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आस्था ने पूरी की नंदा देवी बड़ी जात, षड़यंत्र भी न डाल पाए बाधा

 यात्रा पीछे छोड़ गई कई बड़े सवाल: सरकारी सहयोग के बिना 20 दिन और करीब 280 किलोमीटर की कठिन यात्रा पूरी; अनुकूल मौसम को श्रद्धालुओं ने माना मां नंदा की कृपा

 


हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली, 24 सितम्बर। तमाम विवादों, आशंकाओं और सरकारी सहयोग के अभाव के बीच नंदा भक्तों की आस्था के सहारे चली श्री नंदा देवी बड़ी जात यात्रा-2026 बुधवार देर शाम नंदा सिद्धपीठ कुरूड़, नंदानगर (घाट) में शांतिपूर्वक और सकुशल सम्पन्न हो गई। करीब 280 किलोमीटर की इस कठिन धार्मिक यात्रा की समाप्ति के साथ देव डोलियां अपने निर्धारित स्थानों पर विराजमान हो गईं, लेकिन यात्रा अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनके जवाब आने वाले समय में सरकार, श्री नंदा देवी राजजात समिति और यात्रा से जुड़ी अन्य संस्थाओं से अपेक्षित रहेंगे।


सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस यात्रा को लेकर महीनों तक असमंजस, विरोध और व्यवस्थागत कठिनाइयों की चर्चा होती रही, वह आखिर हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी के साथ होमकुंड तक कैसे पहुंची और सकुशल सम्पन्न भी हो गई? बड़ी जात आयोजन समिति और यात्रा में शामिल श्रद्धालु इसे मां नंदा की कृपा और अपनी अटूट आस्था का परिणाम मानते हैं। विशेषकर यात्रा के बुग्याली और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश करने के बाद मौसम जिस तरह अनुकूल हुआ, उसे श्रद्धालु देवी की कृपा से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि यात्रा से पहले करीब दो सप्ताह तक मौसम प्रतिकूल बना रहा, लेकिन कठिन हिमालयी क्षेत्र में पहुंचते ही परिस्थितियां अपेक्षाकृत अनुकूल होती चली गईं।
राजजात से बड़ी जात तक कैसे बदली तस्वीर
वर्ष 2025 से जनवरी 2026 तक श्री नंदा देवी राजजात-2026 को लेकर विभिन्न स्तरों पर तैयारियों और चर्चाओं का दौर चला। इसे हिमालयी सचल महाकुंभ के रूप में आयोजित किए जाने की बातें भी सामने आईं। लेकिन जनवरी 2026 में सरकार और श्री नंदा देवी राजजात समिति ने इस वर्ष राजजात आयोजित नहीं करने का निर्णय लिया। इसके स्थान पर प्रतिवर्ष नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से वेदनी बुग्याल तक आयोजित होने वाली लोकजात के आयोजन का पक्ष सामने आया।
इस निर्णय से उन नंदा भक्तों में निराशा हुई जो 2026 में राजजात की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसके बाद एक वर्ग ने राजजात के स्थान पर पुराने प्रचलित नाम ‘श्री नंदा देवी बड़ी जात’ से यात्रा आयोजित करने की घोषणा कर दी। आयोजन समिति का कहना है कि 1987 से पहले भी इस यात्रा को बड़ी जात के नाम से जाना जाता था।
शुरुआत में इस घोषणा को बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी जात आयोजन समिति की तैयारियां आगे बढ़ीं, यात्रा को लेकर विवाद भी बढ़ता गया। परम्पराओं, यात्रा की वैधता, सुरक्षा, कठिन मार्ग और व्यवस्थाओं को लेकर अलग-अलग पक्ष सामने आए। राजजात समिति की ओर से परम्परागत व्यवस्थाओं से जुड़े सवाल उठाए गए, जबकि सरकार की ओर से दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में सुरक्षा और आवश्यक व्यवस्थाओं की कठिनाइयों का उल्लेख किया गया। दूसरी ओर बड़ी जात के आयोजक लगातार कहते रहे कि यात्रा देव आज्ञा और श्रद्धालुओं की इच्छा के अनुरूप होगी।
बारिश के बीच कुरूड़ से निकली थी यात्रा
पांच सितम्बर को जब भारी बारिश और प्रतिकूल मौसम के बीच नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से देव डोलियां, छंतोलियां और चौसिंगा खाडू यात्रा पर निकले तो यात्रा के उच्च हिमालयी क्षेत्र तक पहुंच पाने को लेकर स्वाभाविक आशंकाएं थीं। रास्ते कठिन थे और मौसम भी बड़ी चुनौती बना हुआ था।
लेकिन यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ी, परिस्थितियां बदलती गईं। वेदनी बुग्याल के बाद उच्च हिमालयी और निर्जन पड़ावों की ओर बढ़ते समय मौसम अपेक्षाकृत साफ और अनुकूल हो गया। श्रद्धालुओं ने इसे मां नंदा की कृपा माना। यात्रा कठिन पैदल मार्गों, नदी-नालों, गदेरों, बुग्यालों और उच्च हिमालयी क्षेत्रों को पार करते हुए अंततः होमकुंड पहुंची, जहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद वापसी यात्रा शुरू हुई।
आयोजन समिति के अनुसार यात्रा के दौरान सरकारी व्यवस्थाएं सीमित रहने के कारण स्वयंसेवकों को कई स्थानों पर रास्ते सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ी। समिति अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत और कुरूड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखबीर सिंह रौतेला के अनुसार शीला समुद्र से होमकुंड और आगे तातड़ा आदि पड़ावों की ओर जाने वाले मार्ग पर चंदनियाघाट तथा आसपास तीन अस्थायी लकड़ी के पुल बनाए गए, ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही सुरक्षित हो सके।
बीस दिनों की कठिन यात्रा के बाद जब देव डोलियां बुधवार को कुरूड़ लौटीं और अपने निर्धारित स्थानों पर विराजमान हुईं तो यात्रियों और आयोजकों में राहत और संतोष स्पष्ट दिखाई दिया। यात्रा समिति इसे अपनी संगठनात्मक सफलता से अधिक मां नंदा की इच्छा और श्रद्धालुओं की सामूहिक आस्था का परिणाम मान रही है।
अब सवाल सरकार और संस्थाओं के सामने
यात्रा सम्पन्न होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उन विवादों का है जो इसके आरम्भ होने से पहले और यात्रा के दौरान उठते रहे। बड़ी जात आयोजन समिति का आरोप है कि कुछ संस्थाएं शुरू से यात्रा के विरोध में थीं और इसे होमकुंड तक नहीं जाने देना चाहती थीं। संबंधित पक्षों की अपनी परम्परागत और व्यवस्थागत आपत्तियां रही हैं, लेकिन अब जबकि यात्रा सकुशल सम्पन्न हो चुकी है, उन आपत्तियों और आशंकाओं की नए सिरे से समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
यह सवाल भी बना हुआ है कि 2026 में प्रस्तावित राजजात को आगे बढ़ाने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया और बड़ी जात को लेकर सरकार तथा संबंधित संस्थाओं का आधिकारिक दृष्टिकोण क्या है। यात्रा समर्थकों का कहना है कि इस पूरे विवाद का स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सामने आना चाहिए, ताकि भविष्य में नंदा देवी की यात्राओं को लेकर इस तरह का टकराव पैदा न हो।
सरकार और विपक्ष की चुप्पी पर भी सवाल
श्री नंदा देवी बड़ी जात के शांतिपूर्वक सम्पन्न होने और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के सुरक्षित लौट आने के बाद भी राज्य सरकार की ओर से यात्रा पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आने को लेकर आयोजन से जुड़े लोगों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतनी लंबी और कठिन हिमालयी धार्मिक यात्रा के सम्पन्न होने के बाद सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से भी यात्रा की व्यवस्थाओं और उससे जुड़े विवादों पर कोई प्रमुख औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। हालांकि आयोजन समिति अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत के अनुसार थराली विधायक भूपाल राम टम्टा ने यात्रा के सकुशल कुरूड़ पहुंचने पर फोन कर समिति को बधाई दी। पूर्व विधायक डॉ. जीत राम देवी की डोली के कुरूड़ मंदिर में विराजमान होने के अवसर पर स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने भी सफल आयोजन के लिए समिति को बधाई दी।
चार दशकों में इतना अनुकूल मौसम नहीं देखा’
श्री नंदा देवी बड़ी जात आयोजन समिति के अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत और कुरूड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखबीर सिंह रौतेला ने यात्रा के शांतिपूर्वक सम्पन्न होने को मां नंदा भगवती की कृपा बताया। उनका कहना है कि अनेक कठिनाइयों और संस्थागत सहयोग के अभाव के बावजूद यात्रा का होमकुंड पहुंचना और सभी यात्रियों का सुरक्षित लौटना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
दोनों पदाधिकारियों का दावा है कि पिछले चार दशकों में बड़ी जात के दौरान इतना अनुकूल मौसम देखने को नहीं मिला। उन्होंने यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं, पुजारियों, स्वयंसेवकों और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग के लिए आभार जताया।
आयोजन समिति ने यह दावा भी किया कि इस बार बड़ी जात में 2014 की श्री नंदा देवी राजजात की तुलना में अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। हालांकि दोनों यात्राओं में शामिल यात्रियों की तुलनात्मक आधिकारिक संख्या उपलब्ध होने पर ही इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि संभव होगी।
यात्रा तो सम्पन्न हो गई है, लेकिन इससे उठे सवाल अभी समाप्त नहीं हुए हैं। वर्ष 2026 में राजजात न कराने का निर्णय क्यों लिया गया, बड़ी जात को लेकर अलग-अलग संस्थाओं के बीच इतना मतभेद क्यों पैदा हुआ और भविष्य में नंदा देवी की इस महान हिमालयी धार्मिक परम्परा को विवाद से बचाने के लिए क्या व्यवस्था होगी—इन प्रश्नों के उत्तर अभी बाकी हैं। आस्था ने इस बार श्रद्धालुओं को होमकुंड तक पहुंचा दिया, लेकिन अब जिम्मेदारी संबंधित संस्थाओं की है कि वे तथ्यों और परम्पराओं के आधार पर इन सवालों का जवाब दें।

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