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हिमालयी झीलों का जलजला: क्या करोड़ों की योजनाएं रोक पाएंगी तबाही?

 

AS CLIMATE CHANGE ACCELERATES GLACIAL MELTING, THE HIMALAYAS FACE INCREASING THREATS FROM GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS (GLOFS). TO MITIGATE THIS, INDIA HAS INSTALLED ITS FIRST SENSOR-BASED EARLY WARNING SYSTEM AT VASUNDHARA TAL IN UTTARAKHAND, SITUATED AT 4,800 METERS. THE SYSTEM UTILIZES SATELLITE COMMUNICATION AND SOLAR POWER TO CONTINUOUSLY MONITOR LAKE LEVELS, WEATHER, AND SEISMIC ACTIVITY, SENDING REAL-TIME ALERTS TO AUTHORITIES. WHILE THIS TECHNOLOGICAL INTERVENTION—PART OF A BROADER NATIONAL INITIATIVE—IS A CRUCIAL MILESTONE, THE ARTICLE EMPHASIZES THAT ITS ULTIMATE SUCCESS DEPENDS NOT JUST ON DATA COLLECTION, BUT ON RAPIDLY TRANSMITTING THESE WARNINGS TO VULNERABLE DOWNSTREAM COMMUNITIES TO SAVE LIVES.–Admin.

 

 

-जयसिंह रावत

हिमालय की बर्फीली ऊंचाइयों पर स्थित झीलें जितनी सुंदर और शांत दिखाई देती हैं, उतनी ही संवेदनशील भी हैं। हजारों वर्षों से हिमनदों, चट्टानों और प्राकृतिक अवरोधों के बीच संचित पानी कभी-कभी अचानक विनाशकारी बाढ़ का रूप ले सकता है। जलवायु परिवर्तन और तेजी से पीछे हटते हिमनदों ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 4,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वसुंधरा ताल में पहली सेंसर आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना हिमालयी आपदा प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन यह उपलब्धि एक बुनियादी सवाल भी उठाती है—क्या हिमालय की झीलों पर वैज्ञानिक पहरा लग जाने से नीचे बसी आबादी सुरक्षित हो जाएगी?

वसुंधरा ताल से शुरू हुई नई पहल

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने उत्तराखंड की 13 हिमनद झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिह्नित किया है। इनमें पांच अत्यधिक जोखिम वाली बताई गई हैं। वसुंधरा ताल भी इन्हीं पांच में शामिल है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों ने यहां आधुनिक निगरानी उपकरण स्थापित किए हैं।

वैज्ञानिक दल के प्रमुख डी.पी. कानूनगो के अनुसार वसुंधरा ताल लगभग 900 मीटर लंबी, 600 मीटर चौड़ी और 38.5 मीटर गहरी है। पूर्ववर्ती अध्ययनों की तुलना में फिलहाल इसके आकार में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं मिला है। हालांकि केवल आकार स्थिर रहने से किसी झील को जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता।

नई प्रणाली झील के जलस्तर, हिम संचय, वर्षा, तापमान, वायुदाब, हवा की गति और दिशा के साथ जमीन के कंपन तथा ढलानों की हलचल पर नजर रखेगी। उपकरण हर दो घंटे में आंकड़े रुड़की और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेजेंगे। आपात स्थिति में तत्काल सूचना प्रसारित करने की क्षमता भी है। दुर्गम क्षेत्र में संचार के लिए इरिडियम उपग्रह प्रणाली तथा बिजली के लिए सौर ऊर्जा और लगभग दस दिन की बैटरी सहायता उपलब्ध कराई गई है।

हिमालय में क्यों बढ़ रहा है खतरा?

हिमालय को एशिया का जलस्तंभ कहा जाता है। यहां के हिमनद गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी प्रणालियों के महत्वपूर्ण जलस्रोत हैं। लेकिन बढ़ते तापमान के कारण अनेक हिमनद पीछे हट रहे हैं। उनके पीछे छूटे गड्ढों और हिमोढ़ों के प्राकृतिक अवरोधों में पानी जमा होकर नई झीलें बनाता है। पुरानी झीलों का विस्तार भी हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) की 2023 की हिंदूकुश हिमालय संबंधी रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर भी इस पर्वतीय क्षेत्र के हिमनद वर्ष 2100 तक अपनी वर्तमान बर्फ का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खो सकते हैं। अधिक तापमान वृद्धि की स्थिति में क्षति कहीं अधिक होगी।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के उपग्रह अध्ययनों ने भी हिमालयी हिमनद झीलों के विस्तार की प्रवृत्ति दर्ज की है। इसलिए हिमनदों का सिकुड़ना केवल भविष्य में जल उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि वर्तमान में आकस्मिक बाढ़ और पर्वतीय बस्तियों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

केदारनाथ से सिक्किम तक आपदाओं की चेतावनी

जून 2013 की केदारनाथ आपदा ने हिमालयी झीलों और अत्यधिक वर्षा के सम्मिलित खतरे को उजागर किया। चोराबाड़ी ताल से पानी के अचानक निकलने, अतिवृष्टि और भारी मलबा प्रवाह ने मंदाकिनी घाटी में विनाश बढ़ाया। अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से अचानक पानी निकलने पर तीस्ता घाटी में व्यापक तबाही हुई। जलविद्युत परियोजनाएं, सड़कें, पुल और बस्तियां प्रभावित हुईं।

फरवरी 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा आपदा भी महत्वपूर्ण सबक है, हालांकि उसका प्रमुख कारण हिमनद झील का फटना नहीं, बल्कि ऊंचाई से चट्टान और हिमखंड का विशाल हिस्सा टूटकर गिरना था। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि हिमालय में आपदाओं के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके विनाशकारी प्रभाव नदी घाटियों में केंद्रित होते हैं।

उपग्रहों ने उजागर की झीलों की बढ़ती संख्या और विस्तार की चुनौती

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अप्रैल 2024 में महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किए थे। वर्ष 1984 से 2023 तक के उपग्रह चित्रों के अध्ययन में हिमालयी नदी घाटियों की 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों में से 676 के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि मिली। इनमें 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो गया था। विस्तार वाली 130 झीलें भारतीय सीमा में स्थित थीं। ये आंकड़े पूरे अध्ययन क्षेत्र के हैं, केवल उत्तराखंड के नहीं।

आईसीआईएमओडी की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में 2011 से 2020 के दौरान हिमनदों के क्षरण की गति पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक रही। यह प्रवृत्ति बताती है कि हिमालय की बदलती परिस्थितियों को समझने के लिए नियमित वैज्ञानिक निगरानी अब अनिवार्य हो चुकी है।

चेतावनी मिलेगी, लेकिन बचाव कैसे होगा?

वसुंधरा ताल में उपकरण स्थापित करना पहला कदम है। असली चुनौती चेतावनी को प्रभावी कार्रवाई में बदलने की है। वैज्ञानिकों को खतरे का संकेत मिलने के बाद सूचना कितनी जल्दी प्रशासन और संभावित प्रभावित बस्तियों तक पहुंचेगी? क्या गांवों में सायरन, सुरक्षित निकासी मार्ग और आपात अभ्यास की व्यवस्था है? क्या संभावित बाढ़ के प्रवाह क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार किया गया है?

प्रत्येक हिमनद झील समान रूप से खतरनाक नहीं होती। जोखिम उसके आकार, गहराई, प्राकृतिक बांध की मजबूती, आसपास की ढलानों और नीचे स्थित आबादी पर निर्भर करता है। अचानक हिमस्खलन से झील में बड़ी लहर उठ सकती है और पानी प्राकृतिक अवरोध पार कर सकता है। ऐसी स्थिति में चेतावनी के लिए बहुत कम समय मिलना भी संभव है। इसलिए सेंसरों के साथ उपग्रह निगरानी, स्थल सर्वेक्षण और बाढ़ प्रवाह का पूर्वानुमान भी जरूरी है।

तीस करोड़ की योजना और जवाबदेही

केंद्र सरकार ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के लिए हिमनद झील विस्फोट बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण की 150 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की है। इसमें उत्तराखंड के लिए 30 करोड़ रुपये निर्धारित हैं, जिनमें 27 करोड़ केंद्र और तीन करोड़ राज्य का हिस्सा है।

अब सवाल है कि राज्य की शेष जोखिम वाली झीलों पर निगरानी व्यवस्था कब स्थापित होगी। उपकरणों का रखरखाव कौन करेगा और चेतावनी मिलने पर कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी? दुर्गम हिमालय में उपकरण स्थापित करना कठिन है, लेकिन उन्हें वर्षों तक चालू रखना उससे भी बड़ी चुनौती है।

हिमालय की सुरक्षा केवल वैज्ञानिक संस्थानों का विषय नहीं है। इसमें आपदा प्रबंधन, जलविद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण, स्थानीय प्रशासन और ग्राम समुदायों की साझा जिम्मेदारी है। नदी घाटियों में विकास योजनाओं का निर्धारण संभावित बाढ़ के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर होना चाहिए।

वसुंधरा ताल पर वैज्ञानिक पहरा हिमालयी आपदा प्रबंधन में नई शुरुआत है। लेकिन इस पहल की वास्तविक सफलता उपकरणों की संख्या या तकनीकी आधुनिकता से नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियों से मापी जाएगी। हिमालय की ऊंचाइयों से मिलने वाली चेतावनी यदि समय रहते घाटियों तक नहीं पहुंचती, तो विज्ञान की उपलब्धि भी अधूरी रह जाएगी।

 

About the Author : Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author, and editorial commentator with nearly five decades of experience. He writes extensively on Himalayan ecology, climate change, natural disasters, environmental challenges, and sustainable development, with particular emphasis on Uttarakhand and the Himalayan region.

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