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ईरान पर फिर बड़े अमेरिकी हमले की आशंका, पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा गहराया

 

 

अमेरिकी युद्धपोतों पर बंकर भेदी बम और मिसाइलों का भंडारण तेज, ईरान ने भी व्यापक जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए; तीन नवंबर के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद बढ़ सकता है टकराव

 

 

विशेष अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट | 25 अक्टूबर.

वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ता अविश्वास पश्चिम एशिया को एक बार फिर व्यापक युद्ध की ओर धकेल रहा है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों पर मिसाइलों और अत्याधुनिक बमों का भंडारण, ईरान के विरुद्ध नए सैन्य अभियानों की तैयारी तथा अमेरिकी अधिकारियों पर संभावित ईरानी हमलों से संबंधित खुफिया चेतावनियों ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, ईरान ने संकेत दिया है कि यदि उस पर दोबारा हमला हुआ तो इस बार उसका जवाब पहले से कहीं अधिक व्यापक और अप्रत्याशित होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ईरान पर हमला नहीं करने की बात कही है, लेकिन चुनावों के बाद सैन्य कार्रवाई की संभावना खुली रखी है।

अमेरिकी समाचारपत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल और द न्यूयॉर्क टाइम्स की अलग-अलग रिपोर्टों से उभरती तस्वीर बताती है कि दोनों देश प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की सार्वजनिक इच्छा जताने के बावजूद संभावित सैन्य टकराव की तैयारी कर रहे हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि किसी सीमित सैन्य कार्रवाई, खुफिया जानकारी की गलत व्याख्या अथवा किसी अमेरिकी अधिकारी पर हमले से ऐसा संघर्ष शुरू हो सकता है जिसे बाद में नियंत्रित करना मुश्किल होगा।

 

अमेरिकी विमानवाहक पोत पर युद्ध की तैयारियां

द वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, अरब सागर में तैनात अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन और उसके साथ संचालित युद्धपोतों पर बड़े पैमाने पर हथियार तथा अन्य सैन्य सामग्री पहुंचाई जा रही है। समाचारपत्र के संवाददाताओं ने विमानवाहक पोत और निर्देशित मिसाइलों से लैस एक विध्वंसक युद्धपोत का दौरा कर वहां लड़ाकू विमानों की गतिविधियों और हथियारों की आपूर्ति का प्रत्यक्ष अवलोकन किया।

इस दौरान लंबी दूरी से जमीनी ठिकानों पर हमला करने वाली मिसाइलों और भूमिगत संरचनाओं को भेदने में सक्षम विशेष बमों की आपूर्ति देखी गई। इन हथियारों का इस्तेमाल मजबूत सैन्य प्रतिष्ठानों, भूमिगत कमान केंद्रों और सुरक्षित ठिकानों के विरुद्ध किया जा सकता है।

अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से समाचारपत्र ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रम्प यदि आने वाले सप्ताहों में ईरान पर नए हमलों का आदेश देते हैं तो नौसेना उसके लिए तैयार रहना चाहती है। क्षेत्र में एक अन्य अमेरिकी विमानवाहक पोत भेजे जाने और इजरायल द्वारा संभावित नए हमलों की योजनाएं तैयार रखने की चेतावनी ने भी आशंकाएं बढ़ाई हैं।

हालांकि सैन्य तैयारी अपने आप में हमले का अंतिम निर्णय नहीं है। ऐसी तैनाती का उद्देश्य ईरान पर दबाव बनाना, संभावित जवाबी कार्रवाई से निपटने की क्षमता बढ़ाना और राजनयिक वार्ताओं में अमेरिका की स्थिति मजबूत करना भी हो सकता है।

ईरान के विरुद्ध हमलों की विस्तृत योजना

द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए लक्ष्यों की विस्तृत सूची तैयार की है। इसमें ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अन्य बुनियादी ढांचों को भी शामिल किए जाने की जानकारी दी गई है।

समाचारपत्र ने एक ऐसे अमेरिकी अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी है जिसे सैन्य योजनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का आकलन है कि राष्ट्रपति निजी बातचीत में ईरान के विरुद्ध एक और बड़े हमले की ओर झुकते दिखाई दे रहे हैं।

यदि ईरान के ऊर्जा और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाता है तो संघर्ष का स्वरूप केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था के साथ नागरिक जीवन, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय व्यापार पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

अमेरिकी अधिकारियों पर हमलों की खुफिया चेतावनी

इस बीच अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की नई चेतावनी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक जे क्लेटन ने 23 अक्टूबर को विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भेजे ज्ञापन में आगाह किया कि ईरान द्वारा अमेरिकी अधिकारियों और नागरिकों को निशाना बनाने के प्रयासों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स और अमेरिकी समाचार वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी खुफिया तंत्र का आकलन है कि पश्चिम एशिया और कुछ अन्य देशों में अमेरिकी अधिकारियों के विरुद्ध घातक हमलों की कथित योजनाएं उन्नत अवस्था में पहुंच चुकी हैं। हालांकि इन योजनाओं के ठोस प्रमाण और संभावित लक्ष्यों का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

इन चेतावनियों के बाद अमेरिका ने पश्चिम एशिया स्थित अपने कुछ राजनयिक मिशनों में कर्मचारियों की संख्या घटाने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के कदम उठाए हैं।

द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारी विशेष रूप से ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड से जुड़ी उन इकाइयों की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं जिन पर विदेशों में अपहरण और लक्षित हत्याओं की साजिशें रचने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों के बीच भी इस बात को लेकर मतभेद हैं कि ईरान की कथित योजनाओं को वास्तव में अंजाम देने की क्षमता कितनी है।

ईरान की चेतावनी : अगला युद्ध सीमित नहीं रहेगा

ईरान की ओर से भी कड़े संकेत मिल रहे हैं। तेहरान का मानना है कि अमेरिका और इजरायल पिछले 16 महीनों में उसके विरुद्ध तीसरे बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहे हैं। ईरानी नेतृत्व इसे अपनी राजनीतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्तित्व का संकट मान रहा है।

द न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में दो ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी राजनयिकों और अन्य अधिकारियों को निशाना बनाने की संभावित योजनाओं की पुष्टि की। इनमें एक अधिकारी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड से संबंधित बताया गया है। हालांकि उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई और उनके दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी उपलब्ध नहीं है।

ईरानी संसद के अध्यक्ष और प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बागिर गालिबाफ के वरिष्ठ सलाहकार महदी मोहम्मदी ने भी संकेत दिया है कि भविष्य का संघर्ष परंपरागत युद्ध जैसा नहीं होगा। उनके अनुसार ईरान अपने विरोधियों की कमजोरियों को निशाना बनाकर अप्रत्याशित और असममित कार्रवाई की रणनीति अपनाएगा।

इसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी नए अमेरिकी हमले की स्थिति में ईरान केवल इजरायल अथवा अमेरिकी सैन्य अड्डों तक जवाबी कार्रवाई सीमित न रखे। क्षेत्रीय ऊर्जा प्रतिष्ठान, समुद्री परिवहन, संचार व्यवस्था और अन्य रणनीतिक सुविधाएं भी खतरे की जद में आ सकती हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट

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इस टकराव का सबसे संवेदनशील क्षेत्र फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य है। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों और अन्य ठिकानों के विरुद्ध मिसाइल तथा ड्रोन हमले किए थे। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात और ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट पैदा हुआ।

अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी लागू करने का दावा कर रहा है, जबकि ईरान रणनीतिक जलमार्ग पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की बात कहता है। दोनों देशों के बीच जून में हुए प्रारंभिक समझौते के बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में वार्ताएं आगे नहीं बढ़ सकी हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी बड़े सैन्य संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है। समुद्री बीमा, माल ढुलाई और आपूर्ति शृंखलाओं पर भी इसका असर पड़ेगा।

भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए यह विशेष चिंता का विषय है। पश्चिम एशिया में लंबे संघर्ष से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव पड़ सकता है और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के माध्यम से महंगाई बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा और रोजगार भी भारतीय विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न बन सकते हैं।

अमेरिकी और इजरायली चुनावों से जुड़ी युद्ध की रणनीति

वर्तमान संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका और इजरायल की घरेलू राजनीति भी है। अमेरिका में तीन नवंबर को मध्यावधि चुनाव होने हैं। ट्रम्प जानते हैं कि नया युद्ध अमेरिकी मतदाताओं के बीच विवाद का विषय बन सकता है। विशेष रूप से उनके समर्थकों का एक वर्ग विदेशी सैन्य हस्तक्षेप बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।

दूसरी ओर, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी चुनावी दबाव का सामना कर रहे हैं। ईरान के विरुद्ध कठोर सैन्य कार्रवाई उनके लिए सुरक्षा नीति का प्रमुख मुद्दा रही है।

अमेरिकी समाचार माध्यम एबीसी न्यूज ने इजरायली सूत्रों के हवाले से बताया है कि दोनों देशों की सेनाओं ने अमेरिकी चुनावों के बाद ईरान पर नए संयुक्त हमलों की योजनाएं तैयार की हैं। हालांकि किसी नए सैन्य अभियान को अंतिम स्वीकृति दिए जाने की पुष्टि नहीं हुई है।

यही स्थिति एक राजनीतिक विरोधाभास पैदा करती है। चुनावों से पहले युद्ध को टालना घरेलू राजनीतिक दृष्टि से लाभकारी हो सकता है, लेकिन चुनावों के बाद सैन्य कार्रवाई की संभावना खुली रखने से ईरान को भी पहले से अपनी जवाबी रणनीति तैयार करने का समय मिल रहा है।

खुफिया सूचनाओं की विश्वसनीयता भी बड़ा प्रश्न

वर्तमान संकट में खुफिया सूचनाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि ईरान अमेरिकी अधिकारियों पर हमले की योजनाओं को अंतिम रूप दे रहा है, जबकि ईरान को आशंका है कि अमेरिका और इजरायल उसके राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व को निशाना बनाने की तैयारी में हैं।

दोनों पक्षों की आशंकाएं एक-दूसरे की सैन्य तैयारियों को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे वातावरण में किसी संदिग्ध गतिविधि को वास्तविक हमले की शुरुआत समझ लेने का खतरा बढ़ जाता है।

इतिहास में इराक पर 2003 के अमेरिकी आक्रमण से पहले सामूहिक विनाश के हथियारों से संबंधित खुफिया दावों की भूमिका एक गंभीर चेतावनी है। बाद में वे दावे प्रमाणित नहीं हो सके। इसका अर्थ यह नहीं कि ईरान से संबंधित वर्तमान चेतावनियां गलत हैं, बल्कि यह कि सैन्य कार्रवाई के औचित्य के लिए खुफिया निष्कर्षों की स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच आवश्यक है।

अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इस संकट को जटिल बनाती है। जनवरी 2020 में ट्रम्प के आदेश पर ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद दोनों देशों के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए थे। उसके बाद अमेरिकी अधिकारियों के विरुद्ध कथित ईरानी प्रतिशोध की योजनाओं को लेकर कई बार चेतावनियां सामने आईं।

कूटनीति के लिए सिकुड़ता अवसर

बढ़ते तनाव के बीच पश्चिम एशिया के मध्यस्थ देश अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू कराने का प्रयास कर रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों पक्षों को ऐसा समझौता स्वीकार कराने की है जिसमें अमेरिका अपनी सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम संबंधी मांगों पर आश्वासन प्राप्त कर सके तथा ईरान अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा कर सके।

इस समय दोनों पक्ष सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करके बातचीत में बढ़त हासिल करना चाहते हैं। लेकिन यही रणनीति टकराव का जोखिम भी बढ़ा रही है। यदि एक पक्ष दबाव बढ़ाने के लिए सीमित हमला करता है और दूसरा उसे व्यापक युद्ध की शुरुआत मान लेता है तो घटनाक्रम नियंत्रण से बाहर जा सकता है।

अमेरिका की ओर से युद्धपोतों पर हथियारों की आपूर्ति, इजरायल की सैन्य तैयारियां और ईरान की जवाबी धमकियां यह संकेत अवश्य देती हैं कि सभी पक्ष गंभीर टकराव की संभावना को ध्यान में रखकर चल रहे हैं। फिर भी सैन्य तैयारी और युद्ध शुरू करने के राजनीतिक निर्णय के बीच अंतर करना आवश्यक है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका ईरान पर हमला करने की क्षमता रखता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान संभावित सैन्य कार्रवाई के परिणामों को नियंत्रित कर सकेंगे। फरवरी से जारी संघर्ष ने पहले ही क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा व्यापार को प्रभावित किया है। एक नया व्यापक हमला इस संकट को कहीं अधिक विनाशकारी बना सकता है।

तीन नवंबर के अमेरिकी चुनावों के बाद का समय इसलिए निर्णायक माना जा रहा है। लेकिन उससे पहले भी किसी अप्रत्याशित घटना, गलत खुफिया आकलन या सीमित जवाबी कार्रवाई से युद्ध भड़कने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

पश्चिम एशिया के लिए वास्तविक चुनौती अब केवल युद्ध को टालना नहीं, बल्कि उस अविश्वास को कम करना है जिसके कारण प्रत्येक सैन्य तैयारी दूसरे पक्ष को आसन्न हमले का संकेत दिखाई दे रही है।

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स्रोत : द वॉल स्ट्रीट जर्नल और द न्यूयॉर्क टाइम्स की 24–25 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें; रॉयटर्स, एबीसी न्यूज और अन्य समकालीन रिपोर्टों से तथ्यों का मिलान। सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं तथा खुफिया आरोपों को पुष्ट घटनाओं से अलग रखते हुए स्वतंत्र संकलन और विश्लेषण।

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