पक्षी और पक्षपात …..!

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा
मैं पक्ष और पक्षपात का अर्थ इतना ही समझता हूं कि जब कोई व्यक्ति किसी एक के हित में खड़ा होकर दूसरे के हित को नुकसान पहुंचाता है, तो यही पक्ष और पक्षपात है। इस शब्द का यह अर्थ मेरे मन में उस दिन से कुछ अधिक गहराई से बैठा है, जब करीब डेढ़ दशक पहले मैंने मैसूर की एक कला दीर्घा में प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा का एक चित्र देखा था।
चित्र में रावण सीता का अपहरण कर रहा है और गृध्रराज जटायु उसका रास्ता रोक रहे हैं। रावण अपनी तलवार से जटायु के पंख काट देता है। लहूलुहान जटायु धरती पर गिर पड़ते हैं। उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक असहाय स्त्री के साथ हो रहे अन्याय का विरोध किया था। वे जानते थे कि सामने महाबली रावण है और उससे टकराने का परिणाम मृत्यु भी हो सकता है, फिर भी उन्होंने रास्ता रोकने का साहस किया।
मुझे उस चित्र में केवल रामायण का एक प्रसंग नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरी टिप्पणी दिखाई दी। एक पक्षी में इतना विवेक और साहस था कि वह एक अकेली स्त्री के साथ हो रहे अन्याय को देखकर चुप नहीं रह सका। उसने अपनी जान की परवाह नहीं की। दूसरी ओर मनुष्यों का समाज अन्याय को देखते हुए भी प्रायः चुप रह जाता है। शायद इसीलिए जटायु का प्रसंग केवल त्याग की कथा नहीं, मनुष्य के विवेक की कसौटी भी है।
रामचरितमानस में भी पक्षियों को केवल उड़ने वाले जीवों के रूप में नहीं देखा गया। तुलसीदास ने उन्हें ज्ञान, विवेक और संवाद की अद्भुत क्षमता प्रदान की है। रामकथा के महत्वपूर्ण वक्ता कोई मनुष्य नहीं, बल्कि काकभुशुंडी हैं और उनके श्रोता पक्षीराज गरुड़। इन दोनों पक्षियों के बीच होने वाला संवाद अपने भीतर एक गहरा संदेश समेटे हुए है।
सामान्यतः कहा जाता है कि पक्षी अपनी ही जाति के पक्षियों के साथ रहते और उड़ते हैं। अंग्रेजी में भी कहावत है—‘बर्ड्स ऑफ अ फेदर फ्लॉक टुगेदर।’ तुलसीदास चाहते तो काकभुशुंडी को कौवों के बीच कथा सुनाते दिखा सकते थे। आखिर ‘खग ही जाने खग की भाषा।’ लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
रामचरितमानस में शिव पार्वती को बताते हैं कि जब वे नील पर्वत पर पहुंचे तो उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। वटवृक्ष की छाया में काकभुशुंडी कथा कह रहे थे, लेकिन उनके श्रोता कौवे नहीं, निर्मल बुद्धि वाले हंस थे—
“सुनहिं सकल मति बिमल मराला।”
अर्थात हंस बड़ी तन्मयता से एक कौवे के मुख से कथा सुन रहे थे। यहां कौवा छोटा नहीं रह जाता और हंस अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में नहीं डूबता। ज्ञान किसके मुख से निकल रहा है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि ज्ञान में कितना सत्य और विवेक है।
इस प्रसंग में शिव का व्यवहार और भी रोचक है। वे स्वयं महान ज्ञानी हैं, रामकथा के मर्मज्ञ हैं, लेकिन काकभुशुंडी को कथा कहते देखकर यह नहीं सोचते कि मेरे रहते यह कौवा कथा कैसे कह सकता है! वे हंस का रूप धारण कर श्रोताओं के बीच बैठ जाते हैं और कथा सुनते हैं। बाद में पक्षीराज गरुड़ भी काकभुशुंडी से ज्ञान प्राप्त करने पहुंचते हैं।
यह प्रसंग आज के कथा-वाचकों, ज्ञानियों, बुद्धिजीवियों और सार्वजनिक जीवन के लोगों के लिए भी कम शिक्षाप्रद नहीं है। हमारे यहां अक्सर ज्ञान से अधिक अहंकार बड़ा हो जाता है। कुछ लोगों को यह स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि कोई दूसरा भी उनसे बेहतर बात कह सकता है। वे दूसरों को सुनने के बजाय स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ वक्ता और ज्ञानी सिद्ध करने में लगे रहते हैं। तुलसीदास के हंसों को ऐसी कोई परेशानी नहीं थी। वे कौवे के मुख से ज्ञान सुनने में अपनी तौहीन नहीं समझते थे।
यही अंतर शायद पक्षी और पक्षपात के बीच भी है। जटायु ने यह नहीं पूछा कि सीता किस जाति, कुल अथवा पक्ष की हैं। उन्होंने केवल इतना देखा कि एक स्त्री के साथ अन्याय हो रहा है। हंसों ने यह नहीं पूछा कि कथा कहने वाला उनकी बिरादरी का है या नहीं। उन्होंने केवल यह देखा कि उसके पास सुनने योग्य ज्ञान है। गरुड़ ने भी अपने पक्षीराज होने का अहंकार छोड़कर काकभुशुंडी के सामने श्रोता बनना स्वीकार किया।
लेकिन आज के जमाने में दृश्य कुछ उलटा दिखाई देता है। हमारे अनेक नेता भी पक्षियों की तरह जमीन पर कम और आसमान में अधिक उड़ते दिखाई देते हैं। फर्क इतना है कि रामकथा के पक्षी ऊंचाई पर उड़कर भी जमीन का अन्याय देख लेते थे, जबकि आज सत्ता की ऊंचाइयों पर उड़ते हुए बहुत से लोगों को जमीन पर खड़ा आदमी दिखाई ही नहीं देता।
राजनीति में भी अब अपने-अपने झुंड हैं। हर झुंड को अपनी ही बोली सबसे मधुर लगती है। अपने पक्ष का कौवा भी हंस दिखाई देता है और दूसरे पक्ष का हंस भी कौवा। अपने आदमी की गलती तर्क बन जाती है और दूसरे की वही गलती अपराध। अपने पक्ष की आवाज सत्य और दूसरे पक्ष की आवाज षड्यंत्र समझी जाने लगती है।
शायद यहीं से ‘पक्ष’ का ‘पक्षपात’ में रूपांतरण शुरू होता है।
जटायु हमें बताते हैं कि पक्ष लेना बुरा नहीं है—यदि वह न्याय का पक्ष हो। काकभुशुंडी और हंस बताते हैं कि किसी की जाति, पद, प्रतिष्ठा या बिरादरी देखकर ज्ञान का मूल्य तय नहीं होना चाहिए। असली प्रश्न यह नहीं है कि हम किसके पक्ष में हैं। असली प्रश्न यह है कि हम सत्य के पक्ष में हैं या केवल अपने पक्ष के सत्य में।
बाकी हमारे आज के राजनीतिक पक्षियों की कथा बहुत लंबी है। वे किस डाल पर बैठते हैं, कब डाल बदलते हैं, कब झुंड बदलते हैं और कब उड़ते-उड़ते विचारधारा तक बदल लेते हैं—यह कथा फिर कभी।
