1.2 करोड़ साल पुराना रहस्य: हिमालय की वादियों में मिला प्राचीन फंगस का जीवाश्म

By- Jyoti Rawat
हिमाचल प्रदेश के मध्य शिवालिक क्षेत्र से मिला 1.2 करोड़ साल पुराना एक जीवाश्म वैज्ञानिकों के लिए किसी टाइम मशीन से कम साबित नहीं हुआ है। इस खोज ने हमें यह देखने का एक दुर्लभ मौका दिया है कि लाखों साल पहले हिमालय का पर्यावरण और वहां के घने जंगल कैसे हुआ करते थे। हाल ही में पश्चिम बंगाल के सिद्धो–कान्हो–बिरसा विश्वविद्यालय के शोधकर्ता सम्पा कुंडू और महासिन अली खान ने एक प्राचीन पत्ती के जीवाश्म पर एक बिल्कुल नई और अज्ञात फंगस (कवक) प्रजाति की खोज की है। विज्ञान जगत में इस नई प्रजाति को ‘विज़ेलोप्सिडाइट्स मियोसेनिकस‘ (Vizellopsidites miocenicus) नाम दिया गया है।
शिवालिक की चट्टानों में छिपी खोज
हिमाचल प्रदेश के शिवालिक पहाड़ सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने भीतर दबे भूगर्भीय रहस्यों के लिए भी विश्व विख्यात हैं। जीवाश्म विज्ञानियों द्वारा की गई यह नवीनतम खोज लेट मियोसीन (Late Miocene) युग की है, जिसका अर्थ है कि यह जीवाश्म करीब 80 लाख से 1.2 करोड़ साल पुराना है। शोधकर्ताओं के दल को खुदाई के दौरान एक प्राचीन डिकोट (dicot) पौधे की पत्ती का जीवाश्म मिला था, जो पहली नज़र में एक साधारण पत्ती जैसा ही प्रतीत हो रहा था। लेकिन जब इस पत्ती का गहराई से अध्ययन किया गया, तो इसके भीतर प्राचीन जीवन के अनछुए साक्ष्य सामने आने लगे।
सूक्ष्मदर्शी से खुला एक नया रहस्य
जब शोधकर्ताओं ने इस पत्ती की ऊपरी परत या क्यूटिकल का सूक्ष्मदर्शी की मदद से रासायनिक अध्ययन किया, तो उन्हें इसके ऊपर एक गहरे भूरे रंग की जालीदार संरचना दिखाई दी। यह जालीदार संरचना वास्तव में एक जीवाश्म फंगस थी जो लाखों सालों से उसी पत्ती पर सुरक्षित थी। सूक्ष्म अध्ययन में फंगस के धागे (hyphae) जालीदार पैटर्न में फैले हुए मिले, जिनमें स्पष्ट आंतरिक विभाजन मौजूद था। इसके अलावा, इस आवरण के नीचे फंगस के गोल प्रजनन अंग (sporocarps) भी बेहद अच्छी तरह से संरक्षित अवस्था में पाए गए। आधुनिक कवकों से इसकी काफी समानता थी, लेकिन इसके अनोखे आकार और बड़ी कोशिकाओं को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इसे एक बिल्कुल नई प्रजाति घोषित किया।
प्राचीन जलवायु और जीवन के अद्भुत प्रमाण
यह खोज विज्ञान के दृष्टिकोण से कई मायनों में ऐतिहासिक है। जीवाश्म विज्ञान में अमूमन किसी पौधे या जीव का ढांचा अलग–अलग मिलता है, लेकिन इस खोज में फंगस अपनी मेजबान पत्ती के ऊपर ठीक उसी अवस्था में चिपका हुआ मिला, जिस अवस्था में वह लाखों साल पहले जीवित था। इसे ‘इन सीटू‘ (in situ) प्रिजर्वेशन कहा जाता है, जो प्राचीन इकोसिस्टम में जीवों के एक–दूसरे पर निर्भर होने का सीधा प्रमाण है।
इसके साथ ही, यह जीवाश्म प्राचीन हिमालय के मौसम का भी बड़ा खुलासा करता है। आज हम हिमाचल की जिन ठंडी वादियों को देखते हैं, लाखों साल पहले उनका स्वरूप ऐसा नहीं था। इस फंगस का वहां पनपना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मियोसीन युग में हिमालय का यह क्षेत्र बेहद गर्म और नम हुआ करता था। यहाँ घने उष्णकटिबंधीय जंगल फैले हुए थे जो इस तरह के परजीवियों के पनपने के लिए एकदम सही वातावरण प्रदान करते थे।
पृथ्वी के इतिहास का एक नया पन्ना
न्यूज़ीलैंड जर्नल ऑफ़ बॉटनी (New Zealand Journal of Botany) में प्रकाशित यह अध्ययन फंगस के क्रमिक विकास (evolution) को समझने की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। यह जीवाश्म बताता है कि आज के आधुनिक फंगस अपने प्राचीन पूर्वजों से कैसे विकसित हुए और उन्होंने समय के साथ बदलते पर्यावरण में खुद को कैसे ढाला। हिमाचल प्रदेश के शिवालिक तलछटों से मिली यह खोज महज एक सूखी पत्ती का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक 1.2 करोड़ साल पुरानी जीवंत तस्वीर है। यह हमें याद दिलाती है कि हिमालय की विशाल चट्टानों के नीचे अनगिनत प्राचीन जंगल, लुप्त हो चुकी प्रजातियां और पृथ्वी के बदलते मौसम का एक पूरा इतिहास दफन है।

