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चारधाम में 798 टन कचरा: आंकड़ों में सफाई, धरातल पर हिमालय के लिए बढ़ती चुनौती

 

देहरादून, 2 अक्टूबर। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ कचरे का दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मौजूदा यात्रा सीजन में बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री क्षेत्र से करीब 798 टन कचरा एकत्र किया जा चुका है। सरकार इसे बेहतर सफाई और कचरा प्रबंधन का परिणाम बता रही है, लेकिन स्थानीय लोगों, यात्रियों और उपलब्ध आंकड़ों की पड़ताल से दूसरा पहलू भी सामने आता है—कचरा जितनी तेजी से एकत्र हो रहा है, उतनी ही तेजी से पैदा भी हो रहा है और इसका एक हिस्सा दुर्गम ढलानों, नदी-नालों तथा यात्रा मार्गों के आसपास छूट रहा है।

चारों धामों में सबसे अधिक 393 टन कचरा बदरीनाथ में एकत्र किया गया है। इसमें 161 टन सूखा कचरा है, जबकि लगभग 24 टन प्लास्टिक अलग किया गया। पानी की बोतलें प्लास्टिक कचरे का बड़ा हिस्सा हैं। बदरीनाथ नगर पंचायत कचरे को मौके पर कॉम्पैक्ट कर रही है और अलग किए गए प्लास्टिक को आगे निस्तारण तथा नीलामी के लिए तैयार किया जा रहा है।

केदारनाथ के आंकड़े ज्यादा चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। सरकारी आंकड़ों में धाम से 32 टन ठोस कचरा एकत्र होने की बात कही गई है, जिसमें करीब 20 टन प्लास्टिक है। इसके अतिरिक्त केदारनाथ पैदल मार्ग की सफाई संभाल रही सुलभ इंटरनेशनल ने अलग से लगभग 270 टन ठोस कचरा एकत्र किया है, जिसमें से 6.5 टन प्लास्टिक पुनर्चक्रण के लिए भेजा गया। अलग-अलग एजेंसियों द्वारा संग्रह के कारण इन आंकड़ों को सीधे जोड़कर कुल कचरा उत्पादन मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि केदारनाथ क्षेत्र पर कचरे का दबाव काफी बड़ा है।

सूचना के अधिकार से सामने आए आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। केदारनाथ में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 50.30 मीट्रिक टन सूखा और गीला कचरा पैदा होने की जानकारी दी गई है। इसके मुकाबले पूरे 2025 यात्रा सीजन में 21.40 टन, 2024 में 26.10 टन और 2023 में 32.58 टन कचरा दर्ज किया गया था। यानी 2026 के शुरुआती पांच महीनों का आंकड़ा पिछले तीन वर्षों में किसी भी पूरे सीजन के आंकड़े से अधिक है। अलग-अलग आंकड़ों का दायरा और कचरे की श्रेणियां भिन्न होने के कारण उनमें दिखाई देने वाले अंतर को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

गंगोत्री में अब तक करीब 98 टन कचरा एकत्र हुआ है। यहां 22 टन प्लास्टिक के पुनर्चक्रण से लगभग 55 हजार रुपये की आय हुई और शेष जैविक कचरे से करीब 2.5 टन खाद तैयार की गई। यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण है कि कचरे को केवल उठाने के बजाय उसे संसाधन में बदलने की कोशिश भी की जा रही है।

यमुनोत्री क्षेत्र में करीब 4.85 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र कर निस्तारित किया गया। इसमें लगभग 1,790 किलो जानकीचट्टी-दामटा क्षेत्र और 3,060 किलो जानकीचट्टी-खरसाली क्षेत्र से आया। लेकिन स्थानीय स्तर पर चिंता यात्रा मार्ग के उन पड़ावों को लेकर भी है जो नगर निकायों की सीमा से बाहर हैं। वहां नियमित संग्रह व्यवस्था कमजोर होने पर कचरा पहाड़ी ढलानों और आसपास के क्षेत्रों में जमा होने का खतरा रहता है।
प्लास्टिक रोकने के लिए चारधाम में डिजिटल जमा-वापसी व्यवस्था एक महत्वपूर्ण प्रयोग बनकर उभरी है। 19 अप्रैल से 26 अगस्त तक दस लाख से अधिक क्यूआर कोड लगे बोतल और अन्य कंटेनर वापस किए गए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बदरीनाथ में 3.04 लाख से अधिक, केदारनाथ में 2.90 लाख, गंगोत्री में 2.72 लाख और यमुनोत्री में करीब 1.49 लाख कंटेनर वापस आए। योजना में चिन्हित पैकेजिंग पर जमा राशि लेकर उसे लौटाने पर पैसा वापस करने की व्यवस्था है।

इसके बावजूद समस्या केवल इतना कचरा उठाने की नहीं है। ऊंचे हिमालय में प्लास्टिक की एक बोतल या रैपर मैदानी शहर के मुकाबले कहीं अधिक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन सकता है। दुर्गम भूगोल के कारण कचरे को नीचे लाना महंगा और कठिन है। ढलान पर फेंका गया कचरा वर्षा और बर्फ पिघलने के साथ नदी-नालों तक पहुंच सकता है। यात्रा मार्गों पर कपड़े, प्लास्टिक पैकेजिंग और पानी की बोतलें छोड़ने की शिकायतें बताती हैं कि संग्रह व्यवस्था मजबूत करने के साथ कचरा पैदा होने से पहले उसे नियंत्रित करना भी जरूरी है।
यह मुद्दा अब केवल स्थानीय निकायों की सफाई व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थस्थलों और यात्रा मार्गों की वहन क्षमता का सवाल भी विचाराधीन है। केदारनाथ, हेमकुंड साहिब, गंगोत्री और यमुनोत्री मार्गों की वैज्ञानिक वहन-क्षमता संबंधी अध्ययन रिपोर्ट अधिकरण ने सीलबंद रूप में रिकॉर्ड पर ली है और राज्य सरकार से मंत्रिमंडल के निर्णय की जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर निर्धारित है। प्रकरण में प्लास्टिक, मानव अपशिष्ट तथा घोड़े-खच्चरों से पैदा होने वाले कचरे के अव्यवस्थित निस्तारण जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं।

इसलिए 798 टन कचरे का संग्रह अपने आप में सफलता और चेतावनी—दोनों का संकेत है। इतनी बड़ी मात्रा में कचरे का उठाया जाना बताता है कि सफाई तंत्र काम कर रहा है, लेकिन इतनी मात्रा में कचरे का पैदा होना हिमालय पर बढ़ते मानवीय दबाव का भी पैमाना है। चारधाम में स्थायी समाधान केवल अधिक सफाईकर्मी और अधिक कूड़ा वाहन नहीं हो सकते। स्रोत पर कचरा कम करना, प्रत्येक यात्रा पड़ाव पर संग्रह व्यवस्था, प्लास्टिक की वापसी को अनिवार्य और प्रभावी बनाना, जैविक कचरे का स्थानीय उपचार और तीर्थस्थलों की वास्तविक वहन क्षमता के अनुरूप प्रबंधन—इन सभी को एक साथ लागू करना होगा। तभी चारधाम में सफाई सरकारी आंकड़ों से आगे बढ़कर पहाड़, नदियों और यात्रा मार्गों पर भी दिखाई देगी।

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