि वैधानिक प्रपत्र को निर्वाचन पंजीकरण नियमों में संशोधन किए बिना इस तरह नहीं बदला जा सकता। संधू ने बाद में इस बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए हटाने को कहा।
मतदाता सूची के आंकड़ों के केंद्रीकरण को लेकर भी प्रश्न उठे। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी जमीनी स्तर पर मतदाता सूची तैयार करने और उसमें परिवर्तन करने वाला वैधानिक अधिकारी है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने चिंता जताई कि मतदाता आंकड़ों पर राज्यों में मौजूद अधिकारियों की पहुंच कहीं सीमित तो नहीं हो रही और व्यवस्था आवश्यकता से अधिक केंद्रीकृत तो नहीं होती जा रही। सूचना-प्रौद्योगिकी संबंधी कार्य-विभाजन पर दोनों आयुक्तों के अलग-अलग कैबिनेट सचिव को लिखने की बात भी सामने आई है।
इन सबके बीच आयोग का पक्ष उतनी ही स्पष्टता से दर्ज होना चाहिए। आयोग के अनुसार किसी प्रस्ताव पर अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव अंतिम निर्णय से पहले की सामान्य विचार-विमर्श प्रक्रिया हैं। आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण सहित पिछले एक वर्ष के सभी अंतिम महत्वपूर्ण फैसले तीनों सदस्यों की सहमति से हुए।
यदि ऐसा है तो स्वाभाविक प्रश्न है कि प्रारंभिक गंभीर आपत्तियों और अंतिम सर्वसम्मति के बीच क्या प्रक्रिया अपनाई गई? क्या आपत्तियों के बाद प्रस्ताव बदले गए? क्या दोनों आयुक्तों की चिंताओं का समाधान किया गया? क्या विवादित विषयों पर पूर्ण आयोग ने पुनर्विचार किया? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक विश्वास को मजबूत कर सकते हैं।
दोनों आयुक्तों ने अपनी चिंताएं किस अधिकारी अथवा मंच तक पहुंचाईं, इस पर अलग बहस हो सकती है। शिकायत के लिए कैबिनेट सचिव उचित मंच थे या नहीं, यह विचार का विषय है। लेकिन मंच पर विवाद शिकायत के अस्तित्व को समाप्त नहीं करता। उसी तरह शिकायत का होना उसके प्रत्येक आरोप के सही सिद्ध होने का प्रमाण भी नहीं है। यही संतुलन इस विवाद को समझने में आवश्यक है।
चुनाव आयोग के भीतर मतभिन्नता को सीधे पक्षपात का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन दो सदस्यों की लगातार लिखित आपत्तियों को केवल प्रशासनिक असहमति मानकर उपेक्षित करना भी सार्वजनिक विश्वास के हित में नहीं होगा। बेहतर रास्ता यही है कि जिन निर्णयों पर सवाल उठे हैं, उनकी प्रक्रिया यथासंभव स्पष्ट हो।
चुनाव आयोग से निष्पक्षता की अपेक्षा कोई अतिरिक्त नैतिक आग्रह नहीं है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना उसके संवैधानिक अस्तित्व का आधार है। मतदाता सूची को शुद्ध रखना इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है। मृत, स्थानांतरित, दोहरे पंजीकरण वाले अथवा अन्यथा अपात्र नाम सूची में नहीं रहने चाहिए, लेकिन उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र नागरिक प्रशासनिक, प्रक्रियागत या तकनीकी कारणों से मताधिकार से वंचित न हो।
इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की रक्षा परस्पर विरोधी उद्देश्य नहीं हैं। सही नाम जोड़ना, गलत नाम हटाना और पात्र मतदाता को सूची में बनाए रखना—तीनों एक ही संवैधानिक दायित्व के हिस्से हैं। किसी भी पुनरीक्षण की सफलता केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रभावी अपील व्यवस्था से भी मापी जानी चाहिए।
चुनाव आयोग के लिए एक और कसौटी अत्यंत महत्वपूर्ण है—निष्पक्षता होनी ही नहीं चाहिए, दिखाई भी देनी चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति केवल कानूनी अधिकारों से नहीं, नागरिकों के विश्वास से आती है। चुनाव आयोग के लिए यह विश्वास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव परिणामों की व्यापक स्वीकार्यता अंततः प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसे से जुड़ी होती है।
आयोग से सवाल पूछना संस्था पर हमला नहीं है और आयोग का स्पष्टीकरण सामने रखना उसका बचाव करना नहीं है। लोकतंत्र में दोनों आवश्यक हैं। मीडिया का काम आरोप को फैसला बना देना नहीं, बल्कि दस्तावेज, कानून, संस्थागत जवाब और उपलब्ध तथ्य नागरिकों के सामने रखना है।
टी.एन. शेषन मामले की बुनियादी सीख आज भी प्रासंगिक है—संस्था व्यक्ति से बड़ी है। बहुसदस्यीय आयोग का अर्थ ही है कि निर्णय किसी एक पदाधिकारी की इच्छा के बजाय संस्थागत विचार-विमर्श से निकले।
अंततः यह बहस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से कहीं बड़ी है। पदाधिकारी आते-जाते हैं, सरकारें बदलती हैं और राजनीतिक दल सत्ता तथा विपक्ष की भूमिकाएं बदलते रहते हैं। स्थायी हैं संविधान, संवैधानिक संस्थाएं और नागरिक का मताधिकार।
हमारी प्रतिबद्धता किसी व्यक्ति, सरकार, विपक्ष या दल के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा विश्वसनीय चुनाव के प्रति होनी चाहिए। चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा इसी में है कि उसके निर्णय कानूनसम्मत सामूहिक प्रक्रिया से हों, मतभिन्नता को स्थान मिले और मतदाता को भरोसा रहे कि उसके मताधिकार की रक्षा करने वाली संस्था स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष है। लोकतंत्र में निष्पक्षता का होना जितना जरूरी है, उसका दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है।
====================================================
About the Author : Jay Singh Rawat is a senior Indian journalist, author and editor with nearly five decades of experience in journalism. He has held senior editorial positions with several newspapers and has written extensively on politics, governance, constitutional issues, history and the Himalayan region. He is also the author of several reference books. The views expressed in this article are solely those of the author and do not necessarily reflect the views of the admin, editorial team of this portal.

