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चुनाव आयोग पर न्यायिक कसौटी: सवाल केवल मतदाता सूची का नहीं,  विश्वसनीयता का भी

 

– उषा रावत
भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की पूरी संवैधानिक व्यवस्था जिस संस्था पर टिकी है, उस निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े सवाल अब सर्वोच्च न्यायालय के सामने पहुंच रहे हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं रहा। इसके केंद्र में एक अधिक बुनियादी संवैधानिक प्रश्न आ गया है—तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में फैसले वास्तव में कैसे लिए जाने चाहिए और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों का संतुलन क्या है? सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कथित एकतरफा निर्णयों से संबंधित याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। याचिका के आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं।

आयोग के भीतर मतभेद क्यों महत्वपूर्ण
विवाद की पृष्ठभूमि में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की वह पड़ताल है, जिसके अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ कदमों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने, मतदाता सूची के आंकड़ों के प्रबंधन, प्रपत्र-6 से जुड़े अतिरिक्त घोषणा-पत्र तथा एसआईआर की कुछ प्रक्रियाओं से संबंधित मुद्दे शामिल बताए गए हैं। आयोग का पक्ष इससे अलग है। उसका कहना है कि एसआईआर संबंधी अंतिम निर्णय तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए और अधिकारियों या प्रक्रिया से संबंधित चिंताओं को अंतिम निर्णयों से असहमति नहीं माना जाना चाहिए। इसलिए यहां आरोप और आयोग के स्पष्टीकरण, दोनों को साथ रखकर देखना जरूरी है।

इस विवाद का संवैधानिक महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त तीन सदस्यीय आयोग के अकेले निर्णयकर्ता नहीं हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में व्यवस्था है कि आयोग यथासंभव सर्वसम्मति से काम करेगा और मतभेद होने पर बहुमत की राय प्रभावी होगी। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका इसी आधार पर सवाल उठा रही है कि यदि दो आयुक्तों ने किसी निर्णय पर आपत्ति की थी तो अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से और किस बहुमत से हुआ।
एसआईआर में तकनीक और मताधिकार का सवाल
एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूचियों को शुद्ध और अद्यतन करना है। गलत, मृत, स्थानांतरित अथवा दोहरे नाम हटाना चुनाव की शुचिता के लिए आवश्यक है। लेकिन यही प्रक्रिया तब गंभीर बन जाती है जब किसी वास्तविक मतदाता का नाम प्रक्रियागत या तकनीकी कारणों से छूट जाए। निर्वाचन आयोग ने देशव्यापी चरणों में एसआईआर को बड़े पैमाने पर लागू किया है; एक चरण में ही 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों के 36.73 करोड़ मतदाताओं तक लगभग 3.94 लाख बूथ स्तरीय अधिकारियों के घर-घर पहुंचने की योजना बनाई गई थी।

दिल्ली में इसी प्रक्रिया के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने उन नोटिसों पर चिंता जताई जिन्हें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर जारी किया गया था। अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में नोटिस लगभग यांत्रिक या मशीन-जनित दिखाई देते हैं और आयोग को अतिरिक्त जांच-छंटाई की जरूरत पर विचार करना चाहिए। यह टिप्पणी तकनीक के उपयोग के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की याद दिलाती है कि तकनीक नागरिक के अधिकार की सहायक होनी चाहिए, उसके प्रयोग में नई बाधा नहीं।

आयोग ने भी बदली प्रक्रिया
महत्वपूर्ण बात यह है कि विवाद सामने आने के बाद आयोग ने 26 सितंबर को कई प्रक्रियागत सुधार घोषित किए। आयोग के प्रेस नोट के अनुसार नोटिस पाने वाले मतदाताओं से दस्तावेज लेने के लिए बूथ स्तरीय अधिकारी घर जाएंगे और उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। सामान्यतः मतदाता को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के कार्यालय बुलाने की आवश्यकता नहीं होगी; अपवाद की स्थिति में सुनवाई ऑनलाइन की जा सकेगी। बेघर, मजदूर और गरीब नागरिकों के लिए सहायता केंद्र लगाने तथा ईसीआईनेट की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में समिति बनाने का भी निर्णय हुआ, जिसमें आईआईटी या आईआईआईटी के स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा।

प्रपत्र-6 से जुड़े अतिरिक्त घोषणा-पत्र पर भी कानूनी विवाद बना हुआ है। आयोग का कहना है कि एसआईआर के लिए संलग्न घोषणा-पत्र को सर्वोच्च न्यायालय से मान्यता मिल चुकी है। दूसरी ओर कानूनी चुनौती में प्रश्न यह उठाया गया है कि बिहार एसआईआर पर मई 2026 के फैसले में आयोग को अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की शक्ति स्वीकार किए जाने का अर्थ क्या बाद में लागू किए गए प्रत्येक नए घोषणा-पत्र की स्वतः न्यायिक स्वीकृति माना जा सकता है? यह सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है, जिस पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय से ही निकलेगा।

असहमति कमजोरी नहीं, संस्थागत सुरक्षा भी
लोकतांत्रिक संस्थाओं में आंतरिक मतभेद अपने आप में असामान्य या अनुचित नहीं हैं। तीन सदस्यीय आयोग बनाने का उद्देश्य ही विचार-विमर्श और सामूहिक निर्णय को मजबूत करना है। इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आयुक्तों के बीच मतभेद क्यों हुए, बल्कि यह कि मतभेद दर्ज होने पर उनका निपटारा निर्धारित प्रक्रिया से हुआ या नहीं। यदि अंतिम निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से हुआ है तो उसका स्पष्ट अभिलेख स्वयं आयोग की विश्वसनीयता बढ़ाता है।
इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई का महत्व किसी एक मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी एक एसआईआर से कहीं आगे जाता है। अदालत के सामने एक ओर मतदाता सूची की शुद्धता और आयोग के संवैधानिक अधिकार हैं, तो दूसरी ओर किसी पात्र नागरिक को प्रक्रियागत अथवा तकनीकी त्रुटि के कारण मताधिकार से वंचित न होने देने की जिम्मेदारी।
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उतनी ही उसकी निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता भी। लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा केवल इस बात से नहीं बनती कि उसे व्यापक अधिकार प्राप्त हैं; वह इस विश्वास से बनती है कि उन अधिकारों का प्रयोग नियमबद्ध, सामूहिक, पारदर्शी और नागरिक के मताधिकार की रक्षा करते हुए किया जा रहा है। वर्तमान न्यायिक परीक्षण इसलिए चुनाव आयोग के अधिकारों को सीमित करने से अधिक उन संवैधानिक सीमाओं और प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने का अवसर है, जिनसे उसकी स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वसनीयता दोनों मजबूत हो सकती हैं।

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