उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था पर बढ़ते सवाल, जवाबदेही किसकी?

-वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली-
उत्तराखंड में लगातार सामने आ रही हत्या, हिंसा, नशीले पदार्थों की तस्करी, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और संगठित आपराधिक गिरोहों की गतिविधियों ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजधानी देहरादून से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों तक आपराधिक घटनाओं की खबरें चिंताजनक हैं। सवाल केवल अपराध होने का नहीं, बल्कि अपराध रोकने, अपराधियों पर अंकुश लगाने और नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाने में सरकारी तंत्र की प्रभावशीलता का है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास गृह विभाग भी है। इसलिए कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही स्वाभाविक रूप से अधिक है।
मुख्यमंत्री धामी 23 मार्च 2026 को देहरादून में अपनी सरकार के चार वर्ष पूरे होने के समारोह में भाग ले रहे थे। उसी दिन राजधानी में मुजफ्फरनगर निवासी छात्र दिव्यांशु जटराणा की हत्या की घटना सामने आई। आरोप है कि आपसी विवाद के चलते दूसरे छात्र गुट ने बाहरी राज्य से हमलावर बुलाए थे। इस घटना ने देहरादून के शैक्षणिक वातावरण और छात्रों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। इसके विरोध में किसान नेता राकेश टिकैत के आह्वान पर तीन अप्रैल को उत्तर प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग देहरादून पहुंचे। आशारोड़ी में आयोजित शोकसभा में टिकैत ने राजधानी में बढ़ते अपराध, नशे के कारोबार और प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल उठाए।
राकेश टिकैत की टिप्पणियों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने शिक्षण संस्थानों के आसपास नशीले पदार्थों की उपलब्धता और आपराधिक गतिविधियों के विस्तार की ओर ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि बाहरी आपराधिक तत्वों की सक्रियता से स्थानीय लोगों में असुरक्षा बढ़ रही है। हालांकि किसी भी अपराध के लिए पूरे बाहरी समुदाय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन संगठित गिरोहों और अंतरराज्यीय अपराधियों की गतिविधियों की प्रभावी निगरानी पुलिस की जिम्मेदारी अवश्य है।
देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा की हत्या ने भी उत्तराखंड की छवि को आघात पहुंचाया। इस घटना के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर पूर्वोत्तर राज्यों के विद्यार्थियों ने प्रदर्शन कर न्याय की मांग की थी। राजधानी में अध्ययन के लिए आने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा केवल स्थानीय प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ा प्रश्न भी है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड राज्य में न्याय और राजनीतिक जवाबदेही की बहस का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। सितंबर 2022 में हुई इस हत्या के बाद से पीड़ित परिवार न्याय की मांग करता रहा है। अक्टूबर 2026 में दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के विरोध में भी प्रदर्शन हुए। अंकिता के माता-पिता ने दिल्ली में धरना देकर कथित वीआईपी की पहचान सार्वजनिक करने और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी तथा उत्तराखंड कांग्रेस के नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए। हालांकि राजनीतिक आरोपों और किसी व्यक्ति की प्रमाणित आपराधिक संलिप्तता में स्पष्ट अंतर रखा जाना चाहिए। किसी भी आरोप का अंतिम निर्णय निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही संभव है।
इस प्रकरण का व्यापक पक्ष यह है कि पीड़ित परिवार को न्याय के लिए बार-बार सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों करने पड़ रहे हैं? यदि जांच पर विश्वास कायम नहीं हो पा रहा है तो सरकार को उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि पीड़ित परिवार और समाज को न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसा भी होना चाहिए।
राज्य में राजनीतिक विरोध और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में रही है। जुलाई 2026 में दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जा रहे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को ऋषिकेश में हिरासत में लिए जाने का मामला नैनीताल उच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने नागरिकों की आवाजाही रोकने की पुलिस कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणियां कीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध और आवागमन के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान आवश्यक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मनमानी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं हो सकती।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े कथित जातिगत अपमान के मामले में भी पुलिस की कार्रवाई को लेकर विवाद हुआ। आरोप था कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम के बाद आयोजन स्थल का शुद्धीकरण किया गया। इस घटना को लेकर संसद तक सवाल उठे। ऐसे संवेदनशील मामलों में शिकायतों पर तत्काल निष्पक्ष कार्रवाई न होने से सरकार की छवि प्रभावित होती है। सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा भी कानून-व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है।
राजधानी में संगठित अपराधियों की गतिविधियां विशेष चिंता का विषय हैं। देहरादून में सिल्वर सिटी जिम के बाहर विक्रम शर्मा की हत्या ने अंतरराज्यीय आपराधिक नेटवर्क की सक्रियता का प्रश्न उठाया। हत्या के आरोपियों के बाहरी राज्यों से संबंध होने की बात सामने आई। यदि दूसरे राज्यों में आपराधिक गतिविधियों से जुड़े लोग उत्तराखंड में लंबे समय तक कारोबार और निवास कर सकते हैं, तो पुलिस के सूचना तंत्र, सत्यापन व्यवस्था और खुफिया निगरानी की प्रभावशीलता की समीक्षा जरूरी है।
नकली दवाओं का कारोबार भी राज्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा अप्रैल में पकड़े गए अंतरराज्यीय नकली दवा नेटवर्क और बेंगलुरु में हुई कार्रवाई के संदर्भ में उत्तराखंड का नाम सामने आने से औषधि निर्माण तथा वितरण व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठे। नकली दवाओं का कारोबार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सीधे नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में पुलिस, औषधि नियंत्रण विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
इसी प्रकार अवैध हथियारों, साइबर ठगी, सट्टेबाजी, फर्जी कॉल सेंटर और मानव तस्करी से जुड़े मामलों में अंतरराज्यीय गिरोहों की गतिविधियों की खबरें आती रही हैं। नशीले पदार्थों की तस्करी विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए खतरा बन रही है। केवल छापेमारी और गिरफ्तारी से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। अपराधियों के वित्तीय नेटवर्क, संरक्षण तंत्र और आपूर्ति शृंखला को तोड़ना भी उतना ही जरूरी है।
महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति भी गंभीर समीक्षा मांगती है। देहरादून में सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर मुकेश जोशी की गोलीबारी में मृत्यु, ऋषिकेश के एक होटल में जुआ और शराब पार्टी के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई तथा कर्णप्रयाग और कैंचीधाम क्षेत्र में सामने आए हिंसक विवाद अलग-अलग प्रकृति की घटनाएं हैं। फिर भी इनसे सार्वजनिक सुरक्षा, पुलिस की तत्परता और कानून के प्रभावी अनुपालन से जुड़े प्रश्न उठते हैं। महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के संबंध में भी पारदर्शी आंकड़ों और समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता है।
सरकार की सफलता केवल अपराधियों की गिरफ्तारी या पुलिस की उपलब्धियों के प्रचार से नहीं मापी जा सकती। इसके लिए अपराधों की वास्तविक प्रवृत्ति, जांच की गुणवत्ता, आरोपपत्र दाखिल करने की स्थिति, दोषसिद्धि दर और पीड़ितों को न्याय मिलने में लगने वाले समय का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन जरूरी है। अपराध के आंकड़ों में वृद्धि कभी-कभी बेहतर शिकायत पंजीकरण का परिणाम भी हो सकती है। इसलिए किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले तुलनात्मक आधिकारिक आंकड़ों का परीक्षण आवश्यक है।
चार वर्षों के शासन के बाद मुख्यमंत्री धामी के सामने कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने की चुनौती है। गृह विभाग उनके पास होने के कारण जवाबदेही किसी दूसरे मंत्री पर नहीं डाली जा सकती। विधानसभा के आगामी गैरसैंण सत्र में विपक्ष को इस विषय पर तथ्यपरक बहस करनी चाहिए। सरकार को भी अपराध नियंत्रण की उपलब्धियों के साथ अपनी कमियों और सुधारात्मक उपायों का विवरण प्रस्तुत करना चाहिए।
उत्तराखंड को सुरक्षित राज्य बनाने के लिए राजनीतिक दावों से अधिक प्रभावी पुलिस व्यवस्था, निष्पक्ष जांच, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के सम्मान की आवश्यकता है। यदि लगातार उठ रहे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो मुख्यमंत्री के गृह विभाग अपने पास रखने के औचित्य पर भी बहस स्वाभाविक होगी। आखिर राज्य की कानून-व्यवस्था की अंतिम राजनीतिक जिम्मेदारी किसकी है?
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(लेखक उत्तराखंड के जाने माने सामाजिक चिन्तक और पर्यावरण इंजीनियर हैं. लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं–एडमिन)

