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अल्ज़ाइमर रोग के उपचार के लिए नवीन अणु तैयार किए गए

चित्र 1. संभावित अल्जाइमर रोधी एजेंट के रूप में नए 9एच-कार्बाज़ोल-4एच-क्रोमीन संकर 4 ( एएल ) का विकास

पुणे के अगरकर अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला परीक्षणों में पाए प्रभावी और कम विषाक्तता वाले अणु, नई दवाओं के विकास की संभावना बढ़ी

 

By- Jyoti Rawat

नई दिल्ली। याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे प्रभावित करने वाले अल्जाइमर रोग के उपचार की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक सफलता मिली है। पुणे स्थित अगरकर अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने ऐसे नए रासायनिक अणु विकसित किए हैं, जो अल्जाइमर से संबंधित एंजाइमों की गतिविधियों को नियंत्रित करने में प्रभावी पाए गए हैं। प्रयोगशाला परीक्षणों में इन अणुओं ने उत्साहजनक परिणाम दिए हैं और परीक्षण की गई परिस्थितियों में उल्लेखनीय कोशिकीय विषाक्तता भी नहीं दिखाई है। हालांकि, इन्हें मनुष्यों के उपचार में इस्तेमाल करने से पहले व्यापक परीक्षण आवश्यक होंगे।

अल्जाइमर एक प्रगतिशील मस्तिष्क रोग है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सीखने, निर्णय लेने और दैनिक गतिविधियां संचालित करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होती है। मस्तिष्क में मौजूद तंत्रिका कोशिकाएं एक-दूसरे के साथ रासायनिक संकेतों के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं। अल्जाइमर के कारण यह संचार व्यवस्था प्रभावित होती है।
यह रोग डिमेंशिया अर्थात मनोभ्रंश का सबसे सामान्य कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, डिमेंशिया के लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामलों के लिए अल्जाइमर जिम्मेदार होता है। यह बीमारी मुख्यतः 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती है, हालांकि कम उम्र के व्यक्ति भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।
अल्जाइमर के विकास में बढ़ती उम्र, आनुवंशिक प्रवृत्ति, पर्यावरणीय प्रभाव और जीवनशैली सहित अनेक कारकों की भूमिका होती है। मस्तिष्क में असामान्य प्रोटीनों का जमाव और तंत्रिका कोशिकाओं की क्षति भी इस बीमारी से जुड़ी प्रमुख प्रक्रियाएं हैं।

मौजूदा उपचार की सीमाओं से आगे बढ़ने का प्रयास
अल्जाइमर के उपचार में डोनेपेजिल, रिवास्टिग्माइन, गैलेंटामाइन और मेमेंटाइन जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें कुछ दवाएं मस्तिष्क में तंत्रिका संकेतों के संचार को बेहतर बनाने में सहायता करती हैं। हालांकि, इनका लाभ सीमित हो सकता है और कुछ रोगियों में दुष्प्रभाव भी सामने आते हैं। वर्तमान में कुछ अन्य उपचार भी उपलब्ध हैं, लेकिन अल्जाइमर को पूरी तरह समाप्त करने वाला कोई सुनिश्चित इलाज नहीं है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए वैज्ञानिक अधिक प्रभावी और सुरक्षित दवाओं की खोज में जुटे हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान अगरकर अनुसंधान संस्थान, पुणे के वैज्ञानिक डॉ. प्रसाद कुलकर्णी और डॉ. विनोद उगले ने नए अणुओं को तैयार करने की एक अपेक्षाकृत तेज और प्रभावी विधि विकसित की है। डॉ. उगले इस शोध से एसईआरबी-टीएआरई फेलो के रूप में जुड़े हैं। वैज्ञानिकों ने एक ही प्रक्रिया में तीन रासायनिक घटकों की प्रतिक्रिया कराकर नए अणुओं का संश्लेषण किया। इस विधि से अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में वांछित उत्पाद प्राप्त हुआ। इसके बाद कंप्यूटर आधारित विश्लेषण और प्रयोगशाला में कोशिकाओं तथा एंजाइमों पर किए गए परीक्षणों के माध्यम से इन अणुओं की प्रभावशीलता और संभावित विषाक्तता का अध्ययन किया गया।

मस्तिष्क के महत्वपूर्ण एंजाइमों पर प्रभाव
शोध में विकसित अणु एसिटाइलकोलिनेस्टरेज़ और ब्यूटिरिलकोलिनेस्टरेज़ नामक एंजाइमों की गतिविधि को रोकने में प्रभावी पाए गए। ये एंजाइम एसिटाइलकोलीन नामक रासायनिक संदेशवाहक के विघटन में भूमिका निभाते हैं। एसिटाइलकोलीन मस्तिष्क में याददाश्त और सीखने की प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
अल्जाइमर के रोगियों में एसिटाइलकोलीन से संबंधित तंत्रिका संचार प्रभावित हो सकता है। इसलिए इन एंजाइमों की गतिविधि को नियंत्रित करना उपचार की एक महत्वपूर्ण रणनीति मानी जाती है।

अध्ययन में एक प्रमुख अणु ने ब्यूटिरिलकोलिनेस्टरेज़ की तुलना में एसिटाइलकोलिनेस्टरेज़ के प्रति अधिक चयनात्मक प्रभाव दिखाया। कंप्यूटर आधारित आणविक अध्ययन में भी प्रभावी अणुओं ने संबंधित एंजाइमों के सक्रिय भागों के साथ स्थिर संपर्क प्रदर्शित किया।वैज्ञानिकों के अनुसार, इन परिणामों से संकेत मिलता है कि विकसित अणुओं को भविष्य में अधिक प्रभावी अल्जाइमररोधी दवाओं के निर्माण के लिए आधार बनाया जा सकता है।

अभी मानव परीक्षणों की आवश्यकता

शोधकर्ताओं का मानना है कि संश्लेषण, कंप्यूटर आधारित अध्ययन और प्रयोगशाला परीक्षणों को मिलाकर अपनाई गई इस पद्धति से नई औषधियों की खोज को गति मिल सकती है। भविष्य में कार्बाज़ोल और क्रोमीन आधारित नए रासायनिक यौगिकों का विकास कर उनके अतिरिक्त अल्जाइमररोधी गुणों का अध्ययन करने की योजना है।
इन अणुओं को अन्य औषधियों के साथ उपयोग करने की संभावनाओं पर भी आगे शोध किया जा सकता है।

हालांकि, वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि अभी प्रारंभिक अनुसंधान के स्तर पर है। प्रयोगशाला में किसी अणु का प्रभावी और कम विषाक्त पाया जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह मनुष्यों में भी सुरक्षित और कारगर होगा। इसके लिए पशुओं पर अध्ययन, शरीर में दवा के अवशोषण और मस्तिष्क तक पहुंचने की क्षमता का मूल्यांकन तथा नियंत्रित मानव परीक्षण आवश्यक होंगे।
इसके बावजूद यह अनुसंधान अल्जाइमर जैसी जटिल बीमारी के लिए नई औषधियां विकसित करने की दिशा में एक उपयोगी वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता है।

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